ज़रा हटके
23-Jan-2026
...


लंदन (ईएमएस)। वैज्ञानिकों को दक्षिण अफ्रीका में ऐसे प्रमाण मिले हैं, जो बताते हैं कि शुरुआती इंसान न सिर्फ शिकार करता था, बल्कि उसे पूरी योजना, धैर्य और वैज्ञानिक समझ के साथ अंजाम देता था। यह अहम खोज दक्षिण अफ्रीका के क्वाज़ुलू-नटाल प्रांत में स्थित उम्लत्तुजाना रॉक शेल्टर में हुई है। यहां खुदाई के दौरान वैज्ञानिकों को क्वार्ट्ज पत्थर से बने तीरों के सिरे मिले, जिन पर जहर के स्पष्ट निशान पाए गए। इस रिसर्च को स्वीडन और दक्षिण अफ्रीका के वैज्ञानिकों ने मिलकर अंजाम दिया। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इन तीरों पर लगाया गया जहर शिकार को तुरंत नहीं मारता था, बल्कि उसे धीरे-धीरे कमजोर करता था। इससे जानवर ज्यादा दूर तक भाग नहीं पाता था और शिकारी उसे आसानी से पकड़ लेते थे। यह दर्शाता है कि उस दौर के इंसान केवल शारीरिक ताकत पर निर्भर नहीं थे, बल्कि वे रणनीति, धैर्य और व्यवहारिक ज्ञान का भी इस्तेमाल करते थे। यह शिकार करने का एक बेहद उन्नत तरीका माना जा रहा है। शोध में यह भी सामने आया कि तीरों पर इस्तेमाल किया गया जहर बूफोन डिस्टिचा नामक एक स्थानीय पौधे से तैयार किया जाता था। यह पौधा आज भी दक्षिण अफ्रीका में पाया जाता है और इसे अत्यंत विषैला माना जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह जहर चूहों को 20 से 30 मिनट में मार सकता है, जबकि इंसानों में इससे मतली, आंखों की रोशनी में परेशानी और मांसपेशियों में कमजोरी जैसे लक्षण हो सकते हैं। हैरानी की बात यह है कि यही जहर बाद के ऐतिहासिक काल में इस्तेमाल किए गए तीरों पर भी पाया गया है। इस खोज से पहले वैज्ञानिकों का मानना था कि जहर लगे तीरों का इस्तेमाल करीब 4,000 से 8,000 साल पहले शुरू हुआ था, जिसके प्रमाण मिस्र और दक्षिण अफ्रीका में मिले थे। लेकिन 60,000 साल पुराने ये तीर इस धारणा को पूरी तरह बदल देते हैं और साबित करते हैं कि इंसान बहुत पहले ही उन्नत तकनीक और वैज्ञानिक सोच विकसित कर चुका था। सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि हजारों साल बाद भी तीरों पर जहर के अवशेष सुरक्षित मिले। रासायनिक जांच से पता चला कि ये पदार्थ मिट्टी में लंबे समय तक स्थिर रह सकते हैं। सुदामा/ईएमएस 23 जनवरी 2026