बिहार में बदलते घटनाक्रम को देखते हुए अब जिस तरहराष्ट्रीय लोक मोर्चा के राष्ट्रीय अधिवेशन में पार्टी के संस्थापक उपेंद्र कुशवाहा को एक बार फिर सर्वसम्मति से राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया। दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित इस अधिवेशन में उन्हें वर्ष 2026 से 2029 तक के कार्यकाल के लिए पुनर्निर्वाचन का प्रमाण पत्र सौंपा गया। बाद में एमएलसी के चुनाव निर्विरोध राष्ट्रीय अध्यक्ष बने उपेंद्र कुशवाहा, बेटे के सियासी भविष्य पर सवाल बरकरार राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा अपनी पार्टी के निर्विरोध राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए हैं। दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय अधिवेशन में उन्हें 2026 से 2029 तक के कार्यकाल के लिए सर्वसम्मति से जिम्मेदारी सौंपी गई। पार्टी ने इसे अपने पहले संगठनात्मक चुनावों की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है। राजनीतिक पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा साल 2023 में अस्तित्व में आई थी। गठन के बाद से ही यह भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का हिस्सा रही है। बिहार में अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुकी आरएलएम के फिलहाल चार विधायक हैं। वहीं उपेंद्र कुशवाहा राज्यसभा सांसद हैं, जबकि उनके बेटे दीपक प्रकाश बिहार की एनडीए सरकार में मंत्री हैं। खास बात यह है कि दीपक प्रकाश न तो विधान परिषद और न ही विधानसभा के सदस्य हैं, लेकिन हाल ही में एमएलसी चुनाव में उनके पुत्र का नाम नहीं होने से अब उनके मंत्री बनने पर प्रश्नचिन्ह लग गया, कहा जा रहा है कि बीजेपी ने अपने पार्टी में विलय होने का ऑफर मिला लेकिन उन्होंने ठुकरा दिया क्योंकि पार्टिओ में छोटा या बड़ा नहीं देखा जाता है जनाधार देखा जाता है और उनकी पार्टी छोटी जरूर है लेकिन जनाधार मजबूत है क्योंकि वो काम से आज भी पहचाने जाते हैं और बिहार में कुशवाहा का अच्छा जनाधार है जिसमें कुर्मी भी शामिल है और जब सरकार के बनने बिगड़ने में भविष्य में सत्ता में बने रहने के लिए यही छोटी पार्टियों का सहारा लेना पड़ेगा जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री थे तो इन छोटी पार्टी का अस्तित्व था जो अपने हिसाब से निर्णय लेती थी और केंद्र और राज्य दोनों में एनडीए की भागीदारी होती थी अब इसके बाद बिहार में लोकजनशक्ति पार्टी रामविलास का नम्बर आने वाला है इसलिए आजकल चिराग पासवान जो हर दिन मोदीजी का गुणगान करते थे अब वो भी कुछ नहीं बोल रहें हैं इधर भाजपा में सम्राट चौधरी को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने से पूर्व उपमुख्य मंत्री व वर्तमान में कृषि मंत्री रहें विजय सिन्हा का खेमा में काफी नाराजगी है क्योंकि ऐ सब आज से नहीं बहुत पहले से बीजेपी में ही रहें हैं और सम्राट चौधरी तो 3-4 साल पहले आए होंगे जानकारों के अनुसार नीतीश कुमार ने इसी शर्त पर मुख्यमंत्री पद छोड़ा कि अगर सम्राट चौधरी बनते हैं तो हम हट जायेंगे इसके बड़े मायने हैं एक तो नीतीश कुमार,उन्हें मुख्यमंत्री बनवाकर बीजेपी के पढ़े लिखे कार्यकर्ता की नाराजगी और दूसरा वो नए हैं और नीतीश के इशारे पर कुछ जरूर सुनेंगे और यही हुआ कि अनंत सिंह को जेल से छूड़वाया और दूसरा किसी को लाठी डंडा खिलवाना हो तो वो भी हुआ शिक्षकों पर और अब तो ऐ हो गया है कि पाटलिपुत्रा स्टेशन पर ट्रेन लेट होने से नाराज छात्रों का पुलिस से काफी झड़प हुई और कई पुलिसवाले घायल हो गए जब जब सत्ता परिवर्तन का समय आता है तो ऐ सब देखने कों मिलता है बिहार में चुनाव परिणाम के बाद जब बीजेपी कों यह लगा की अपना मुख्यमंत्री बनाया जाए तो यह भी डर था कि कहीं नीतीश कुमार बिना बीजेपी के सरकार न बना लें इसलिए 2024 के बिधान सभा चुनाव के बाद जो सरकार बनाने की परिस्थिति थी उसमें बीजेपी बहुमत के आंकड़ो के साथ सरकार बनाने की स्थति ने नहीं थी क्योंकि उसके 89 विधायक थे सरकार बनाने हेतु 122 का नम्बर चाहिए था जिसमें जेडी यू के पास 85 विधायक हैं 19 चिराग पासवान के और हम के 5 और उपेंद्र कुशवाहा के 4 विधायक थे यानि कुल 28 की संख्या थी 89 में 28 जोड़ने से 117 विधायक थे सिर्फ 5 विधायक तो चाहिए था जिसमें बसपा का एक आई आई सी का भी 1-1सीट है 1निर्दलीय और 3 तो हो गया बाकी तो बहुमत साबित के समय एआईएमआईएम के 5 विधायक उपस्थित ही नहीं होते तो सरकार तो बीजेपी की बन ही जाती इसलिए एआईएमआईएम के प्रमुख ओबैसी को डर लगने लगा और चुनाव परिणाम के बाद नीतीश कुमार को सीएम के लेकर अब बिहार में बीजेपी के मुख्य्मंत्री सम्राट चौधरी पर खतरा मंडरा रहा है बिहार ने एनडीए के घटक दल लोजपा और हम ख़ामोशी से ये पता चल रहा है कि एक बार फिर कहीं बीजेपी से नीतीश कुमार ने पलटी मारी और बिहार के मुख्यमंत्री बनाने के मूड अब विपक्षी पार्टियों में भी आपसी सहमति दिख रही है क्योंकि नीतीश कुमार अभी राज्य सभा के सांसद ही हैं केंद्र में क़ोई भूमिका मिलती नहीं दिख रही है दूसरी ओर बिहार में एनडीए के अन्य घटक दलों में विलय के डर का माहौल भी है क्योंकि जब जेडीयू एक मजबूत पार्टियों में नहीं होगी तो छोटी मोटी पार्टियों कों भी टूटने की चिंता है। ईएमएस / 16 जून 26