- भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर का मास्टर प्लान अधर में भोपाल (ईएमएस)। मध्यप्रदेश के बड़े शहरों में वर्षों से लंबित मास्टर प्लान अब केवल प्रशासनिक देरी का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह अनियोजित शहरीकरण और अवैध कॉलोनियों के तेजी से विस्तार की बड़ी वजह बन चुका है। राजधानी भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे शहर बिना अद्यतन विकास योजना के आगे बढ़ रहे हैं, जिसका खामियाजा नागरिकों को बुनियादी सुविधाओं के अभाव के रूप में भुगतना पड़ रहा है। स्थिति यह है कि कई अवैध कॉलोनियों में मकान तो खड़े हो गए, लेकिन वहां सडक़, सीवरेज, पेयजल और सार्वजनिक सुविधाओं की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है। नियोजन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय पर मास्टर प्लान लागू होते तो अवैध बसाहटों पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता था। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने अपनी जांच में पाया कि नगर एवं ग्राम निवेश विभाग (टीएंडसीपी) समय पर प्रादेशिक और विकास योजनाएं तैयार करने में विफल रहा। कैग ने भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर और उज्जैन में वर्ष 2018 से 2023 तक के अभिलेखों की जांच के बाद इस पर गंभीर आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में बीना पेट्रोकेमिकल एवं औद्योगिक क्षेत्र को छोड़ अधिकांश क्षेत्रों की प्रादेशिक योजनाएं अंतिम रूप नहीं ले सकीं। वर्ष 2012 में प्रकाशित योजना का अंतिम नोटिफिकेशन भी वर्षों तक लंबित रहा। भोपाल में 175 प्रतिशत बढ़ीं अवैध कॉलोनियां आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2000 से 2021 के बीच भोपाल में अनधिकृत कॉलोनियों की संख्या में 175 प्रतिशत वृद्धि हुई। इसी दौरान शहर की आबादी लगातार बढ़ती रही, लेकिन उसके अनुरूप भूमि उपयोग, यातायात, जलापूर्ति और आवास विकास की योजनाएं तैयार नहीं हो सकीं। विशेषज्ञों का कहना है कि मास्टर प्लान केवल भवन निर्माण का दस्तावेज नहीं होता, बल्कि यह अगले 20 से 30 वर्षों की आबादी, यातायात, औद्योगिक विस्तार, हरित क्षेत्र और सार्वजनिक सुविधाओं की रूपरेखा तय करता है। इसके अभाव में शहरों का विकास बाजार और भू-माफिया के भरोसे छोड़ दिया जाता है। 20 साल से अधिक समय से पुरानी योजना पर चल रहा भोपाल भोपाल का वर्तमान मास्टर प्लान 2005 में प्रभावी हुआ था, जिसकी अवधि उसी वर्ष समाप्त भी हो गई। इसके बाद मास्टर प्लान-2031 का मसौदा कई बार तैयार हुआ, दावे-आपत्तियां सुनी गईं, लेकिन अंतिम मंजूरी नहीं मिल सकी। सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि भोपाल का मास्टर प्लान अलग-अलग चरणों में शासन द्वारा 11 बार लौटाया जा चुका है। वर्ष 2021 में सरकार ने इसे वापस भेजते हुए 2047 की संभावित आबादी को ध्यान में रखकर नई योजना बनाने को कहा। इसके बाद 2024 में भी फाइल वापस लौटा दी गई और मामला अब तक लंबित है। अवैध कॉलोनियों का कारोबार हुआ मजबूत शहरी मामलों के जानकारों का कहना है कि मास्टर प्लान की अनुपस्थिति का सबसे अधिक लाभ अवैध कॉलोनी विकसित करने वालों को मिला। जहां विकास की स्पष्ट दिशा नहीं होती, वहां कृषि भूमि का आवासीय उपयोग, संकरी गलियों वाली बसाहटें और बिना स्वीकृति के प्लॉटिंग तेजी से बढ़ती है। बाद में इन्हीं कॉलोनियों के नियमितीकरण की मांग उठती है और सरकारों पर राजनीतिक दबाव बनता है। परिणामस्वरूप अवैध निर्माण का चक्र लगातार मजबूत होता जाता है। भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती भोपाल, इंदौर और ग्वालियर जैसे तेजी से बढ़ते शहरों में जनसंख्या का दबाव लगातार बढ़ रहा है। यदि समयबद्ध तरीके से नए मास्टर प्लान लागू नहीं किए गए तो आने वाले वर्षों में यातायात, जल संकट, सीवरेज, पर्यावरण संरक्षण और आवास संबंधी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं। शहरी नियोजन विशेषज्ञों का मानना है कि मास्टर प्लान में हो रही देरी अब केवल फाइलों की समस्या नहीं, बल्कि प्रदेश के शहरों के भविष्य से जुड़ा मुद्दा बन चुकी है। सरकार के सामने चुनौती केवल नया मास्टर प्लान बनाने की नहीं, बल्कि अनियोजित विकास की रफ्तार को नियंत्रित करने की भी है। विनोद / 15 जून 26