नई दिल्ली (ईएमएस)। अष्ट कुंभक ऐसा विशिष्ट योग अभ्यास है, जिसमें प्राणायाम की आठ उन्नत तकनीकों का समावेश होता है। इसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथ हठ योग प्रदीपिका में मिलता है, जहां इसे श्वसन क्षमता बढ़ाने और सूक्ष्म ऊर्जाओं को जागृत करने वाला अभ्यास बताया गया है। मोरारजी देसाई नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ योगा के अनुसार, योग को अक्सर केवल शारीरिक व्यायाम के रूप में देखा जाता है, लेकिन वास्तव में यह मानसिक शांति और आंतरिक संतुलन का भी सशक्त माध्यम है। अष्ट कुंभक के अंतर्गत सूर्य भेदन, उज्जायी, सीतकारी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्छा और प्लाविनी प्राणायाम शामिल हैं। ये सभी तकनीकें अलग-अलग तरीके से शरीर और मन पर सकारात्मक प्रभाव डालती हैं। सूर्य भेदन और भस्त्रिका शरीर में ऊर्जा का संचार करती हैं, वहीं शीतली और सीतकारी शरीर को शीतलता प्रदान करती हैं। उज्जायी और भ्रामरी मानसिक एकाग्रता बढ़ाने में सहायक मानी जाती हैं, जबकि मूर्छा और प्लाविनी उन्नत स्तर की साधनाएं हैं, जिनका अभ्यास अनुभवी मार्गदर्शन में करने की सलाह दी जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, अष्ट कुंभक का अभ्यास करने से पहले शांत और स्वच्छ स्थान का चयन कर प्रारंभिक ध्यान आवश्यक होता है। इसके बाद आठों प्राणायाम तकनीकों का क्रमबद्ध अभ्यास किया जाता है। प्रत्येक प्राणायाम को सामान्यतः 5 से 10 बार दोहराने की सलाह दी जाती है। इस दौरान श्वास-प्रश्वास की सही विधि और शरीर की सहज स्थिति पर विशेष ध्यान देना जरूरी होता है, ताकि अभ्यास का पूरा लाभ मिल सके। नियमित रूप से अष्ट कुंभक करने से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार देखा जाता है। यह तनाव और चिंता को कम करने के साथ-साथ मानसिक स्थिरता को बढ़ावा देता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह अभ्यास शारीरिक शक्ति, सहनशक्ति और मानसिक स्पष्टता को बढ़ाने में सहायक है। इसके साथ ही श्वसन प्रणाली मजबूत होती है, रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार आता है और मेटाबॉलिज्म बेहतर होता है, जिससे वजन नियंत्रण में भी मदद मिलती है। हालांकि, अष्ट कुंभक एक उन्नत योग अभ्यास है, इसलिए किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य समस्या से ग्रस्त लोगों को इसे अपनाने से पहले चिकित्सकीय या योग विशेषज्ञ की सलाह लेना आवश्यक है। सुदामा/ईएमएस 05 फरवरी 2026