लेख
02-Feb-2026
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*आम बजट 2026-27 एक आशावादी सरकारी दस्तावेज है,पर इसकी असली परीक्षा जमीन पर होगी।किसान के खेत में,मजदूर की हथेली में,युवा की नौकरी में, महिला के उद्यम में और गरीब की थाली में। बजट भाषण में शब्द बहुत हैं,योजनाएँ बहुत हैं,सरकारी आँकड़ो का अम्बार हैं। वही देश का आम आदमी पूछता है—क्या इस बार सपने सच होंगे?यही बजट की कहानी है -आशा और निराशा के बीच खड़ा भारत,खुशी और गम के बीच अपनी राह तलाशता हुआ नजर आ रहा है।* देश के लोकतंत्र में बजट केवल आय-व्यय का सरकारी दस्तावेज नहीं होता,बल्कि राष्ट्र की सामूहिक धड़कन होती है,जिसमें करोड़ों लोगों की आशाएँ,सपने,शिकायतें और संघर्ष एक साथ सांस लेते हैं।आम बजट 2026-27 भी ठीक ऐसा ही है-एक ओर विकास की तेज रफ्तार का दावा,दूसरी ओर आम आदमी की जेब में चुभती महँगाई और रोजगार की चिंता।यह बजट उम्मीद और निराशा के बीच झूलते भारत का आईना है,जिसमें खुशी की चमक भी है और गम की गहराई भी।केन्द्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने जब लोकसभा में यह कहा कि सार्वजनिक पूंजीगत व्यय 2014-15 के ₹2 लाख करोड़ से बढ़कर 2025-26 में ₹11.2 लाख करोड़ तक पहुँच गया है और अब इसे 2026-27 में ₹12.2 लाख करोड़ करने का प्रस्ताव है,तो यह घोषणा केवल एक संख्या नहीं थी। यह उस भारत का संदेश था जो सड़क, रेल,बंदरगाह,डिजिटल नेटवर्क और औद्योगिक गलियारों के माध्यम से भविष्य की नींव रख रहा है।सवाल यह भी उठता है कि क्या इस विकास की ईंटें गरीब की झोपड़ी तक गर्माहट पहुँचा पाएँगी, या यह केवल महानगरों के सपनों की इमारत बनकर रह जाएगा?सरकार ने निजी निवेश को भरोसा देने के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर रिस्क गारंटी फंड की घोषणा की है, जो ऋणदाताओं को आंशिक क्रेडिट गारंटी देगा।यह एक साहसिक कदम है,क्योंकि देश की विकास यात्रा में निजी क्षेत्र की भागीदारी आवश्यक है।इसी के साथ आम नागरिक के मन में यह चिंता भी है कि जब बड़े डेवलपर्स के जोखिम सरकार उठाएगी,तो छोटे किसान और मजदूर के जोखिम कौन उठाएगा? विकास का पुल तभी मजबूत होगा जब उसके दोनों छोर समान रूप से सुरक्षित हों। राजकोषीय घाटा जीडीपी का 4.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष 4.4 प्रतिशत था। ऋण-से-जीडीपी अनुपात भी 55.6 प्रतिशत रहने की बात कही गई है। आर्थिक अनुशासन की यह तस्वीर बाजारों को राहत देती है,निवेशकों को भरोसा देती है।आम जनता के लिए सवाल वही पुराना है -क्या यह अनुशासन उनके जीवन में सस्ती शिक्षा,बेहतर स्वास्थ्य और स्थायी रोजगार का अनुशासन बन पाएगा?बजट में किसानों,पशुपालकों और ग्रामीण भारत के लिए कई घोषणाएँ की गई हैं।छोटे और सीमांत किसानों की आय बढ़ाने पर जोर, मत्स्य पालन के लिए 500 जलाशयों का विकास,पशुपालन क्षेत्र के लिए लोन आधारित सब्सिडी कार्यक्रम,तटीय फसलों के लिए सहायता,नारियल,काजू, कोको,चंदन जैसी फसलों को वैश्विक ब्रांड बनाने की योजना—ये सब सुनने में आशाजनक हैं। ग्रामीण भारत के लिए यह राहत की सांस है। परंतु खेतों में खड़ा किसान आज भी पूछता है - क्या यह योजनाएँ कागज से निकलकर जमीन तक पहुँचेंगी? या फिर यह भी फाइलों की धूल में दब जाएँगी? भारत-VISTAAR जैसे बहुभाषी एआई टूल की शुरुआत किसानों को आधुनिक निर्णय लेने में मदद करेगी।यह डिजिटल क्रांति का नया अध्याय है।इसी के साथ यह चिंता भी है कि क्या देश का हर किसान डिजिटल रूप से सक्षम है? क्या गांवों में इंटरनेट और प्रशिक्षण की वह व्यवस्था है,जो इस एआई टूल को सचमुच किसान का साथी बना सके?बजट में खेल क्षेत्र के लिए खेलो इंडिया मिशन की घोषणा भी युवाओं के लिए उम्मीद की किरण है।अगले दशक में खेल प्रतिभाओं को निखारने,खेल तकनीक और इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करने की बात कही गई है।भारत जिस तरह वैश्विक मंच पर खेलों में उभर रहा है,यह पहल उसे नई ऊँचाई दे सकती है।गाँव की मिट्टी में दौड़ता बच्चा आज भी पूछता है -क्या उसके पास मैदान होगा,कोच होगा, संसाधन होंगे?युवाओं की क्षमता बढ़ाने के लिए सेवा क्षेत्र पर जोर,शिक्षा से रोजगार और उद्यम पर स्थायी समिति, 2047 तक सेवा क्षेत्र में वैश्विक हिस्सेदारी बढ़ाने का लक्ष्य—ये घोषणाएँ भविष्य की दिशा बताती हैं। लेकिन आज का युवा, जो प्रतियोगी परीक्षाओं की भीड़ में खड़ा है,जो बेरोजगारी की मार झेल रहा है,उसके लिए यह भविष्य थोड़ा दूर और धुंधला लगता है।उसे आज चाहिए नौकरी,आज चाहिए अवसर,आज चाहिए भरोसा। बैंकिंग सेक्टर में सुधार,कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार काविस्तार,म्यूनिसिपल बॉन्ड को बढ़ावा, निवेश सीमा बढ़ाने की घोषणाएँ वित्तीय जगत के लिए सकारात्मक हैं। परंतु आम आदमी के लिए बैंकिंग सुधार का अर्थ तभी है जब उसे सस्ता ऋण मिले,उसकी बचत सुरक्षित हो और उसका आर्थिक जीवन आसान बने। ग्रामीण महिलाओं के लिए शी- मार्ट्स की घोषणा एक सामाजिक बदलाव का संकेत है।स्व-सहायता समूहों की महिलाएँ अब बाजार से जुड़ेंगी,उद्यमी बनेंगी।यह बजट की सबसे सुंदर तस्वीरों में से एक है, जहाँ विकास का चेहरा महिला नेतृत्व में दिखाई देता है।यह आशाओं की वह किरण है जो ग्रामीण भारत की आंखों में चमक सकती है।पर्यटन के लिए राष्ट्रीय हॉस्पिटैलिटी संस्थान,10 हजार गाइड्स को प्रशिक्षित करने की योजना,डिजिटल नॉलेज ग्रिड, ट्रैकिंग और हाइकिंग ट्रेल्स, पुरातात्विक स्थलों का विकास—ये भारत की सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा देंगे।इससे रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।क्या यह रोजगार स्थायी होंगे या केवल मौसमी? स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में भी कई घोषणाएँ हुई हैं - स्वास्थ्य संस्थानों का अपग्रेडेशन, एक लाख नए स्वास्थ्य पेशेवर,मेडिकल टूरिज्म के लिए क्षेत्रीय हब,आयुर्वेद संस्थानों की स्थापना।यह सुनकर लगता है कि सरकार स्वास्थ्य को प्राथमिकता दे रही है।परंतु सरकारी अस्पतालों की भीड़,दवाओं की कमी और इलाज की महँगाई आज भी आम आदमी की पीड़ा है। कपड़ा उद्योग के लिए राष्ट्रीय फाइबर योजना,समर्थ 2.0,मेगा टेक्सटाइल पार्क और हथकरघा- हस्तशिल्प कार्यक्रम ग्रामीण रोजगार को बढ़ावा दे सकते हैं।यह भारत की परंपरा और आधुनिकता का संगम है तो वही बुनकर आज भी न्यूनतम मजदूरी और बाजार की मार से जूझ रहा है।सबसे बड़ा आकर्षण रहा—20 नए जलमार्ग और सात हाई स्पीड रेल कॉरिडोर का एलान।यह भारत की गतिशीलता का सपना है।मुंबई से पुणे, दिल्ली से वाराणसी, चेन्नई से बंगलूरू तक हाई स्पीड रेल नेटवर्क देश को जोड़ने की नई कहानी लिखेगा।यह विकास का गर्व है। लेकिन इसी के साथ यह सवाल भी है-क्या आम यात्री के लिए यह यात्रा सस्ती होगी या केवल उच्च वर्ग की सुविधा बनकर रह जाएगी? सरकार ने सात क्षेत्रों में आर्थिक विकास की पहल का प्रस्ताव रखा है -विनिर्माण,एमएसएमई,ऊर्जा सुरक्षा,शहरी विकास,कैपिटल गुड्स,टेक्सटाइल और बायो फार्मा शक्ति।यह एक व्यापक रोडमैप है। सेमीकंडक्टर मिशन और रेयर अर्थ कॉरिडोर जैसी योजनाएँ भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूत बनाएंगी। सन 2025 - 2026 का केन्द्रीय आम बजट का सच यही है -यह उम्मीदों का गुलदस्ता भी है और निराशाओं का कांटा भी।यह विकास की घोषणा भी है और आम आदमी की चिंता भी।खुशी इस बात की है कि भारत भविष्य की ओर बढ़ रहा है।गम इस बात का है कि यह भविष्य कब तक हर घर के दरवाजे तक पहुंचेगा? आम बजट 2026-27 एक आशावादी सरकारी दस्तावेज है,पर इसकी असली परीक्षा जमीन पर होगी।किसान के खेत में,मजदूर की हथेली में,युवा की नौकरी में, महिला के उद्यम में और गरीब की थाली में। बजट भाषण में शब्द बहुत हैं,योजनाएँ बहुत हैं, सरकारी आँकड़ो का अम्बार हैं। वही देश का आम आदमी पूछता है—क्या इस बार सपने सच होंगे?यही बजट की कहानी है -आशा और निराशा के बीच खड़ा भारत, खुशी और गम के बीच अपनी राह तलाशता हुआ नजर आ रहा है। (स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तम्भकार) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 2 फरवरी /2026