ज़रा हटके
07-Feb-2026
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वॉशिंगटन (ईएमएस)। जैसे-जैसे अमेरिका कई संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों और वैश्विक संस्थानों से पीछे हट रहा है, चीन कूटनीतिक धरातल पर अधिक सक्रिय होकर नेतृत्वकारी भूमिका हथियाने की कोशिश में जुट गया है। इस वर्ष की शुरुआत में अमेरिका द्वारा 66 बहुपक्षीय संगठनों से बाहर निकलने की घोषणा ने वैश्विक राजनीति में जो शून्य पैदा किया है, चीन उसे भरने के लिए तत्पर दिख रहा है। जनवरी के अंत में बीजिंग में विदेशी नेताओं की मेजबानी करते हुए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने स्पष्ट किया कि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था भारी दबाव में है और दुनिया को एक ऐसी प्रणाली की आवश्यकता है जहां सभी देशों के साथ समानता का व्यवहार हो। चीन की यह रणनीति नई नहीं है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा जलवायु परिवर्तन, श्रम और प्रवासन जैसे मुद्दों को देश के हितों के खिलाफ बताकर उनसे पल्ला झाड़ने के बाद बीजिंग को अपनी पैठ बढ़ाने का खुला मैदान मिल गया है। एक हालिया अंतरराष्ट्रीय सर्वे के अनुसार, दुनिया भर के लोगों का मानना है कि आने वाले दशकों में चीन का वैश्विक प्रभाव तेजी से बढ़ेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि पूर्व में अमेरिका और चीन के बीच जो शक्ति का बड़ा अंतर था, वह अब तेजी से कम हो रहा है। हालाँकि अमेरिका अब भी दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति है, लेकिन चीन उसकी बराबरी की ओर अग्रसर है। चीन की इस वैश्विक महात्वाकांक्षा में ग्लोबल साउथ यानी विकासशील और उभरते हुए देशों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्ष 2013 में शुरू किया गया बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) इसी रणनीति का हिस्सा था, जिसके माध्यम से चीन ने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के बुनियादी ढांचे में भारी निवेश किया। वर्तमान में जब पश्चिमी देश चीन की घेराबंदी करने का प्रयास कर रहे हैं, तब इन विकासशील देशों का समर्थन चीन के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह है। आर्थिक मोर्चे पर भी चीन ने मजबूती दिखाई है। वर्ष 2025 में चीन की आर्थिक वृद्धि दर पांच प्रतिशत रही और उसका व्यापार सरप्लस रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जिसमें दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों को होने वाले निर्यात ने बड़ी भूमिका निभाई। हालांकि, चीन की इस राह में जोखिम भी कम नहीं हैं। भारी कर्ज के बोझ और वित्तीय खतरों को देखते हुए अब चीन बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के बजाय छोटे और सुरक्षित निवेशों पर ध्यान दे रहा है। दूसरी ओर, रूस और उत्तर कोरिया के साथ चीन की बढ़ती नजदीकी ने दुनिया भर में चिंता पैदा कर दी है। जानकारों का मानना है कि इन देशों के बीच की साझेदारी साझा मूल्यों पर नहीं, बल्कि अमेरिका के विरोध जैसे लेन-देन वाले हितों पर टिकी है। संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकारों और यूक्रेन जैसे मुद्दों पर इनका एक साथ मतदान करना इसी रणनीतिक तालमेल का परिणाम है। दिलचस्प बात यह है कि चीन पूरी वैश्विक व्यवस्था पर कब्जा करने की जल्दबाजी में नहीं है। विशेषज्ञों का तर्क है कि बीजिंग की प्राथमिकता विश्व पर राज करने से ज्यादा अपनी घरेलू सत्ता और कम्युनिस्ट पार्टी के अस्तित्व को सुरक्षित रखना है। चीन केवल उन्हीं वैश्विक संस्थानों में नेतृत्व संभालने के लिए आगे आता है, जहां उसके राष्ट्रीय सुरक्षा हित जुड़े हों, जैसे कि विश्व स्वास्थ्य संगठन में ताइवान की भागीदारी को रोकना। अंततः, चीन का लक्ष्य पूरी दुनिया पर हावी होना नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के प्रभाव को सीमित करना है। दक्षिण चीन सागर में बढ़ती सैन्य गतिविधियां इसी क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई का हिस्सा हैं। वीरेंद्र/ईएमएस 07 फरवरी 2026