लेख
16-Jun-2026
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बाहर से प्रतिष्ठान का भवन थोड़े बदलाव के साथ नजर आता है।अंदरुनी व्यवस्था, बदलाव देख कर चौंक जाएंगे।अध्यक्ष, मंत्री कार्यालय वाला क्षेत्र देख कर दांतों तले उंगली दबाना पड़ेगा।सभागार का किराया सुनकर पांवों तले की जमीन खिसकती नजर आएगी।सभी कमरों को वातानुकूलित कर दिया गया है। किराया बढ़ाना ही पड़ेगा।आम आदमी को दूर रखने का इंतजाम किया गया है। वैचारिक स्पष्टता, पारदर्शिता, आत्मबल बाहर। कथनी-करनी का अंतर साफ-साफ दिखाई देता है। सत्य, अहिंसा, करुणा, सादगी, सत्याग्रह, निडरता, निष्पक्षता, पारदर्शिता धराशाई। ये कहना है गांधीवादी रमेश चंद शर्मा का। जी हां बात हो रही है। नई दिल्ली स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान की, जो आईटीओ के समीप पंडित दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर स्थित है। महात्मा गांधी के विचारों और मूल्यों को संरक्षित व प्रसारित करने के मकसद से 31 जुलाई 1958 को गांधी शांति प्रतिष्ठान (दिल्ली) की स्थापना की गई थी। यह संस्था अहिंसा, शांति, और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए विश्व स्तर पर कार्य करती है।इस संस्थान के प्रमुख संस्थापकों में डॉ. राजेंद्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू और आर. आर. दिवाकर शामिल थे।इसके अलावा, लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने भी इसके गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, और गांधीवादी नेता आर. आर. दिवाकर (जो इसके पहले अध्यक्ष बने) इसके मुख्य संस्थापकों में शामिल थे। इसके शुरुआती संरक्षकों और सदस्यों में जाकिर हुसैन, सी. राजगोपालाचारी, आचार्य जे. बी. कृपलानी, सुचेता कृपलानी और मोरारजी देसाई जैसे दिग्गज शामिल थे। सुप्रसिद्ध गांधीवादी आर. आर. दिवाकर इसके संस्थापक अध्यक्ष और जी. रामचंद्रन, संस्थापक सचिव हुए। इसके बाद अनेक विभूतियों ने अध्यक्ष और सचिव के पद को सुशोभित किया। प्रतिष्ठान का अतीत उपलब्धियों वाला रहा है।1962 में इसने परमाणु हथियारों के निर्माण, परीक्षण और भंडारण को समाप्त करने पर तीन दिवसीय सम्मेलन का आयोजन किया और 1963 की आंशिक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि के लिए समर्थन जुटाने हेतु कई अंतर्राष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल भेजे। इसने बांग्लादेश की मुक्ति के लिए जन समर्थन जुटाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राष्ट्रीय स्तर पर, इसने 1970 के दशक के आरंभ में चंबल घाटी में डाकुओं के आत्मसमर्पण, 1970 के दशक के उत्तरार्ध में राष्ट्रीय वयस्क शिक्षा कार्यक्रमों के प्रचार और 1970 के दशक के आरंभ में अकाल विरोधी युवा अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह संस्था र संस्था गांधीवादी संगठनों से जुड़े विद्वानों और कार्यकर्ताओं के लिए आवास और शाकाहारी भोजन की सुविधा उचित दरों पर उपलब्ध कराने के लिए एक छात्रावास भी संचालित करती है। कार्यालय भवन में एक सेमिनार हॉल और एक सुसज्जित पुस्तकालय है। सेमिनार हॉल कम मूल्य में गांधी मूल्यों, लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था रखने वाले संस्थाओं को उपलब्ध हो जाया जाता था।इस कारण कम वजट वाले संस्थाओं को आयोजन करने में सहूलियत होती थी। अब स्थिति का काफी बदल गयी है। हालिया घटनाक्रमों के और बदलाव गांधी शांति प्रतिष्ठान नई दिल्ली के संबंध में व्यापक जन-संवाद हेतु एक सार्वजनिक अपील जाने माने गांधीवादी राजगोपाल पी. वी., गांधीवादी अध्ययन के अग्रणी विद्वान और अहमदाबाद स्थित गुजरात विद्यापीठ के पूर्व कुलपति सुदर्शन अयंगर,भारत के पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बाद लगातार तीन बार सचिव बनने वाले पहले व्यक्ति के रुप में जाने जानेवाले सुरेंद्र कुमार और निशांत अखिलेश ने की है। इनके मुताबिक गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली, पिछले सत्तर वर्षों से अधिक समय से गांधीवादी चिंतन के अध्ययन, प्रसार और संवर्धन में संलग्न रहा है। इसके पर्यावरण प्रकोष्ठ से जुड़े दिवंगत अनुपम मिश्र देश और विदेश में व्यापक रूप से जाने जाते रहे हैं। उनके संपादन में हिंदी पत्रिका ‘गांधी मार्ग’ ने विशेष प्रतिष्ठा और व्यापक पहचान प्राप्त की। किन्तु हाल के कुछ घटनाक्रमों और उनसे संबंधित पत्राचार के आलोक में यह आवश्यक प्रतीत होता है कि इस विषय को व्यापक समाज के संज्ञान में लाया जाए। इन लोगों स्पष्ट रूप किया हैं उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाना या मतभेदों को बढ़ाना नहीं है। एकमात्र उद्देश्य इन निर्णयों, प्रक्रियाओं और उनके प्रभावों को संतुलित एवं पारदर्शी ढंग से समझना तथा संवाद के माध्यम से एक रचनात्मक रास्ता तलाशना है। हाल के समय में संस्था परिसर के नवीनीकरण, उससे जुड़ी वित्तीय व्यवस्थाओं तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर विभिन्न दृष्टिकोण सामने आए हैं। एक पक्ष का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में संस्था की स्थिरता और निरंतरता के लिए नए और व्यावहारिक उपाय अपनाना आवश्यक है। वहीं दूसरी ओर यह चिंता व्यक्त की गई है कि ऐसे कदम संस्था के मूल गांधीवादी मूल्यों — पारदर्शिता, सहभागिता और आत्मनिर्भरता — से विचलन का कारण न बनें। उन लोगों पहला प्रयास अध्यक्ष और संस्था के संचालन से जुड़े जिम्मेदार व्यक्तियों से सीधे संवाद स्थापित करने का था। यद्यपि ऐसी बातचीत हुई, परंतु ऐसा प्रतीत हुआ कि उसे विषय की समाप्ति के रूप में लिया गया। जबकि इन लोगों का उद्देश्य यह था कि यदि सभी कार्य प्रक्रियात्मक रूप से सही भी हों, तब भी उन्हें व्यापक सार्वजनिक समझ के लिए पारदर्शी रूप से सामने रखा जाए। इन लोगों ने गांधी शांति प्रतिष्ठान की प्रबंधन समिति से निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर जानने का प्रयास किया:- 1. भवन के नवीनीकरण में निवेश करने वाला व्यक्ति/संस्था कौन है और उसकी पृष्ठभूमि क्या है? 2. नवीनीकरण का कुल बजट कितना है और धन का स्रोत क्या है? 3. निवेश करने वाले व्यक्ति/कंपनी और गांधी शांति प्रतिष्ठान के बीच क्या शर्तें तय हुई हैं? 4. क्या इस नवीनीकरण परियोजना के लिए गांधी शांति प्रतिष्ठान ने संबंधित सरकारी विभागों से अनुमति प्राप्त की है? 5. गांधी शांति प्रतिष्ठान का छात्रावास मूलतः गांधीवादी कार्यकर्ताओं के लिए बनाया गया था। यदि निवेशक कमरे/बिस्तरों का किराया बढ़ाता है, तो क्या गांधीवादी कार्यकर्ता इसका लाभ उठा सकेंगे? 6. अध्यक्ष एवं सचिव से स्पष्ट रूप से अनुरोध किया गया कि निजी पक्ष के साथ हुए मौखिक या लिखित समझौते तथा उनके द्वारा गांधी शांति प्रतिष्ठान के बैंक खाते में जमा कराई गई राशि का सार्वजनिक खुलासा किया जाए। 7. प्रबंधन समिति से यह भी स्पष्ट रूप से पूछा गया कि जब छात्रावास के कमरों का किराया ₹900 प्रति दिन से बढ़ाकर ₹3000 प्रति दिन कर दिया गया है, जिससे वर्षों से दिल्ली आने वाले गांधीवादी कार्यकर्ताओं के लिए यह सुरक्षित केंद्र लगभग बंद हो गया है, तो इसका उद्देश्य क्या है? 8. क्या कमरों के किराए में इस प्रकार की अत्यधिक वृद्धि, जिसके कारण गांधीवादी कार्यकर्ताओं का प्रवेश व्यवहारतः असंभव हो गया है, संस्था परिसर के व्यावसायिक उपयोग की श्रेणी में नहीं आती? इन लोगों ने कहा कि बार-बार स्मरण कराने के बावजूद अध्यक्ष या सचिव ने इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं दिया। इन विभिन्न दृष्टिकोणों के बीच संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। यदि इन मुद्दों को समय रहते शांतिपूर्ण, विचारपूर्ण और संवेदनशील ढंग से नहीं सुलझाया गया, तो इससे संस्था की विश्वसनीयता, आंतरिक विश्वास तथा दीर्घकालिक दिशा प्रभावित हो सकती है। ऐसे समय में, जब गांधीवादी समूह स्वयं देश में गांधीवादी चिंतन के लिए अनुकूल वातावरण बनाने की चुनौती महसूस कर रहे हैं, इस प्रकार की घटनाएँ इस परंपरा से जुड़े सभी लोगों के लिए गहरी चिंता और व्याकुलता का कारण बनती हैं। इन लोगों ने कहा कि • एक खुली, रचनात्मक और गरिमापूर्ण संवाद प्रक्रिया प्रारंभ की जाए; • सभी पक्षों के विचारों को धैर्य और सम्मानपूर्वक सुना जाए; • आवश्यकता पड़ने पर तथ्यों की स्पष्टता और उचित प्रक्रिया सुनिश्चित करने हेतु एक स्वतंत्र एवं निष्पक्ष समीक्षा कराई जाए। गांधीवादी परंपरा में मतभेद स्वाभाविक हैं, किंतु उनकी अभिव्यक्ति संयम, सत्यनिष्ठा और संवाद की भावना पर आधारित होनी चाहिए। इसी भावना के साथ हम यह विषय समाज के समक्ष रख रहे हैं, इस आशा में कि सामूहिक विवेक एक उचित मार्ग निकालने में सहायक होगा।संस्था की गरिमा, आत्मा और उसके मूलभूत मूल्यों की रक्षा सर्वोपरि है। कुमार कृष्णन /ईएमएस/16जून2026