15-Jan-2026
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नई दिल्ली (ईएमएस)। भारत ने केवल 200 से 300 साल पहले एक बिल्कुल उलटा दौर देखा था। इस दौर को इतिहास में लघु हिमयुग कहा जाता है। भारत में इसका सबसे भीषण असर करीब 70 साल तक रहा, हालांकि इसके प्रभाव 100 से 200 वर्षों तक महसूस किए गए। यह कोई पूर्ण हिमयुग नहीं था, बल्कि वैश्विक तापमान में करीब 1 से 2 डिग्री सेल्सियस की गिरावट का लंबा दौर था, जो 16वीं से 19वीं शताब्दी के बीच दुनिया के उत्तरी गोलार्द्ध में फैला रहा। इस दौरान देश के कई हिस्सों में आज की तुलना में कहीं ज्यादा कड़ाके की ठंड पड़ती थी। लिटिल आइस एज के समय उत्तर भारत में सर्दियां इतनी कठोर हो गई थीं कि गंगा और यमुना जैसी नदियों के शांत हिस्सों और किनारों पर बर्फ जमना आम बात मानी जाती थी। मुगल काल के संस्मरणों और शुरुआती ब्रिटिश यात्रियों के लेखों में इस असाधारण ठंड का जिक्र मिलता है। दिल्ली और आगरा जैसे शहरों में रात का तापमान आज के मुकाबले कहीं ज्यादा नीचे चला जाता था। कुछ विवरणों में बताया गया है कि सर्दियों में यमुना का पानी इतना ठंडा और स्थिर हो जाता था कि वह बर्फ जैसा दिखाई देता था। उत्तराखंड के ऊंचे इलाकों से निकलने वाली गंगा की धाराओं, खासकर भागीरथी और अलकनंदा के किनारों पर भी बर्फ जमने के प्रमाण मिलते हैं। हाल के वर्षों में भी हर्षिल के पास भागीरथी नदी के जमने की खबरें आती रही हैं, लेकिन पहले यह कहीं ज्यादा आम था। कश्मीर में झेलम नदी के पूरी तरह जमने के ऐतिहासिक रिकॉर्ड मौजूद हैं। कई बार लोग जमी हुई झेलम के ऊपर से पैदल चलते थे। 1893, 1964 और 1986 जैसी भीषण सर्दियों में भी झेलम के जमने के प्रमाण मिलते हैं, लेकिन आज ग्लोबल वार्मिंग के कारण ऐसा दृश्य बेहद दुर्लभ हो गया है। लद्दाख की जांस्कर नदी तो आज भी सर्दियों में जम जाती है और ‘चादर ट्रेक’ के लिए जानी जाती है। लिटिल आइस एज के दौर में यह नदी और भी मजबूती से जमती थी और जांस्कर घाटी के लोगों के लिए सर्दियों में आने-जाने का यही एकमात्र रास्ता हुआ करती थी। इस जलवायु परिवर्तन का असर केवल ठंड तक सीमित नहीं था। कठोर मौसम ने खेती, खानपान और जीवनशैली को भी बदल दिया। कम बारिश और ज्यादा ठंड के कारण किसानों ने ऐसी फसलों को अपनाया जो कम पानी में भी उग सकें, जैसे बाजरा और अन्य मोटे अनाज। ठंड से बचने के लिए पहनावे में बदलाव आया। मुगल दरबार में पश्मीना, भारी रेशमी कपड़े, चोगा और अंगरखा आम हो गए। खानपान में गर्म मसालों, सूखे मेवों और केसर का इस्तेमाल बढ़ा। तापमान गिरने से वाष्पीकरण कम हुआ, जिससे मानसून कमजोर पड़ने लगा। नतीजतन भारत में सूखे और अकाल बढ़ गए। 1630-32 का दक्कन का भीषण अकाल, जो शाहजहां के शासनकाल में पड़ा और जिसमें लाखों लोग भूख से मरे, इसी दौर की देन माना जाता है। 1770 का बंगाल अकाल, जिसमें बंगाल की लगभग एक-तिहाई आबादी खत्म हो गई, भी इसी जलवायु अस्थिरता का परिणाम था। सुदामा/ईएमएस 15 जनवरी 2026