जल प्रदूषण :- भारत में जल प्रदूषण एक गम्भीर समस्या है, और 50% नदियां प्रदूषित मानी जाती हैं, जिससे पीने और सिंचाई के लिये पानी असुरक्षित हो गया है। इसके पीछे मुख्य कारण हैं, अनुपचारित सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, कृषि अपवाह, और कचरे का अनुचित निपटान । इसके चलते जलजनित बीमारियां, पर्यावरणीय क्षति और जल संकट जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार भारत की कुल 10368 नदियों में से आधे से अधिक नदियां प्रदूषित हैं। प्रमुख नदियों में गंगा, यमुना, ब्रम्हपुत्र, गोदावरी, कृष्णा, नर्मदा आदि प्रमुख नदियों में से हैं। गंगा नदी भारत की सबसे लंबी नदी है, जो उत्तराखण्ड में गंगोत्री ग्लेशियर से बंगाल की खाड़ी तक कुल 2525 किलोमीटर दूरी तय करती है। गंगा नदी में सबसे ज्यादा प्रदूषण मुख्यतः उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिमी बंगाल के मैदानों वाले हिस्सों में पाया जाता है। कानपुर और वाराणसी के बीच औद्योगिक कचरा, सीवेज और शहरों का गंदा पानी सीधे नदी में गिरता है। कानपुर के पास जाजमऊ- यहां पर इतरा अधिक प्रदूषण है कि जलीय जीवों के लिये जीना मुश्किल है। बिहार और झारखंड के नीचे वाले हिस्सें कृषि रसायन और नगर का कचरा सीधे नदी में मिल रहा है। पश्चिमी बंगाल का निचला भाग यहां पेस्टिसाइड और भारी धातुओं की मात्रा तुलनात्मक रूप से अत्यधिक पाई जाती है। जल में जिंक, तांबा, सीसा, कैडमियम क्रोमियम धातुओं का पानी में होना स्वास्थ्य और जलीय जीवन के लिये खतरा होता है। भारत की सबसे प्रदूषित नदियों में यमुना नदी सबसे प्रदूषित नदी है। भारत की सबसे साफ नदी उमंगोट नदी है, जो मेघालय राज्य में स्थित है। यमुना नदी की लंबाई 1376 किलोमीटर है इसका उद्गम उत्तराखण्ड के यमुनोत्री ग्लेशियर से होता है। नदी के कुल जलग्रहण क्षेत्र का केवल 2% जो 52 किलोमीटर होने के बावजूद, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली नदी के कुल प्रदूषण में 79% का योगदान देता है, जिससे यमुना का यह भाग सबसे प्रदूषित है। दिल्ली में यमुना में प्रदूषण का मुख्य स्रोत घरेलू अपशिष्ट हैं, जो कुल प्रदूषण का 85% है। अन्य में औद्योगिक अपशिष्ट, कृषि अपवाह, ठोस अपशिष्ट और सूक्ष्म प्लास्टिक शामिल हैं। एक अध्ययन में यह भी पता चला है कि शहर मे 792 मिलियन गैलन (एमजीडी) सीवेज उत्पन्न होता है। इसमें से केवल 618 एमजीडी का ही ट्रीटमेन्ट हो पाता है, ट्रीटमेन्ट किये गये इस पानी का लगभग 30 प्रतिशत अभी भी निर्धारित मानकों को पूरा करने में विफल रहता है। पानी में मुख्य विषैले तत्वों में फ्लोराइड, आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम, क्लोराइड कई गुना प्राप्त हुआ है। यदि कुछ विशेषज्ञों की माने तो लंबे समय तक अत्यधिक आयरन वाले पानी से सींची गई सब्जियां खाने से उनमें आयरन की मात्रा जमा हो सकती है। इससे मानव शरीर में भी आयरन की अधिकता हो सकती है जिससे लिवर और आंतो पर बुरा असर पड़ता है। इसके कारण पाचन संबंधी समस्याएं जैसे उल्टी, दस्त और पेट दर्द हो सकता है एवं इससे बाल झड़ने की समस्या भी हो सकती है। भारत में वायु प्रदूषण : कारण एवं निदान भारत में इस समय सबसे अधिक वायु प्रदूषण औद्योगिक गतिविधियों से हो रहा है, जो लगभग 52% प्रदूषण का कारण है। इसके बाद वाहनों से 26%, फसल जलाने से 17% और बाकी अन्य स्त्रोतों से 5% प्रदूषण होता है। वर्ष 2024 में भारत में वायु प्रदूषण के कारण लगभग 21 लाख मौतें हुई, जो कि स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर की रिपोर्ट में बताया गया है। होने वाली मौतों में लगभत 36% मौतें फेफड़ों के कैंसर से, 34% स्ट्रोक से और 27% हृदय संबंधी बीमारियों से होती हैं। बाकी मौंते अन्य श्वसन संबंधी बीमारियों के कारण होती है। भारत सरकार ने वर्ष 2024-25 में वायु प्रदूषण नियन्त्रण हेतु केन्द्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मन्त्रालय (MOEF & CC) को कुल रूपये 3,330.37 करोड़ का बजट दिया जिसमें रूपये 858.5 करोड़ विशेष रूप से प्रदूषण नियन्त्रण के लिये आरक्षित थे। संसद में प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार, रूपये 858.5 करोड़ में से केवल रूपये 7.22 करोड़ ही व्यय हुये, यानी कुल स्वीकृत राशि का 1% से भी कम उपयोग हुआ। खर्च न होने के बारे में बताया गया कि योजना की आगे की अवधि के लिये स्वीकृति का अभाव था, इसलिये राशि व्यय न ही हो पाई। वर्ष 2025 में भारत के सबसे प्रदूषित शहरों में AQI निम्नानुसार रहा है। 2025 में भारत के सबसे प्रदूषित शहरः- क्र. शहर राज्य AQI प्रमुख प्रदूषक 1 हापुड़ उत्तर प्रदेश 416 PM 2.5 2 नोयडा उत्तर प्रदेश 397 PM 10, PM 2.5 3 गाजियाबाद उत्तर प्रदेश 396 PM 10, PM 2.5 4 दिल्ली (NCT) दिल्ली 382 PM 2.5 5 ग्रेटर नोयड़ा उत्तर प्रदेश 382 PM 2.5 6 चरखी दादरी हरियाणा 366 PM 2.5 7 बुलन्दशहर उत्तर प्रदेश 356 PM 2.5 8 मैरठ उत्तर प्रदेश 350 PM 10, PM 2.5 9 मानेसर हरियाणा 342 PM 2.5 10 बाघपत उत्तर प्रदेश 330 PM 2.5 यह आंकड़े समय-समय पर बदलते रहते हैं, परन्तु यह औसत स्तर है। इन शहरों में वायु प्रदूषण का स्तर काफी ज्यादा है और ये विश्व स्वास्थ्य संगठन की सुरक्षित सीमा (0 से 50) के बहुत ऊपर है। ये कण श्वसन तंत्र में प्रवेश कर सकते हैं और स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकते हैं जैसे अस्थमा, हृदय रोग और फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ाना । PM 2.5 (Particulate Matter 2.5) हवा में मौजूद सूक्ष्म कण होते हैं जिनका व्यास 2.5 माइक्रोमीटर से कम होता है। उच्च AQI के कारण :- 1. औद्योगिक प्रदूषण : बड़े शहरों में कारखानों और औद्योगिक इकाइयां हवा में प्रदूषण छोड़ती हैं, जिसके कारण कड़े नियमों के अभाव में अनियन्त्रित उत्सर्जन होता है। 2. वाहनों से होने वाला प्रदूषण: बड़े शहरों में भारी यातायात के कारण वायु प्रदूषण में उल्लेखनीय वृद्धि हो रही है। सड़कों पर वाहनों की बढ़ती संख्या के कारण नाइट्रोजन ऑक्साइड और पर्टिकुलेटर मैटर का उत्सर्जन होता है। 3. निर्माण गतिविधियां शहरों में चल रही निर्माण परियोजनाओं से धूल और कण उत्पन्न होते हैं, यह शुष्क मौसम में विशेष रूप से समस्या जनक होता है, जब धूल आसानी से हवा में फैल सकती है। 4. फसल जलाना :- पराली जलाने जैसी प्रथाएं वायु प्रदूषण में मौसमी वृद्धि का कारण बनती हैं। आसपास की कृषि गतिविधियां वायु गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं। भारत में सबसे अधिक वायु प्रदूषण कोयला, बायोमास और धूल के द्वारा होता है। कोयले का सबसे अधिक उपयोग बिजली बनाने तथा उद्योगों में किया जाता है तथा दूसरे स्त्रोतो के रूप में बायोमास का उपयोग किया जाता है, वर्ष 2024 में भारत में भारत में विद्युत क्षेत्र को कोयले की आपूर्ति 792.958 मीट्रिक टन थी, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि के दौरान 755.029 मीट्रिक टन कोयले की आपूर्ति की गई थी, जो 5.02% की वृद्धि है। धूल के कारण भी वायु प्रदूषण बढ़ा है, जंगलों की कटाई, स्टेट हाईवे के स्थान पर राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने पर लगभग 50 वर्ष पुराने पेड़ काटे गये जिससे एक तरफ लाभ तो हुआ परन्तु पर्यावरण का बहुत बड़ा नुकसान हुआ है, जैसे झारखण्ड में राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण के दौरान वर्ष 2020-21 से 2023-24 तक लगभग 1,05,753 पेड़ काटे गये। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि एक प्रदेश में राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने में कितना वायु प्रदूषण होता है, औसतन हर मिनट देश में 2400 पेड़ काटे जाते हैं। 2024 में सम्पूर्ण भारत में 18 हजार हेक्टेयर जंगल कम हुआ जिसमें कटाई के साथ-साथ वनों में आग का भी योगदान रहा है। ग्लोबल फारेस्ट वॉच की रिपोर्ट के अनुसार 2001-2024 के बीच देशभर में 2.31 मिलियन हैक्टेयर वृक्ष आवरण नष्ट हुआ है। मई 2025 में मुझे माताजी के स्वर्गवासी होने पर अस्थी कलश लेकर गंगाजी में कछला (गंगा जी का घाट) जाने का मौका मिला, मथुरा बरेली 530 B राष्ट्रीय राजमार्ग का कार्य चल रहा था जिसकी लम्बाई 265 किलोमीटर है, पूर्व में यह रोड स्टेट हाइवे था जिसको चौड़ा किया गया, पूर्व में मैंने देखा था कि पूरे रोड पर शीशम, जामुन, नीम आदि वृक्षों का सघन वृक्षारोपण था। पूरे वृक्ष अत्यधिक पुराने एवं विशाल थे, परन्तु आज पूरे रोड़ पर एक भी पेड़ नहीं हैं, इसके निर्माण में लगभग 5,660 पेड़ों की कटाई की गई। पेड़ों की कटाई और आग लगने की घटनाओं से देश की 5,57,665 वर्ग किलोमीटर जमीन बंजर हो चुकी है, जो कुल क्षेत्रफल का 16.96% है। महानिदेशक भारतीय वन अनुसंधान और शिक्षा परिषद् के अनुसार 50 साल में एक पेड़ 52 लाख 400 रूपये से अधिक की सुविधा प्रदान कर सकता है। इनमें 11 लाख 97 हजार 500 रूपये की ऑक्सीजन उत्सर्जित करता है। यही ऑक्सीजन प्राणवायु का काम करती है। इतने सालों में यही एक पेड़ 23 लाख 68 हजार 400 रूपये का वायु प्रदूषण नियन्त्रित करता है, जबकि 19 लाख 97 हजार 500 रूपये मूल्य की भूक्षरण नियन्त्रण व उर्वरता बढ़ाने में सहयोग करता है। बारिश के पानी को रोकने, कटाव रोकने, जल को रिसाइकिल करने में रूप में 4 लाख 37 हजार रूपये का योगदान देता है। इस तरह एक पेड़ हमें 50 साल में 52 लाख 400 रूपये से अधिक का फायदा पहुंचाता है। पीएल ओएस ग्लोलब पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार भारत में समय से पहले जन्म और कम बजन वाले बच्चों के जन्म का सीधा संबंध वायु प्रदूषण से है। एक अध्ययन में भारत, थाइलैण्ड, आयरलैण्ड और यूके के संस्थानों के शोधकर्ताओं द्वारा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एन.एफ.एच.एस.) के आँकड़ों और उपग्रह डेटा के आधार पर तैयार किया गया था। इस डेटासेट में 0 से 5 वर्ष आयु के बच्चे शामिल थे जिसमें 52% लड़कियां और 48% लड़के शामिल थे। अध्ययन परिणामों के अनुसार गर्भावस्था के दौरान सूक्ष्मकण पदार्थ (पीएम 2.5) के सम्पर्क में आने से इनके प्रतिकूल परिणामों की सम्भावना काफी बढ़ जाती है, गौरतलब है कि पी एम 2.5 में 2.5 माइक्रोमीटर से कम व्यास वाले वायु जनित कण होते हैं। अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, पी.एम. 2.5 के उच्च स्तर के सम्पर्क में आने वाली गर्भवती महिलाओं में समय से पहले प्रसव का खतरा 70% बढ़ जाता है, वायु प्रदूषण के अधिक सम्पर्क में आने से जन्म के समय कम वजन का खतरा 40 % बढ़ जाता है तथा पीएम 2.5 के स्तर में 10 ग्राम/घन मीटर की वृद्धि से समय से पहले जन्मदर में 12% की वृद्धि होती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के 2019-21 के आँकड़ों के अनुसार, भारत में 13% बच्चे समय से पहले पैदा हुये और 17% का जन्म के समय वजन कम था, इसका एक प्रमुख कारण गर्भावस्था के दौरान प्रदूषित हवा के सम्पर्क में आना है। निदानः- वायु प्रदूषण को कम करने के लिये निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं:- 1. उद्योगों में साफ-सुथरी तकनीकों का उपयोग । 2. वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना । 3. सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना । 4. कचरे का सही प्रबन्धन । 5. पेड़ों की अधिक से अधिक संख्या बढ़ाना । 6. सड़कों के किराने वृक्षारोपण का कार्य कराने के लिये रोड के किनारे जिन किसानों के खेत हैं उन्हें ही जमीन लीज पर दी जा सकती है, जिसमें 40% पीपल, नीम, बरगद आदि के पेड़ एवं 60% में किसान अच्छी किस्म के फलदार वृक्ष लगा सकता है जिससे किसान को अच्छी आय होगी। ऐसा देखा जाता है कि शासकीय जमीन पर लगाये गये पेड़ किसानों द्वारा ही काट दिए जाते हैं क्योंकि उनकी जमीन में वृक्षों की छाया से फसल प्रभावित होती है। 7. आज से कुछ समय पूर्व खेतों में फलदार वृक्षों की संख्या बहुत अधिक हुआ करती थी परन्तु फसल को हानि की वजह से किसानों ने पेड़ों को काट डाला, किसानों को प्रोत्साहित किया जाये और अच्छे किस्म के फलदार वृक्ष उपलब्ध कराये जायें जिनका किसान द्वारा मेड़ों के किनारे वृक्षारोपण किया जाए, जिससे किसान को अतिरिक्त आय प्राप्त होगी एवं पर्यावरण संरक्षण के यज्ञ में भी योगदान मिलेगा । 8. एक मेढ़ 5 पेड़ का नारा किसानों को देना होगा। 9. जगह-जगह पर पुराने तालाब, कुएं, बाबड़ी आदि जल स्त्रोतों को बन्द कर दिया है उन सबको पुर्नजीवित करना होगा। 10. लोगों में जागरूकता फैलाना । दुनिया में 99% लोग दूषित हवा में सांस ले रहे हैं, इससे दुनिया भर के लोगों की औसत आयु 2.2 साल घट गई है। शिकागो यूनिवर्सिटी द्वारा हाल ही में जारी किये गये एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स के अनुसार यदि भारत के लोगों को शुद्ध हवा मिले तो उनकी औसत उम्र 5 साल तक बढ़ सकती है, इस बात से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वायु प्रदूषण को कम करना कितना आवश्यक है। प्राकृतिक संरक्षण केवल पर्यावरण का विषय नहीं है, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रश्न है। जब तक समाज जागरूक और सहभागी नहीं बनेगा, तब तक संरक्षण के प्रयास सीमित रहेंगे। अतः प्रत्येक नागरिक का दायित्व है कि वह प्रकृति के प्रति संवेदनशील बने, संसाधनों का संयमित उपयोग करें और दूसरों को भी जागरूक करें। प्राकृतिक संरक्षण और सामाजिक चेतना का समन्वय ही सतत, सुरक्षित और समृद्ध भविष्य की कुन्जी है। (लेखक- सलाहकार जनजातीय कार्य विभाग, भोपाल एवं (राष्ट्रपति पुरस्कार, मुख्यमंत्री उत्कृष्टता पुरस्कार एवं अन्य पुरस्कारों से सम्मानित हैं) ईएमएस/08/02/2026