राष्ट्रीय मतदाता दिवस पर विशेष) आज पूरा देश राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाया रहा है। इस दिन भारत निर्वाचन आयोग की स्थापना 25 जनवरी सन 1950 में हुई थी। भारत निर्वाचन आयोग की स्थापना दिवस की स्मृति में ये दिन चुना गया है।वास्तव में लोकतंत्र की असली ताकत मतदान पेटी में ही होती है। जब कोई नागरिक वोट डालने मतदान केंद्र पर पहुंचता है, तो वह सिर्फ़ एक बटन नहीं दबाता या फिर मतपत्र पर मुहर नही लगाता,बल्कि वह देश की दिशा भी तय करता है। 26 जनवरी को हमारा देश गणतंत्र हुआ। इस दिन से भारतीय संविधान आधिकारिक तौर पर लागू हुआ, जिसमें हर नागरिक को वोट का अधिकार मिला ।संविधान में दिए गए कर्तव्य में से एक है, भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करना।मतदान रूपी इस कर्तव्य के जरिए प्रत्येक नागरिक लोकतांत्रिक देश के निर्माण में योगदान देता है।राष्ट्रीय मतदाता दिवस इसी नागरिक शक्ति का उत्सव है, जो हर साल हमें हमारे सबसे बड़े अधिकार और कर्तव्य यानी मतदान की याद दिलाता है। अगर हम वोट नहीं देते, तो हम अपने फैसले का अधिकार छोड़ देते हैं। राष्ट्रीय मतदाता दिवस यही सिखाता है कि लोकतंत्र तभी जीवित रहता है, जब नागरिक सक्रिय रहते हैं। देश के 12 राज्यों में 51 करोड़ से अधिक मतदाताओं के घर जब 5 लाख 32 हजार बीएलओ यानि बूथ स्तरीय अधिकारी जब अपना कर्तव्य निभा रहे थे तब मतदाता पुनरीक्षण के दौरान 22 दिनों में 7 राज्यों के अंदर 25 बीएलओ की मौत काम के कथित दबाव के चलते हो गई।जिस पर अखिलेश यादव से लेकर ममता बनर्जी तक ने मतदाता पुनरीक्षण से मौत के मामलों को जोड़ते हुए केंद्र सरकार पर निशाना साधा।बिहार में तीन महीने के भीतर जब मतदाता पुनरीक्षण की प्रक्रिया में 77 हजार 895 बीएलओ यानी बूथ लेवल ऑफिसर लगाये गए थे। देश के अलग-अलग राज्यों से बीएलओ के काम के दबाव में जान देने या फिर अधिकारियों की तरफ से दबाव के आरोप लगाकर नौकरी छोड़ने, काम छोड़ने की खबरें आती रही हैं। मध्य प्रदेश में 9, उत्तर प्रदेश और गुजरात में चार-चार पश्चिम बंगाल और राजस्थान में तीन-तीन, तमिलनाडु-केरल में तीन-तीन बीएलओ के काम करने के दौरान या फिर काम के दबाव की वजह या तो जान गई या फिर आरोप लगा कि काम का दबाव बढ़ने पर उन्होंने जान दे दी। हांलाकि चुनाव आयोग या उससे जुड़े जिले के अधिकारी इन आरोपों को नहीं मानते है, उनका कहना है कि जांच हो रही है, लेकिन सवाल है कि क्या समस्या को जड़ से समझा गया है?उत्तर प्रदेश के जौनपुर में एक परिवार इसलिए टूट गया है, क्योंकि बेटा जो गोंडा में शिक्षक था ,वह बीएलओ की ड्यूटी कर रहा था,और उसने सुसाइड कर लिया था। विपिन यादव ने गोंडा में बीएलओ का काम करते हुए अधिकारियों पर काम के दबाव का आरोप लगाकर जहर खा लिया था।उनपर केवल बीती 4 दिसंबर तक फॉर्म देने, जमा करने और डेटा भरने को लेकर दबाव था । उनके परिजनों ने गंभीर आरोप लगाया है। आरोप है कि ओबीसी का वोट काटने का दबाव दिया जा रहा था। अधिकारियों ने हर आरोप की जांच के लिए कमेटी बना दी है। इसी तरह यूपी के ही बरेली में बीएलओ का काम करते सर्वेश कुमार की भी हार्ट अटैक से मौत हो गई। इसी तरह पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले में बीएलओ का काम करते कमल नस्कर को हार्ट अटैक आ गया और उनकी मौत हो गई। बीएलओ कमल ने लगभग 1160 मतदाता पुनरीक्षण फॉर्म अपने क्षेत्र के वोटरों को घर-घर पहुंचा दिए थे, लेकिन उनमें से वह केवल 20 फॉर्म ही वापस ला पाए, जबकि दबाव था कि 26 दिसम्बर से पहले सारे फॉर्म लेकर आ जाओ। मृतक की बेटी ने आरोप लगाया कि उनके पिता इस काम की वजह से मानसिक तनाव में थे, इसलिए वे बीमार पड़ गए और यह दबाव सहन नहीं कर पाने के कारण उनकी जान चली गई।वही कुछ बीएलओ ऐसे भी है जिन्होंने काम के दबाव में नोकरी ही छोड़ दी।उत्तर प्रदेश के नोएडा से कविता नागर नाम की अध्यापिका ने इस्तीफा देते हुए लिखा है कि मैं हाजीपुर में टीचर हूं,20 साल से काम कर रही हूं, लेकिन अब बीएलओ के तौर पर काम करना कठिन हो गया है। फील्ड में लोगों का व्यवहार और अधिकारियों का रवैया बहुत दुखद है।मानसिक रूप से परेशान हूं, इस्तीफा दे रही हूं। बता दीजिए BLO वाला सारा सामान किसको सौंप दूं। हांलाकि विभाग कहता है कि ये इस्तीफा बस वायरल है, विभाग को नहीं मिला है।यानि हम कह सकते है कि लोकतंत्र के लिए मतदाता पुनरीक्षण कार्य वास्तव में कितना कठिन है ,जो देश के सबसे छोटे अधिकारियो में से कुछ को जान तक से हाथ धोना पड़ा है या फिर नोकरी छोड़नी पड़ी है।जिनकी जान चली गई उन्हें कम से कम आज के लिए हम श्रद्धांजलि तो दे ही सकते है और यह उपाय भी कर सकते है कि फिर ऐसे किसी की जान न जाने पाए। (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 24 जनवरी /2026