पिछले एक दशक में भारतीय न्यायपालिका की भूमिका को लेकर लगातार गंभीर सवाल उठ रहे हैं। संविधान ने न्यायपालिका को लोकतंत्र का प्रहरी बनाकर सर्वोच्च स्थान दिया है। कार्यपालिका और विधायिका पर न्यायपालिका का संवैधानिक नियंत्रण, नागरिकों के मौलिक अधिकारों का संरक्षण, कानून और नियमों का राज, सभी के लिए समान अवसर यह सुनिश्चित करना न्यायपालिका की जिम्मेदारी है। संवैधानिक संस्थाएँ अपने दायित्व का सही ढंग से निर्बाह कर रही हैं, या नहीं। इस पर नियंत्रण रखने की मूल जिम्मेदारी न्यायपालिका की है। गणतंत्र के 76वें वर्ष में खड़े होकर जब हम देखते हैं, तो वर्तमान की तस्वीर पहले जैसी स्पष्ट और भरोसेमंद नजर नहीं आती है। पिछले कुछ वर्षों में न्यायपालिका मे भ्रष्टाचार बढ़ा है। जिस तरह के निर्णय आ रहे हैं, और टिप्पणियां हो रही हैं, उसको लेकर न्यायपालिका के ऊपर नागरिकों का दिन प्रतिदिन विश्वास घटता चला जा रहा है। बीते वर्षों में कई ऐसी घटनाएँ सामने आईं हैं, जिसने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। न्यायाधीशों की नियुक्ति मे कॉलेजियम बनाम सरकार का टकराव, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जजों की ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस, सुप्रीम कोर्ट में मनमाने तरीके से न्यायाधीशों की बेंच में मामलों की सुनवाई संवैधानिक पीठों के गठन में देरी, महत्वपूर्ण याचिकाओं को वर्षों तक लंबित रखना, राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों की सुनवाई वर्षों तक लंबित रखने, आधे-अधूरे निर्णय देना, आदेश के स्थान पर टिप्पणियां करना। यह सब इस बात का संकेत देते हैं। न्यायिक व्यवस्था में विचारधारा सरकार का दबाव और भेदभावपूर्ण निर्णय देने का चलन बढ़ा है। सरकार मनमाने निर्णय ले रही है। न्यायपालिका कई मामलों में अपेक्षित निर्णय नहीं ले रही है। न्यायपालिका सरकार के प्रति वह कठोरता नहीं दिखा रही, जो संविधान और कानून नियम के अनुसार जरूरी है। नागरिकता कानून, अनुच्छेद 370, चुनावी बांड, जांच एजेंसियों की मनमानी कार्यवाही, नागरिकों की धार्मिक राजनीतिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे विषयों पर न्यायिक सक्रियता की धीमी गति ने न्यायपालिका के प्रति नागरिकों के विश्वास को कमजोर किया है। नागरिकों की यह धारणा बनने लगी है, न्यायपालिका पर कार्यपालिका का दबाव बढ़ गया है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के मनमाने तरीके से ट्रांसफर किए जा रहे हैं। फैासलों को लेकर सरकार का अप्रत्यक्ष दबाव बढ़ता जा रहा है। जिसके कारण हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से अब लोगों को न्याय नहीं मिल पा रहा है। सबसे चिंताजनक आरोप न्यायपालिका पर यह लग रहा है, कि अब “अमीरों के लिए अलग न्याय और गरीबों के लिए अलग न्याय” की स्थिति बनती जा रही है। जमानत के मामलों में असमानता, धार्मिक आधार पर भेदभावपूर्ण फैसले, वर्षों से जेलों में बंद विचाराधीन कैदी, प्रभावशाली आरोपियों को त्वरित राहत मिलने, चुनाव आयुक्त की नियुक्ति, एसआईआर मामले की सुनवाई में तारीख पर तारीख के बीच बिहार विधानसभा के चुनाव हो जाना, इस तरह के सैकड़ों मामले सामने आ चुके हैं। जिससे आम नागरिकों एवं न्यायविदों के मन में न्याय के प्रति अविश्वास देखने को मिल रहा है। न्यायपालिका को सरकार का संरक्षण मिलने और बदले में सरकार के हितों के प्रति नरमी दिखाने के कई फैसलों की चर्चा लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। इस स्थिति का सीधा प्रभाव आम नागरिकों पर पड़ रहा है। न्यायपालिका पर विश्वास कमजोर होता है, तो लोकतंत्र की नींव हिलने लगती है। संविधान की रक्षा का दायित्व न्यायपालिका के ऊपर है। यही लोगों के लिए अंतिम विश्वास के रूप में बना हुआ था जो अब खंडित हो रहा है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है, कि नागरिकों का विश्वास न्यायपालिका के प्रति कैसे बना रहे? इसके लिए न्यायिक स्वतंत्रता जरूरी है। न्यायाधीशों और न्यायालयों को वास्तविक संरक्षण प्राप्त हो, नियुक्तियों और तबादलों में पारदर्शिता बढ़ाई जाए। संवेदनशील मामलों में समयबद्ध सुनवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। गरीब और वंचित वर्ग के लिए त्वरित संवेदनशील न्याय की व्यवस्था मजबूत की जाए। न्यायाधीशों के आचरण में प्रदर्शित हो। न्यायपालिका के फैसलों में स्पष्टता हो। सुप्रीम कोर्ट पूर्व में दिए गए निर्णयों एवं संवैधानिक बेंच द्वारा दिए गए निर्णयों का वर्तमान न्यायाधीश सम्मान करें। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट द्वारा जो फैसले दिए जा रहे हैं, वह स्पष्ट हों, फैसला संविधान कानून और नियम के अनुसार किए गए हैं। यह परीलिक्षित हो। न्यायपालिका की ताकत उसकी साख में है। न्यायपालिका की साख कमजोर हुई, तो पूरा लोकतांत्रिक ढांचा संकट में पड़ जाएगा। आवश्यकता है, न्यायपालिका अपने भीतर झाँके। आत्ममंथन करे, अपने फैसलों से नागरिकों का अटूट विश्वास अर्जित करे। बिना भरोसे का न्याय औपचारिक बन जाता है। ऐसी स्थिति में लोग न्यायपालिका के स्थान पर गुंडे और बदमाशों के पास जाकर न्याय पाने की चेष्टा करते हैं। न्याय पाने के लिए राजनेताओं के पास जाने लगते हैं। ऐसी स्थिति में भीड़-तंत्र स्वयं न्याय पाने के लिए सड़कों पर उतरने लगता है। भारत की न्यायपालिका को अपनी साख बेहतर बनाने की दिशा में काम करना होगा। अन्यथा स्थिति बहुत खराब हो सकती है। एसजे/ 24 जनवरी /2026