-सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों पर ध्यान नहीं, आदेश चुनौती योग्य जबलपुर (ईएमएस)। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर ने धार्मिक भावनाएं आहत करने और मानहानि से जुड़े एक बहुचर्चित आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने संजय जैन द्वारा दायर दो याचिकाओं को खारिज करते हुए निचली अदालत और सत्र न्यायालय के आदेशों को बरकरार रखा है। यह मामला सागर जिले के कोतवाली थाना क्षेत्र में दर्ज एफआईआर से संबंधित है। एफआईआर में आरोप था कि लिखित सामग्री का प्रसार कर एक पूज्य धार्मिक व्यक्तित्व के खिलाफ आपत्तिजनक और मानहानिकारक टिप्पणी की गई। पुलिस ने इस मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 295-ए, 500, 501 और 502 के तहत प्रकरण दर्ज कर चालान पेश किया था, जिस पर ट्रायल कोर्ट ने संज्ञान ले लिया था। हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि धारा 295-ए जैसे अपराधों में संज्ञान लेने से पहले दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 196 के तहत शासन की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य है। अदालत ने पाया कि संज्ञान के समय यह स्वीकृति उपलब्ध नहीं थी और बाद में प्राप्त अनुमति से पहले की कार्यवाही वैध नहीं मानी जा सकती। न्यायालय ने कहा कि बिना आवश्यक पूर्व स्वीकृति के लिया गया संज्ञान “शून्य से” (void ab initio) होता है और बाद की अनुमति से इस त्रुटि को दूर नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर सत्र न्यायालय द्वारा आपराधिक कार्यवाही समाप्त करने के आदेश को सही ठहराया गया। इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए जबलपुर हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता ग्रीष्म जैन ने कहा कि माननीय उच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के उन निर्णयों पर ध्यान नहीं दिया, जिनमें यह स्पष्ट किया गया है कि यदि शासन से बाद में अनुमति प्राप्त हो जाए तो निचली अदालत पुनः कार्यवाही प्रारंभ कर सकती है। उन्होंने कहा कि शासन की ओर से यह तर्क भी दिया गया था कि बाद में मिली स्वीकृति के आधार पर कार्यवाही जारी रखी जा सकती है, लेकिन हाईकोर्ट के आदेश के पैरा 21 को पढ़ने से ऐसा प्रतीत होता है कि शासन ने अप्रत्यक्ष रूप से अभियुक्तों को समर्थन दिया है। इस कारण यह आदेश उच्चतम न्यायालय में चुनौती योग्य माना जा रहा है।