लेख
24-Jan-2026
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दावोस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मौजूदगी और ग्रीनलैंड पर उनके दावे ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि छोटे राष्ट्रों की संप्रभुता का सम्मान क्यों इतना महत्वपूर्ण है। यह विवाद केवल अमेरिका और यूरोप के बीच का तनाव नहीं है, बल्कि पूरी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की दिशा तय करने वाला क्षण है। ग्रीनलैंड, जो डेनमार्क साम्राज्य का हिस्सा है, आर्कटिक क्षेत्र में अपनी सामरिक स्थिति और प्राकृतिक संसाधनों के कारण लंबे समय से महाशक्तियों की निगाहों में रहा है। अमेरिका ने 1946 में भी ग्रीनलैंड को खरीदने का प्रस्ताव रखा था, जिसे डेनमार्क ने अस्वीकार कर दिया था। आज जब जलवायु परिवर्तन आर्कटिक को नए समुद्री मार्गों और खनिज संपदा के द्वार खोल रहा है, तो ग्रीनलैंड का महत्व और भी बढ़ गया है। यही कारण है कि ट्रम्प का दबाव और यूरोप का प्रतिरोध केवल वर्तमान राजनीति नहीं, बल्कि ऐतिहासिक निरंतरता का हिस्सा है। ट्रम्प का यह कहना कि यदि यूरोप ने उनके ग्रीनलैंड अधिग्रहण की राह में बाधा डाली तो वे अतिरिक्त टैरिफ लगाएंगे, केवल आर्थिक धमकी नहीं है। यह उस अमेरिकी नीति का हिस्सा है जिसमें सहयोगियों पर भी दबाव डालकर राष्ट्रीय हित साधने की कोशिश की जाती है। यूरोपीय संघ की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने स्पष्ट कहा कि यूरोप संवाद को प्राथमिकता देता है, लेकिन यदि आवश्यक हुआ तो कार्रवाई करने के लिए तैयार है। यह बयान यूरोप की उस नई आत्मनिर्भरता की दिशा को दर्शाता है जिसमें वह अमेरिकी दबाव से मुक्त होकर अपनी रणनीतिक पहचान गढ़ना चाहता है। इतिहास हमें बताता है कि जब भी महाशक्तियों ने छोटे राष्ट्रों की संप्रभुता को चुनौती दी है, तो वैश्विक असंतुलन पैदा हुआ है। 19वीं सदी में अफ्रीका और एशिया के उपनिवेशीकरण ने विश्व व्यवस्था को अस्थिर किया था। ग्रीनलैंड पर अमेरिकी दावे को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। यह केवल एक द्वीप का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह उस मूलभूत अधिकार का प्रश्न है कि किसी क्षेत्र का भविष्य उसके लोगों और वैध सरकार द्वारा तय किया जाएगा, न कि बाहरी दबाव से। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारर ने सही कहा कि ग्रीनलैंड की सुरक्षा और संप्रभुता मौलिक है। यह बात और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि आर्कटिक क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के कारण तेजी से बदल रहा है। नए समुद्री मार्गों के खुलने से रूस, चीन और अमेरिका जैसी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। ऐसे में ग्रीनलैंड का नियंत्रण केवल भूगोल का नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार और सुरक्षा का भी प्रश्न है। नाटो पर ट्रम्प के हमले और यूरोपीय सहयोगियों के प्रति उनकी अवमानना यह दिखाती है कि अमेरिका अपने पारंपरिक गठबंधनों को भी आर्थिक और सामरिक दबाव के औजार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। लेकिन यूरोप का यह कहना कि वह पूरी तरह तैयार है, एक नए संतुलन की ओर इशारा करता है। यह संतुलन शायद उस बहुध्रुवीय विश्व की ओर ले जाएगा जिसमें अमेरिका अकेला निर्णायक शक्ति नहीं रहेगा। यह विवाद हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वैश्विक राजनीति अब केवल शक्ति से परिभाषित होगी या फिर संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान भी इसमें जगह बनाएगा। यदि अमेरिका ग्रीनलैंड पर दबाव बनाए रखता है और यूरोप प्रतिरोध करता है, तो यह संघर्ष केवल अटलांटिक के दोनों किनारों तक सीमित नहीं रहेगा। यह वैश्विक व्यवस्था की दिशा तय करेगा। भारत जैसे देशों के लिए भी यह विवाद महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह दिखाता है कि छोटे राष्ट्रों की संप्रभुता की रक्षा करना केवल नैतिक प्रश्न नहीं है, बल्कि यह वैश्विक स्थिरता का आधार है। यदि ग्रीनलैंड जैसे क्षेत्र पर बाहरी दबाव सफल होता है, तो यह मिसाल अन्य जगहों पर भी लागू हो सकती है। अंततः, ग्रीनलैंड विवाद हमें यह याद दिलाता है कि शक्ति का असली परीक्षण यह नहीं है कि कोई महाशक्ति कितनी भूमि या संसाधन पर कब्ज़ा कर सकती है, बल्कि यह है कि वह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में कितनी स्थिरता और न्याय सुनिश्चित कर सकती है। यूरोप का प्रतिरोध और अमेरिका का दबाव इस संघर्ष को और तीव्र करेगा। लेकिन इतिहास यही कहता है कि संप्रभुता और अधिकार की आवाज़ अंततः किसी भी सामरिक महत्वाकांक्षा से अधिक स्थायी होती है। यह क्षण वास्तव में एक चौराहे का है—जहां दुनिया को तय करना है कि वह शक्ति की राजनीति को स्वीकार करेगी या संप्रभुता और न्याय की रक्षा के लिए खड़ी होगी। ग्रीनलैंड केवल एक द्वीप नहीं है, यह उस वैश्विक बहस का प्रतीक है जिसमें भविष्य की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का स्वरूप तय होगा। ईएमएस / 24 जनवरी 26