राज्य
24-Jan-2026
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प्रदेश की 230 विधानसभा क्षेत्रों में हो महाभारत समागम का आयोजन : केंद्रीय मंत्री उइके भारतीय परंपरा संवाद, सह-अस्तित्व और मानवीय मूल्यों की पक्षधर : श्रीराम तिवारी नृत्य, तकनीक और अभिनय का अद्भुत संगम बनी अठारह दिन प्रस्तुति भोपाल(ईएमएस)। वीर भारत न्यास द्वारा भारत भवन में आयोजित सभ्यताओं के संघर्ष एवं औदार्य की महागाथा पर केंद्रित महाभारत समागम के समापन समारोह को संबोधित करते हुए माननीय केन्द्रीय जनजातीय कार्य राज्य मंत्री दुर्गादास उइके ने कहा कि महाभारत भारतीय सभ्यता का जीवंत ग्रंथ है, जिसमें जीवन, धर्म, नीति और मानवता के शाश्वत मूल्य समाहित हैं। सभ्यताओं के संघर्ष और औदार्य की यह महागाथा हमें यह सिखाती है कि विविधता में एकता और संवाद ही किसी भी समाज की सबसे बड़ी शक्ति होती है। अपने संबोधन में उन्होंने स्वयं को सौभाग्यशाली बताते हुए कहा कि उन्हें तीन बातों का विशेष गर्व है—भारत में जन्म लेना, सनातन धर्म की परंपरा में जन्म लेना और देश को संवेदनशील नेतृत्व प्रदान करने वाले माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व मिलना। उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का उल्लेख करते हुए कहा कि यदुवंश में जन्म लेकर महाकाल की नगरी में पले-बढ़े मुख्यमंत्री के नेतृत्व में मध्यप्रदेश सांस्कृतिक विरासत को नई दिशा दे रहा है। उन्होंने कहा कि साधना, विचार और ब्रह्मांडीय चेतना की यात्रा करने वाले साधकों व कलाकारों के प्रयासों से यह नौ दिवसीय महाभारत समागम आज अपने शिखर पर पहुँचा है, जिसके लिए वे सभी कलाकारों, आयोजकों और रंगमंच से जुड़े लोगों को मैं बधाई एवं शुभकामनाएं देता हूँ। श्री उईके ने कहा कि हजारों वर्षों के इतिहास को जब पवित्र भाव से प्रस्तुत किया जाता है, तो उसमें दैवी शक्तियों का भी सहयोग मिलता है। बुद्धिजीवी श्रोताओं और दर्शकों ने इस उत्सव को नई ऊँचाई दी है। आज माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में देश अपनी सांस्कृतिक विरासत को और मजबूत करेगा, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ सुरक्षित, संस्कारवान और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध भारत का निर्माण कर सकें। उन्होंने भारतीय परंपराओं की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत में मानवीय मूल्य, बलिदान, गुरु-शिष्य परंपरा और सात जन्मों के रिश्तों जैसी अवधारणाएँ आज भी जीवंत हैं, जो भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं। जनजातीय समाज के संदर्भ में उन्होंने एकलव्य का उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु के प्रति श्रद्धा और समर्पण की परंपरा अद्वितीय है। अंत में उन्होंने इच्छा जताई कि प्रदेश की 230 विधानसभा क्षेत्रों में इस तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम निरंतर आयोजित होते रहें, ताकि समाज सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ा रहे और अपनी विरासत को पहचाने। इस अवसर पर वीर भारत न्‍यास के न्‍यासी सचिव श्रीराम तिवारी ने मंत्रीजी का महाभारत का मोमेंटो एवं न्‍यास द्वारा प्रकाशित पुस्‍तक युगयुगीन भारतवंशी भेंट कर स्‍वागत किया गया। इसके साथ ही ब‍िहरंग मंच पर भरत प्रभात निर्देशित अठ्ठारह दिन, पूर्व रंग मंच पर मयूरभंज छाऊ शैली में शुभश्री मुखर्जी द्वारा निर्देशित अभिमन्‍यु वध तथा अंतरंग सभागार में जापान से आये हिरोशी कोइके के निर्देशन में तैयार नाट्य प्रस्‍तुति महाभारत एवं अमृता लहरी द्वारा निर्देशित चित्रांगदा का मंचन किया गया। महाभारत समागम एक साझा सांस्कृतिक सूत्र में पिरोने का सफल प्रयास : श्रीराम तिवारी वीर भारत न्यास के न्यासी सचिव श्रीराम तिवारी ने महाभारत समागम के समापन समारोह में कहा कि सभ्यताओं के संघर्ष एवं औदार्य की महागाथा महाभारत के माध्यम से हमने यह अनुभव किया कि भारतीय परंपरा संवाद, सह-अस्तित्व और मानवीय मूल्यों की पक्षधर रही है। भारत भवन में आयोजित यह समागम देश और दुनिया के विविध कलाकारों, विचारकों और दर्शकों को एक साझा सांस्कृतिक सूत्र में पिरोने का सफल प्रयास रहा। नाटक, नृत्य, संगीत, फिल्म और विमर्श के माध्यम से महाभारत के शाश्वत प्रश्न—धर्म, कर्म, सत्ता, त्याग और करुणा—समकालीन संदर्भों में जीवंत हुए। उन्‍होंने सभी कलाकारों, निर्देशकों, विद्वानों, संस्थाओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि वीर भारत न्यास का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा को नए समय की भाषा में प्रस्तुत करना है। धर्म, कर्म और मानव द्वंद्व को सशक्त करती नृत्य-नाटिका अठारह दिन महाभारत के महान आख्यान पर आधारित नृत्य-नाटिका अठारह दिन एक भव्य और प्रभावशाली मंचीय प्रस्तुति है, जो कुरुक्षेत्र के ऐतिहासिक युद्ध को केंद्र में रखती है। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित इस महाकाव्य के अठारह दिवसीय महासमर को मानव इतिहास का पहला भीषण विश्व युद्ध माना जाता है। यह नृत्य-नाटक युद्ध की घटनाओं के साथ-साथ उसके पीछे छिपे षड्यंत्र, रणनीतियों और मानवीय द्वंद्वों को सशक्त रूप में प्रस्तुत करता है। अठारह दिन केवल युद्ध का दृश्यांकन नहीं, बल्कि धर्म, कर्म, सत्य और कर्तव्य के शाश्वत मूल्यों की गहरी पड़ताल है। यह प्रस्तुति उस सूक्ष्म रेखा को रेखांकित करती है, जो मोह और कर्तव्य, सत्य और असत्य के बीच से गुजरती है। इस नृत्य-नाटिका में भरतनाट्यम, कथक, समकालीन नृत्य और मार्शल आर्ट का अनूठा संयोजन देखने को मिलता है। घटोत्कच, श्रीकृष्ण सहित प्रमुख पात्रों की प्रस्तुति के लिए एरियल तकनीक, माया, उड़ान, उत्तोलन और एवी एनीमेशन का प्रभावी प्रयोग किया गया है। संस्कृत छंदों और अंग्रेज़ी संवादों के माध्यम से कथा को समकालीन संवेदना से जोड़ा गया है। 50 से अधिक कलाकारों और 20 से अधिक तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा सजी यह 90 मिनट की प्रस्तुति दर्शकों को भव्य दृश्यात्मक अनुभव के साथ भारतीय संस्कृति की आत्मा से जोड़ती है। छाऊ नृत्य में मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति महाभारत युद्ध के एक अत्यंत मार्मिक और वीर प्रसंग पर आधारित नृत्य-नाटिका अभिमन्यु वध युवा योद्धा अभिमन्यु की अद्भुत वीरता और बलिदान की कथा प्रस्तुत करती है। अर्जुन की लगातार जीत से विचलित कौरवों ने गुरु द्रोण के नेतृत्व में चक्रव्यूह की रचना की। इस जटिल युद्ध-रणनीति में फँसे अभिमन्यु ने अदम्य साहस के साथ कौरवों का सामना किया और वीरगति को प्राप्त हुए। नृत्य-प्रस्तुति का आरंभ श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों के आह्वान से होता है। इसके बाद द्रोणाचार्य द्वारा पांडवों और कौरवों को दिए गए युद्ध प्रशिक्षण, महाभारत युद्ध और चक्रव्यूह रचना के दिन की घटनाओं को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत किया गया है। मंच पर कथा सहज प्रवाह के साथ आगे बढ़ती है। यह नृत्य-नाटिका केवल युद्ध का चित्रण नहीं, बल्कि एक पिता अर्जुन की विवशता, गुरु द्रोण का द्वंद्व और एक युवा योद्धा के बलिदान की करुण कथा है। छाऊ नृत्य शैली के जोशीले मार्शल आंदोलनों के माध्यम से मानवीय भावनाएँ प्रभावशाली रूप में उभरती हैं। अभिमन्यु वध के माध्यम से गीता के शाश्वत संदेश दर्शकों तक सशक्त रूप में पहुँचते हैं। जापानी रंगमंच में महाभारत का समकालीन और मानवीय रूप हिरोशी कोइके ब्रिज कंपनी, जापान द्वारा प्रस्तुत और हिरोशी कोइके निर्देशित महाभारत की नाट्य प्रस्तुति ने दर्शकों को एक अनूठा अंतर-सांस्कृतिक अनुभव प्रदान किया। यह मंचन महाभारत को शक्ति, कर्तव्य, त्याग और मानवीय सीमाओं पर गहन विमर्श के रूप में प्रस्तुत करता है। जापान सहित एशिया के विभिन्न देशों के कलाकारों की सहभागिता से कथा बहु-स्वरीय रूप में उभरती है। महोत्सव में प्रस्तुत शपथ और पाप भीष्म के त्याग और त्रासदी को सशक्त रूप से सामने लाती है, जो आज के दर्शक से सीधा संवाद स्थापित करती है। अष्टावक्र और वत्‍सला हरण के मंचन के साथ हुआ कठपुतली महोत्सव समापन महाभारत समागम अंतर्गत आयोजित तीन दिवसीय कठपुतली समारोह के अंतिम दिन दो विशेष प्रस्तुतियों का मंचन किया गया। पहले सत्र में प्रसिद्ध कठपुतली कलाकार अनुपमा होस्केरे के निर्देशन में ‘अष्टावक्र’ का मंचन हुआ, जबकि समापन प्रस्तुति ‘वत्सला हरण’ निर्देशक गणपत सखाराम मसागे द्वारा प्रस्तुत की गई। अनुपमा होस्केरे ने कहा कि वे पिछले 30 वर्षों से कठपुतली कला के माध्यम से समाज को महाभारत और रामायण जैसे महान ग्रंथों के पाठ की ओर प्रेरित कर रही हैं, ताकि भारतीय संस्कृति और परंपरा जीवित रह सके। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता गणपत सखाराम मसागे का कहना है कि उनके पास कठपुतली कला की 12 पारंपरिक विधाएँ हैं और यह उनका पहला हिंदी मंचन था, क्योंकि सामान्यतः वे अपने सभी कार्यक्रम मराठी भाषा में प्रस्तुत करते हैं। हरि प्रसाद पाल / 24 जनवरी, 2026