राज्य
06-Feb-2026
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- नेत्र रोग विभाग में विभागाध्यक्ष नियुक्ति को लेकर बढ़ा विवाद - रोटेशन नीति ठंडे बस्ते में, एनटीए के सौंपा आवेदन ग्वालियर (ईएमएस)। गजराराजा चिकित्सा महाविद्यालय में इन दिनों एक अनोखी बीमारी फैलती नजर आ रही है जिसका नाम है “रोटेशन नीति एलर्जी”। शासन के स्पष्ट आदेश, वरिष्ठता की तय कसौटी और विभागीय परंपरा सब कुछ मौजूद है, लेकिन नेत्र रोग विभाग में विभागाध्यक्ष (एचओडी) की कुर्सी अब तक खाली पड़ी है। लगता है कुर्सी तो है, पर उस पर बैठने की हिम्मत किसी में नहीं। शासनादेश कहता है कि विभागाध्यक्ष पद पर रोटेशन के आधार पर वरिष्ठतम डॉक्टर को जिम्मेदारी सौंपी जाए, लेकिन कॉलेज प्रबंधन ने मानो इस आदेश को फाइलों के तहखाने में सुला दिया है। सवाल यह नहीं कि नियम क्या हैं, सवाल यह है कि नियम किसके लिए हैं? मेडिकल टीचर एसोसिएशन ने भी डीन को पत्र लिखकर आईना दिखाया और साफ कहा कि डॉ. डी.के. शाक्य को रोटेशन के आधार पर एचओडी बनाया जाना चाहिए। लेकिन इस पत्र का भी वही हश्र हुआ, जो अक्सर सच बोलने वाले कागजों का होता है- “प्राप्त हुआ, पढ़ा नहीं गया।” नेत्र रोग विभाग में विडंबना यह है कि डॉक्टर आंखों का इलाज करते हैं, लेकिन प्रशासन को सच्चाई दिख ही नहीं रही। एचओडी की कुर्सी खाली है, पर सवालों से भरी हुई। छात्र, शिक्षक और कर्मचारी सब देख रहे हैं कि नियमों की अनदेखी कैसे “प्रशासनिक विवेक” के नाम पर की जा रही है। गजराराजा चिकित्सा महाविद्यालय में विभागाध्यक्ष पद की रोटेशन नीति को लेकर विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। शासन द्वारा निर्धारित स्पष्ट नियमों और वरिष्ठता के प्रावधानों के बावजूद नेत्र रोग विभाग में लंबे समय से रोटेशन के आधार पर विभागाध्यक्ष की नियुक्ति नहीं की गई है। जिसको लेकर एक ओर जहां मेडिकल टीचर एसोसिएशन (एमटीए) ने महाविद्यालय प्रबंधन के रवैये पर सवाल उठाए हैं, वहीं दूसरी ओर वरिष्ठत नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. डी. के. शाक्य ने चिकित्सा शिक्षा आयुक्त को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है। जानकारी के अनुसार नेत्र रोग विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. डी. के. शाक्य वर्ष 1990 से निरंतर राज्य शासन की सेवाओं में कार्यरत हैं और वर्तमान में प्रदेश के सबसे वरिष्ठ प्राध्यापक की सूची में शामिल हैं। शासन की नीति के अनुसार विभागाध्यक्ष का कार्यकाल दो वर्ष का निर्धारित है, लेकिन वर्तमान विभागाध्यक्ष द्वारा 2 वर्ष 4 माह का कार्यकाल पूर्ण किए जाने के बाद भी रोटेशन आदेश जारी नहीं किए गए। डॉ. शाक्य का कहना है कि इस संबंध में वे महाविद्यालय अधिष्ठाता को कई बार मौखिक एवं लिखित आवेदन दे चुके हैं, परंतु अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया। इधर एमटीए के सचिव डॉ. अनुराग चौहान और अध्यक्ष डॉ. अक्षय कुमार निगम अधिष्ठाता को पत्र सौंप नियम अनुसार विभागाध्यक्ष का रोटेशन किए जाने की मांग भी की है। एमटीए ने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया है कि महाविद्यालय के अन्य क्लिनिकल विभागों में रोटेशन नीति समय पर लागू की गई है, जबकि नेत्र रोग विभाग में अनावश्यक विलंब किया जा रहा है। जिसको लेकर अब यह सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या रोटेशन नीति केवल कागजों तक सीमित है, या फिर किसी दबाव अथवा आंतरिक कारणों से निर्णय रोका जा रहा है। बॉक्स पूर्व छात्र के अधीन कार्य करना अत्यंत कष्टदायक डॉ. शाक्य ने चिकित्सा शिक्षा आयुक्तको लिखे पत्र में कहा है कि वर्ष 2027 में सेवानिवृत्ति से पूर्व वरिष्ठता के नियमों का पालन न होना उनके लिए मानसिक पीड़ा और पेशेवर अपमान का कारण बन रहा है। 35 वर्षों की सेवा के बाद अपने ही पूर्व छात्र के अधीन कार्य करना उनके लिए अत्यंत कष्टदायक स्थिति है।