ज़रा हटके
29-Jan-2026
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-शाहबानो पर बनी बॉलीवुड फिल्म ‘हक’ का दिख रहा असर लोग बोले- यह फिल्म नफरत नहीं फैलाती, बल्कि समाज को सोचने पर करती है मजबूर इस्लामाबाद,(ईएमएस)। बॉलीवुड फिल्म ‘हक’ की रिलीज के बाद पाकिस्तान में भी तीन तलाक और मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को लेकर चर्चा शुरु गई है। शाह बानो केस पर आधारित यह फिल्म किसी धर्म या देश के खिलाफ नहीं, बल्कि एक महिला के इंसाफ और उसके कानूनी अधिकारों की है। पाकिस्तानी दर्शकों का कहना है कि फिल्म नफरत नहीं फैलाती, बल्कि समाज को सोचने पर मजबूर करती है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत और पाकिस्तान में शादी और तलाक दोनों ही कानूनी प्रक्रिया हैं, लेकिन कानूनों का ढांचा अलग है। भारत में तलाक धर्म आधारित पर्सनल लॉ और फैमिली कोर्ट के जरिए होता है, जबकि पाकिस्तान में शादी और तलाक पूरी तरह मुस्लिम फैमिली लॉ ऑर्डिनेंस 1961 के तहत संचालित होते हैं। पाकिस्तान में निकाह का रजिस्ट्रेशन यूनियन काउंसिल में होता है और तलाक की प्रक्रिया भी उसी से जुड़ी होती है। पाकिस्तान में पति और पत्नी दोनों को तलाक का अधिकार है, लेकिन इसके लिए तय कानूनी शर्तों का पालन जरूरी है। पति को तलाक देने की स्थिति में यूनियन काउंसिल के चेयरमैन को लिखित नोटिस देना होता है और उसकी कॉपी पत्नी को भेजना अनिवार्य है। इसके बाद 90 दिन की प्रतीक्षा अवधि होती है, जिसके दौरान सुलह की कोशिश की जाती है। नोटिस मिलने के 30 दिन के अंदर आर्बिट्रेशन काउंसिल बनाई जाती है और पति-पत्नी के बीच समझौते का प्रयास होता है। अगर सुलह नहीं होती, तो 90 दिन पूरे होने के बाद तलाक प्रभावी माना जाता है और यूनियन काउंसिल डिवोर्स सर्टिफिकेट जारी करती है। रिपोर्ट में लाहौर की वकील के हवाले से बातया गया है कि पाकिस्तान में तलाक एक पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया है और इसमें फैमिली कोर्ट की अहम भूमिका होती है। पत्नी के पास अगर निकाहनामा में तलाक का अधिकार नहीं है, तो वह कोर्ट में खुला के लिए अर्जी दे सकती है। कोर्ट से खुला मंजूर होने पर विवाह समाप्त हो जाता है। आमतौर पर खुला की स्थिति में पत्नी को हक मेहर लौटाना या छोड़ना पड़ता है। पाकिस्तान में तलाक के चार मुख्य तरीके माने जाते हैं- पति द्वारा तलाक, तलाक-ए-तफ़वीज़, अदालत से खुला और आपसी सहमति से तलाक (तलाक-ए-मुबारात)। बच्चों की कस्टडी, गुजारा भत्ता, मेहर और संपत्ति से जुड़े मामलों का फैसला फैमिली कोर्ट एक्ट के तहत होता है, जिसमें बच्चे की भलाई को सर्वोपरि रखा जाता है। विदेश में रहने वाले पाकिस्तानी लोगों पर भी यही कानून लागू होता है। उन्हें एंबेसी या काउंसलेट के जरिए यूनियन काउंसिल को सूचना देनी होती है। कुल मिलाकर, पाकिस्तान में तलाक एक तय और केंद्रीय कानूनी ढांचे के तहत होता है, जिसमें महिला और पुरुष-दोनों के अधिकारों को कानून में जगह दी गई है। सिराज/ईएमएस 29 जनवरी 2026