ज़रा हटके
04-Feb-2026
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लॉन्गइयरबायेन (ईएमएस)। दुनिया के नक्शे के अंतिम छोर नॉर्वे के दूरस्थ इलाके लॉन्गइयरबायेन में मानवता का भविष्य सुरक्षित रखा गया है। मानव सभ्यता का संपूर्ण डिजिटल बैकअप संरक्षित रखा जा रहा है, ताकि प्रलय की स्थिति में भी मानव सभ्यता को बचाया जा सके। नॉर्थ पोल के बेहद करीब स्थित यह छोटा सा द्वीपीय क्षेत्र रोमांच, खतरे और रहस्य से भरा है। यहां तक पहुंचना आसान नहीं कड़ाके की ठंड, हर पल पोलर बियर का डर और साल के कई महीनों तक सूरज की अनुपस्थिति इसे हमेशा चुनौतीपूर्ण बनाते हैं। लेकिन इसी वीरान बर्फीली पहाड़ी के भीतर दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह छिपी है, जिसे ‘डूम्सडे वॉल्ट’ या ‘प्रलय की तिजोरी’ कहा जाता है। शुरुआत में इसे ग्लोबल सीड वॉल्ट के रूप में बनाया गया था, जहां दुनिया भर की फसलों के बीज सुरक्षित रखे गए हैं। यह इस सोच के साथ बनाया गया कि यदि कभी वैश्विक तबाही हो जाए और कृषि नष्ट हो जाए, तो इंसान इन्हीं बीजों के सहारे फिर से खेती शुरू कर सके। लेकिन समय के साथ यह तिजोरी सिर्फ बीजों तक सीमित नहीं रही। इस पहाड़ के भीतर अब आर्कटिक वर्ल्ड आर्काइव नामक दूसरा बड़ा मिशन भी संचालित हो रहा है, जहां मानव सभ्यता का संपूर्ण डिजिटल बैकअप संरक्षित रखा जा रहा है। यदि कभी इंटरनेट ठप हो जाए, सर्वर नष्ट हो जाएं या डिजिटल जानकारी मिट जाए, तब भी मानवता का ज्ञान और इतिहास सुरक्षित रह सके—यही इसका उद्देश्य है। भारत ने भी इस वैश्विक प्रयास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। ताजमहल का थ्री-डी डिजिटल रिकॉर्ड, भारतीय संविधान की प्रतिलिपि, दुर्लभ पांडुलिपियां और इसरो के प्रमुख अभियानों से जुड़े अहम डेटा इस तिजोरी में सुरक्षित हैं। हैदराबाद स्थित आईसीआरआईएसएटी और अन्य भारतीय कृषि संस्थानों के जरिए एक लाख से अधिक बीज नमूने यहां भेजकर भारत ने अपनी जैव-विविधता का स्थायी संरक्षण किया है। इनमें ज्वार, बाजरा, रागी जैसे श्रीअन्न और दाल-चावल की दुर्लभ किस्में शामिल हैं। इस वॉल्ट की सुरक्षा इसकी सबसे बड़ी ताकत है। यह पूरी तरह ऑफलाइन है, जहां इंटरनेट का कोई दखल नहीं, इसलिए साइबर हमलों की कोई गुंजाइश नहीं। डेटा विशेष फिल्म पर दर्ज किया जाता है, जो बिना बिजली के भी सैकड़ों वर्षों तक सुरक्षित रह सकता है। प्राकृतिक बर्फ यानी परमाफ्रॉस्ट इसे लगातार ठंडा और स्थिर तापमान में बनाए रखता है। सुदामा/ईएमएस 04 फरवरी 2026