न्यूयॉर्क (ईएमएस)। वर्तमान में दुनिया भर में जारी युद्ध और अस्थिरता के बीच मानवता के भविष्य को लेकर अब तक की सबसे डरावनी चेतावनी सामने आई है। परमाणु वैज्ञानिकों के एक समूह ने ‘डूम्सडे क्लॉक’ (विनाश की घड़ी) की सुइयों को आधी रात यानी वैश्विक तबाही से महज 85 सेकंड पहले पर सेट कर दिया है। 1947 में अपनी स्थापना के बाद से इस प्रतीकात्मक घड़ी ने कभी भी इतना खतरनाक संकेत नहीं दिया था। यह बदलाव स्पष्ट करता है कि मानव सभ्यता अब विनाश के उस मुहाने पर खड़ी है जहाँ से वापसी का रास्ता बेहद संकरा होता जा रहा है। पिछले वर्ष यह समय प्रलय से 89 सेकंड की दूरी पर था, लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध के लंबा खिंचने, ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव और परमाणु हथियारों की नई होड़ ने इसे चार सेकंड और आगे बढ़ा दिया है। सुनने में यह अंतर मामूली लग सकता है, लेकिन विज्ञान और सुरक्षा बोर्ड के विशेषज्ञों के लिए यह एक वैश्विक आपातकाल का संकेत है। उनके मुताबिक, दुनिया अब पहले से कहीं ज्यादा अस्थिर और अनिश्चित हो चुकी है। यह घड़ी कोई ज्योतिषीय भविष्यवाणी नहीं है, बल्कि यह एक ठोस वैज्ञानिक विश्लेषण है जो बताता है कि वैश्विक नेताओं की विफलता हमें किस दिशा में ले जा रही है। तबाही के इस बढ़ते जोखिम के पीछे कई प्रमुख कारण हैं। यूक्रेन और मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में चल रहे युद्धों ने न केवल हजारों जानें ली हैं, बल्कि परमाणु संपन्न देशों के बीच सीधे टकराव का खतरा भी पैदा कर दिया है। परमाणु नियंत्रण संधियाँ कमजोर पड़ रही हैं और देश अपनी रक्षा के नाम पर विनाशकारी हथियारों का भंडार बढ़ा रहे हैं। इसके साथ ही, जलवायु परिवर्तन की चुनौती अब एक अस्तित्वगत संकट बन चुकी है, जिस पर दुनिया के बड़े देश ठोस कार्रवाई करने में विफल रहे हैं। एक नया और उभरता हुआ खतरा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का बेकाबू इस्तेमाल है। वैज्ञानिकों का मानना है कि सैन्य अभियानों और सूचना युद्ध में एआई का प्रयोग फेक न्यूज और गलत सूचनाओं के प्रसार को बढ़ा रहा है, जिससे देशों के बीच गलतफहमियां बढ़ सकती हैं जो अंततः युद्ध का कारण बन सकती हैं। इसके अलावा, जैविक खतरों और भविष्य की महामारियों से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग की कमी भी इस घड़ी की सुइयों को आगे धकेलने का बड़ा कारण बनी है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि स्थिति को सुधारना है, तो परमाणु शक्तियों को तुरंत नए समझौतों की मेज पर आना होगा। एआई के सैन्य उपयोग पर कड़े अंतरराष्ट्रीय नियम बनाने होंगे और जलवायु संकट को राजनीति से ऊपर उठकर देखना होगा। बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स का कहना है कि यह समय डराने के लिए नहीं, बल्कि दुनिया को जगाने के लिए तय किया गया है। 85 सेकंड की यह दूरी बताती है कि जोखिम गंभीर है, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि बड़ी शक्तियां अपनी जिम्मेदारी समझें और आपसी सहयोग बढ़ाएं, तो इन सुइयों को पीछे भी किया जा सकता है। फिलहाल, यह घड़ी एक अंतिम चेतावनी की तरह टिक-टिक कर रही है—अब भी संभलने का मौका है, वरना देरी मानवता के लिए भारी पड़ सकती है। वीरेंद्र/ईएमएस 30 जनवरी 2026