नई दिल्ली (ईएमएस)। चूहा, बंदर और खरगोश के बाद अब जेब्राफिश दवाओं के परीक्षण के लिए इस्तेमाल हो रही है। ताजा रिपोर्ट में दावा है कि देश में सबसे पहले आयुष शिक्षण संस्थान के रूप में जयपुर के राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान ने आधुनिक प्रयोगशाला स्थापित कर जेब्राफिश पर आयुर्वेदिक दवाओं के परीक्षण की शुरुआत कर दी है। आयुर्वेदिक जानकारों का मानना हैं कि जेब्राफिश से रिसर्च की स्पीड और एक्यूरेसी में बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। आयुर्वेदिक संस्थान का कहना है कि आयुर्वेद हजारों सालों के अनुभव पर आधारित है, लेकिन ग्लोबल लेवल पर आयुर्वेदिक दवाओं की स्वीकार्यता बढ़ाने और सटीक वैज्ञानिक डेटा हासिल करने के लिए दवाओं को लेकर रिसर्च पर काम चल रहा है। इस कड़ी में अब जेब्राफिश पर आयुर्वेदिक दवाओं का प्री-क्लीनिकल ट्रायल किया जा रहा है। दरअसल जेब्राफिश एक छोटे साइज वाली मीठे पानी की मछली है। इसका वैज्ञानिक नाम डैनियो रेरियो है। करीब दो इंच तक इसकी लंबाई होती है। आयुर्वेदिक दवाओं की प्री क्लीनिकल ट्रायल के लिए जेब्राफिश के चयन के कई कारण हैं। इंसान और जेब्राफिश के बीच जेनेटिक समानताएं हैं। इंसानों और जेब्राफिश के जीन 70 फीसदी तक समान होते हैं। इसके भ्रूण पारदर्शी होते हैं। इससे रिसर्च करने वाले माइक्रोस्कोप के जरिए यह देख सकते हैं कि दवा मछली के हृदय, मस्तिष्क या अन्य अंगों पर कैसे काम कर रही है। जेब्राफिश का अन्य जीवों के मुकाबले तेजी से तैयार होता है। जेब्राफिश के अंग 24 से 48 घंटों के अंदर विकसित होने शुरू कर देते हैं। यह एक साथ 100 से अधिक अंडे देती है। चूहों और अन्य जीवों पर परीक्षण करने में समय ज्यादा लगता है, जबकि जेब्राफिश पर परीक्षण कुछ ही दिनों में पूरा हो जाता है। चूहों या बंदरों की तुलना में जेब्राफिश का रख-रखाव काफी सस्ता होता है। इन्हें कम जगह में बड़ी संख्या में पाला जा सकता है। इन पर प्रयोग करना कम जटिल माना जाता है। दुनिया में किसी भी नई दवा को बाजार में लाने से पहले दो चरणों से गुजरना होता है। पहला है प्री-क्लिनिकल ट्रायल और दूसरा है क्लिनिकल ट्रायल। प्री-क्लिनिकल ट्रायल किसी भी दवा के रिसर्च का पहला चरण है। ये ट्रायल पहले जीवों पर यानी चूहों, खरगोश, बंदरों या जेब्राफिश पर होता है। इसमें दवा से अंगों के डेवलपमेंट, नुकसान, सुरक्षित खुराक को देखा जाता है। जब प्री-क्लिनिकल ट्रायल में दवा सुरक्षित और प्रभावी पाई जाती है, तब इन दवाओं को इंसानों पर टेस्ट किया जाता है। इस प्रक्रिया को क्लिनिकल ट्रायल कहा जाता है। राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में रस शास्त्र विभाग के एचओडी डॉ.अनुपम श्रीवास्तव ने बताया कि जेब्राफिश मॉडल बायोमेडिकल रिसर्च का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इस पर किए जाने वाले रिसर्च से मिलने वाली जानकारी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेषज्ञों को समझने एवं स्वीकार करने में सहायक होगी। उन्होंने दावा किया कि आयुर्वेद में देशभर में राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में सबसे पहले इसकी शुरुआत की गई है। अब धीरे धीरे अन्य संस्थानों में भी इसकी शुरुआत की जा रही है। आशीष/ईएमएस 29 जनवरी 2026