ज़रा हटके
22-Jan-2026
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वाशिगटन (ईएमएस)। हालिया वैज्ञानिक शोध ने खुलासा किया है कि माइक्रो-ग्रेविटी यानी बेहद कम गुरुत्वाकर्षण की स्थिति में इंसानी दिमाग ऊपर और पीछे की ओर खिसकने लगता है। यह खोज अंतरिक्ष यात्रा से जुड़े खतरों को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर रही है। इस रिसर्च का नेतृत्व वैज्ञानिक रेचल सीडलर और उनकी टीम ने किया। अध्ययन के दौरान 26 अंतरिक्ष यात्रियों के मिशन से पहले और बाद में एमआरआई स्कैन किए गए। इन स्कैनों में साफ तौर पर देखा गया कि अंतरिक्ष में रहने के बाद दिमाग की स्थिति बदल गई थी। दिमाग केवल ऊपर की ओर नहीं, बल्कि पीछे की दिशा में भी खिसका हुआ पाया गया। यह बदलाव किसी एक हिस्से तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरे मस्तिष्क में देखा गया। वैज्ञानिकों ने दिमाग को 130 अलग-अलग हिस्सों में बांटकर विश्लेषण किया और लगभग हर हिस्से में खिंचाव या विस्थापन दर्ज किया गया। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) ने इस विषय पर एक विस्तृत अध्ययन किया। वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष यात्रियों की तुलना उन लोगों से की, जिन्हें धरती पर 60 दिनों तक बिस्तर पर लिटाकर रखा गया था और जिनका सिर थोड़ा नीचे की ओर झुका हुआ था यह प्रयोग शरीर के तरल पदार्थों के ऊपर की ओर बहाव को समझने के लिए किया गया था। नतीजों में सामने आया कि अंतरिक्ष यात्रियों के दिमाग में होने वाला बदलाव बिस्तर पर लेटे लोगों की तुलना में कहीं अधिक गंभीर था। एक साल तक अंतरिक्ष में रहने वाले यात्रियों में दिमाग का विस्थापन 2.52 मिलीमीटर तक पाया गया, जो सुनने में भले ही कम लगे, लेकिन मस्तिष्क के लिहाज से यह बड़ा बदलाव माना जाता है। अंतरिक्ष से लौटने के बाद कई यात्रियों को चलने और संतुलन बनाए रखने में दिक्कत होती है। वैज्ञानिकों ने इसका सीधा संबंध दिमाग के खिसकने से जोड़ा है। कान के भीतर मौजूद संतुलन प्रणाली गुरुत्वाकर्षण पर निर्भर करती है, लेकिन अंतरिक्ष में यह ठीक से काम नहीं कर पाती। रिसर्च में पाया गया कि जिन अंतरिक्ष यात्रियों का दिमाग ज्यादा खिसका, उन्हें संतुलन बनाने में उतनी ही अधिक परेशानी हुई। हालांकि आमतौर पर यात्री एक हफ्ते में दोबारा चलना सीख लेते हैं, लेकिन दिमाग के भीतर हुए बदलाव इतनी जल्दी सामान्य नहीं होते। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ये प्रभाव लंबे समय तक बने रहते हैं। रिसर्च में यह भी सामने आया कि धरती पर लौटने के छह महीने बाद भी कई अंतरिक्ष यात्रियों का दिमाग पूरी तरह अपनी पुरानी स्थिति में नहीं लौटा था। इस अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि मिशन जितना लंबा होगा, दिमाग पर पड़ने वाले प्रभाव उतने ही गंभीर होंगे। सुदामा/ईएमएस 22 जनवरी 2026