व्यापार
10-Jun-2026


- बेमतलब शुल्क थोपने वाले तरीकों से ग्राहकों के व्यवहार में आ रहा बदलाव नई दिल्ली,(ईएमएस)। भारत का तेजी से बढ़ता डिजिटल कारोबार चकमा देने वाले इंटरफेस डिजाइन के कारण भारी वित्तीय नुकसान से गुजर रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक ‘डार्क पैटर्न’ की वजह से भारतीय ग्राहकों को हर साल अनुमानित 25,000 से 28,000 करोड़ का नुकसान हो रहा है। देश में ऑनलाइन के जरिए खरीदारी करने वाले 30.4 करोड़ लोगों में 88 फीसदी को हर महीने अनुमानित 78 से 87 रुपए का नुकसान हो रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक सीधे नुकसान के अलावा बेमतलब के शुल्क थोपने वाले ये तरीके ग्राहकों के व्यवहार में भी बड़े बदलाव ला रहे हैं। इससे 55,000 करोड़ रुपए से ज्यादा के सकल उत्पाद मूल्य जोखिम में पड़ गए हैं क्योंकि उपयोगकर्ता खर्च कम कर रहे हैं या अपने लिए बेहद ठोस विकल्प की तलाश कर रहे हैं। इन खतरों के बावजूद रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ऑनलाइन खरीदारी का चलन कम नहीं होने जा रहा। रिपोर्ट से पता चलता है कि अब 63 फीसदी ऑनलाइन भुगतान उपभोक्ता डिजिटल लेनदेन में छिपे हुए चार्ज या ‘ड्रिप प्राइसिंग’ का सामना करते हैं। यह वर्ष 2024 में बताए गए 52 फीसदी के आंकड़े से ज्यादा है। रिपोर्ट के मुताबिक नतीजों से पता चलता है कि मौजूदा नियामकीय हस्तक्षेप ऐसे तरीकों को रोकने में अब तक आंशिक रूप से सफल रहे हैं। ये तरीके ई-कॉमर्स, बैंकिंग, ट्रैवल, राइड-हेलिंग, बीमा, ऑनलाइन भुगतान और डिजिटल उधारी प्लेटफॉर्म पर लाखों ग्राहकों को प्रभावित कर रहे हैं। रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि कैसे ‘डार्क पैटर्न’ भारत के डिजिटल तंत्र में एक बड़ी समस्या बन गए हैं। मौजूदा सर्वेक्षण के नतीजों से पता चलता है कि 73 फीसदी प्लेटफॉर्म ऐसे तरीके अपनाते हैं जिससे उपयोगकर्ता ऐसे काम करने के लिए विवश हो जाते हैं जो वे शायद कभी नहीं करते। 69 फीसदी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ‘ड्रिप प्राइसिंग’ के तरीके अपनाते हैं जिसमें अतिरिक्त फीस का पता चेकआउट के आखिरी चरण में ही चलता है। वर्ष 2026 की पहली तिमाही में की गई इस रिपोर्ट में 50 शहरों के 2,590 से ज्यादा ग्राहकों से बात की गई और क्विक कॉमर्स, ई-कॉमर्स और ऑनलाइन यात्रा क्षेत्र की 12 कंपनियों का आकलन किया गया। इसमें ‘डार्क पैटर्न’ से ग्राहकों पर आर्थिक असर और भरोसे में कमी का विश्लेषण किया गया। इसमें सबसे अच्छा और सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले प्लेटफॉर्म के बीच 92 अंक का अंतर सामने आया। सीधे आर्थिक नुकसान और उपभोक्ताओं के बदलते व्यवहार का मिला-जुला असर यह दिखाता है कि ‘डार्क पैटर्न’ अब केवल उपभोक्ता की सुरक्षा का मामला नहीं रह गया है बल्कि यह भारत के डिजिटल कॉमर्स तंत्र की लंबे समय की स्थिरता पर असर डालने वाली एक बड़ी व्यापक आर्थिक चुनौती बन गए हैं। रिपोर्ट में भारतीय उपभोक्ताओं के बीच जानकारी और असलियत में अंतर की बात भी कही गई है। इसके मुताबिक 81 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्हें डार्क पैटर्न के बारे में पता है, वहीं 85 फीसदी ने माना कि वे फिर भी इनके कारण गुमराह हुए। 74 फीसदी उपभोक्ताओं ने कहा कि वे ऐसे प्लेटफॉर्म के लिए अधिक रकम देने को तैयार हैं जो सही और पारदर्शी तरीके अपनाते हैं। साथ ही, उपभोक्ता ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अपना खर्च कम करने की भी योजना बना रहे हैं, खासकर ऑनलाइन यात्रा के मामले में जहां खर्च 15 फीसदी तक कम हो सकता है। रिपोर्ट में मौजूदा परिभाषाओं और इन्हें लागू करने के नियमों में अस्पष्टता को लेकर चिंता जताई गई है। चकमा देने वाले तरीकों और सही व्यावसायिक तरीके के बीच अंतर साफ नहीं होने से कारोबारी नियमों के पालन और उन्हें लागू करने की उम्मीदों को लेकर अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है। सिराज/ईएमएस 10जून26