*श्री विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय,विकसित भारत की मानव पूंजी गाथा कौशल चेतना का महापुंज साबित होगा* विनोद कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तम्भकार नई दिल्ली (ईएमएस)। भारत केवल भूगोल का भू-खंड मात्र नहीं, बल्कि सतत परिवर्तनशील चेतना है।सभ्यता की इस भूमि ने ऋषियों के आश्रमों से लेकर आधुनिक प्रयोगशालाओं तक ज्ञान की यात्रा तय की है।वर्तमान में विश्व चौथी औद्योगिक क्रांति, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल अर्थव्यवस्था के युग में प्रवेश कर चुका है। ऐसे में भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कितनी सड़कें, कितने पुल और कितनी फैक्ट्रियाँ बनेंगी,बल्कि यह है कि भारत के युवा कितने कुशल, कितने नवाचारी और कितने उद्यमशील होंगे।इस ज्वलंत प्रश्न के उत्तर की खोज करते हुए मुझे दिल्ली के ऐतिहासिक राजघाट स्थित गांधी सत्याग्रह सभागार में आयोजित स्किल लीडर्स कॉन्क्लेव एवं कौशल मेला-2026 का साक्षी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।यह आयोजन भारत की मानव पूंजी नीति का वैचारिक घोषणा-पत्र बनकर कौशल चेतना के महासूर्य की महापुंज के रूप में दृष्टिगोचर हुआ। सर्वविदित है कि यह आयोजन ऐसे समय हुआ, जब भारत “विकसित भारत 2047” के संकल्प को सरकारी नीतियों, बजट और समाज के स्तर पर साकार करने के प्रयास में जुटा है। यह कार्यक्रम भारत के प्रथम राजकीय कौशल विश्वविद्यालय श्री विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय, पलवल द्वारा दिल्ली कौशल एवं उद्यमिता विश्वविद्यालय तथा असम स्किल यूनिवर्सिटी के सहयोग से आयोजित किया गया था।इस महाकुंभ में देश के दस से अधिक कौशल विश्वविद्यालयों, दिल्ली के सौ से अधिक कॉलेजों और स्कूलों के विद्यार्थियों, उद्योग जगत के विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं की सहभागिता ने इसे राष्ट्रीय कौशल विमर्श का केंद्र बना दिया।इस अवसर पर पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय गोयल ने उद्घाटन सत्र में कहा कि कौशल और नवाचार ही भारत को विकसित राष्ट्र बनाएंगे। उनका यह वक्तव्य केवल भाषण नहीं था, बल्कि भारत के विकास दर्शन की पुनर्परिभाषा थी।उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कौशल विकास को राष्ट्रीय प्राथमिकता देने की सराहना करते हुए विद्यार्थियों को महात्मा गांधी के संघर्षशील जीवन से प्रेरणा लेने का आह्वान किया। राजघाट के समीप गांधी सत्याग्रह सभागार में कौशल विमर्श का आयोजन प्रतीकात्मक रूप से भी अत्यंत अर्थपूर्ण था, क्योंकि गांधीजी का स्वदेशी,श्रम और आत्मनिर्भरता का विचार आज आधुनिक संदर्भ में कौशल- आधारित आत्मनिर्भर भारत के रूप में पुनर्जीवित हो रहा है।हरियाणा के पलवल में स्थापित श्री विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था में एक मौन क्रांति का प्रतीक है। इसकी स्थापना केवल एक विश्वविद्यालय खोलने की प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं थी,बल्कि औपनिवेशिक अकादमिक मॉडल से हटकर उद्योग-समन्वित, रोजगार-उन्मुख और उद्यमिता- प्रेरित शिक्षा मॉडल की नींव रखने का ऐतिहासिक प्रयास था। जहाँ परंपरागत भारतीय विश्वविद्यालयों में शिक्षा कक्षा-कक्ष और परीक्षा-केंद्रित रही है, वहीं इस विश्वविद्यालय ने “लर्निंग बाय डूइंग” और “वर्क-इंटीग्रेटेड लर्निंग” की अवधारणा को संस्थागत रूप दिया। यहाँ विद्यार्थी केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि उद्योगों,फैक्ट्रियों, कार्यशालाओं और स्टार्टअप इकोसिस्टम में सीखते हैं। वर्तमान में विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग, मैन्युफैक्चरिंग, ऑटोमोबाइल,इलेक्ट्रॉनिक्स, सूचना प्रौद्योगिकी,हॉस्पिटैलिटी, कृषि,डिज़ाइन,डिजिटल मीडिया, लॉजिस्टिक्स और उद्यमिता सहित तीस से अधिक स्नातक, स्नातकोत्तर,डिप्लोमा और प्रमाणपत्र कार्यक्रम संचालित हैं। ये पाठ्यक्रम उद्योग की वास्तविक आवश्यकताओं से जुड़े हैं, जिससे विद्यार्थियों की रोजगार-योग्यता में गुणात्मक सुधार हुआ है। विश्वविद्यालय के आँकड़ों के अनुसार अब तक दस हजार से अधिक विद्यार्थी विभिन्न कौशल- आधारित कार्यक्रमों में नामांकित हो चुके हैं, जिनमें लगभग 35 से 40 प्रतिशत छात्र ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आते हैं। कौशल विश्वविद्यालय की सफलता का सबसे बड़ा मापदंड उसका परिणाम होता है -विद्यार्थियों का रोजगार, उनकी आय और उनकी उद्यमशीलता। विश्वविद्यालय के करियर एवं प्रशिक्षण प्रकोष्ठ के अनुसार कौशल-आधारित स्नातकों का औसत प्लेसमेंट प्रतिशत 65 से 70 प्रतिशत के बीच रहा है, जबकि तकनीकी क्षेत्रों में यह 75 प्रतिशत से अधिक दर्ज किया गया है। औसत प्रारंभिक वेतन पैकेज तीन से छह लाख रुपये प्रतिवर्ष रहा है, जो कौशल-आधारित स्नातकों के लिए राष्ट्रीय औसत से बेहतर माना जाता है। उद्यमिता के क्षेत्र में भी विश्वविद्यालय ने उल्लेखनीय परिणाम दिए हैं।अब तक डेढ़ सौ से अधिक छात्र और पूर्व छात्र स्टार्टअप या स्वरोजगार उद्यम स्थापित कर चुके हैं। विश्वविद्यालय के इनक्यूबेशन केंद्र और उद्योग नेटवर्क से जुड़े इन उद्यमों ने स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर हजारों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार अवसर सृजित किए हैं। भारतीय शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी आलोचना यह रही है कि विश्वविद्यालयों से निकलने वाले स्नातक उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार नहीं होते।इस कौशल विश्वविद्यालय ने इस ऐतिहासिक खाई को पाटने का प्रयास किया है। सौ से अधिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के साथ साझेदारी के माध्यम से विद्यार्थियों को औद्योगिक अप्रेंटिसशिप अवसर उपलब्ध कराए गए हैं,जो शिक्षा और रोजगार के बीच सेतु बनते हैं। श्री विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय केवल प्रशिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि कौशल नवाचार केंद्र के रूप में भी विकसित हो रहा है। विश्वविद्यालय में बीस से अधिक कौशल नवाचार प्रयोगशालाएँ और सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित किए गए हैं। फैकल्टी और छात्रों द्वारा तीन सौ से अधिक शोध एवं उद्योग समाधान परियोजनाएँ संचालित की गई हैं।पेटेंट,प्रोटोटाइप और उद्योग- समर्थित शोध में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है।भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी पारंपरिक कौशल परंपरा है - कारीगर,शिल्पकार, तकनीशियन,कृषि श्रमिक और हस्तशिल्प कलाकार।विश्वविद्यालय ने रिकॉग्निशन ऑफ प्रायर लर्निंग कार्यक्रम के तहत पाँच हजार से अधिक पारंपरिक कौशल धारकों को औपचारिक प्रमाणन प्रदान किया है, जिससे उनकी आय, सामाजिक स्थिति और रोजगार अवसरों में वृद्धि हुई है। हरियाणा मुख्यमंत्री के विशेष कर्तव्य अधिकारी डॉ. राज नेहरू ने जॉब मार्केट में हो रहे बदलाव और एआई के प्रभाव पर प्रकाश डाला। विश्वविद्यालय ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस,डेटा एनालिटिक्स, साइबर सुरक्षा,रोबोटिक्स और ग्रीन टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में दस से अधिक फ्यूचर-स्किल आधारित पाठ्यक्रम शुरू किए हैं और लक्ष्य रखा है कि 2030 तक कम से कम पचास प्रतिशत पाठ्यक्रमों को उभरती तकनीकों से जोड़ा जाए। दिल्ली कौशल एवं उद्यमिता विश्वविद्यालय, कौशल्या स्किल यूनिवर्सिटी,एनआईओएस और एनसीवीईटी के विशेषज्ञों ने कौशल शिक्षा को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के साथ समन्वित करने और उद्योग सहयोग बढ़ाने पर बल दिया। कुलगुरु प्रो. दिनेश कुमार का कथन कि वर्ष 2027 तक 44 प्रतिशत कौशल बदल जाएंगे, भारतीय शिक्षा नीति के लिए चेतावनी और अवसर दोनों है।सेमिनार के साथ आयोजित कौशल मेले में विद्यार्थियों ने तकनीकी नवाचार,सामाजिक समाधान मॉडल,डिज़ाइन प्रोटोटाइप और स्टार्टअप अवधारणाएँ प्रदर्शित कीं। लगभग दो सौ से अधिक छात्र परियोजनाएँ प्रदर्शित की गईं, जिन्हें विशेषज्ञों ने सराहा। यह मेला युवा भारत की कल्पनाशीलता और तकनीकी क्षमता का जीवंत प्रमाण था।भारत की जनसांख्यिकीय लाभांश तभी आर्थिक शक्ति में बदलेगा जब युवाओं के पास वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी कौशल होंगे।श्री विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय जैसे संस्थान भारत की मानव पूंजी नीति के प्रयोगशाला मॉडल हैं। यदि इन मॉडलों को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तारित किया जाए,तो भारत वैश्विक उत्पादन, सेवा और डिजिटल अर्थव्यवस्था में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।अंततः राजघाट के गांधी सत्याग्रह सभागार में आयोजित स्किल लीडर्स कॉन्क्लेव एवं कौशल मेला-2026 भारत के कौशल सत्याग्रह का प्रतीक है।इस कौशल विश्वविद्यालय ने यह सिद्ध किया है कि यदि शिक्षा उद्योग,नीति और समाज के साथ समन्वित हो, तो बेरोजगारी, कौशल अंतर और सामाजिक असमानता जैसी समस्याओं का संरचनात्मक समाधान संभव है।कौशल- आधारित शिक्षा केवल रोजगार नीति नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की नीति है।यदि भारत अपने युवाओं को सही कौशल, नवाचार संस्कृति और उद्यमिता समर्थन दे सका,तो 2047 का विकसित भारत केवल सपना नहीं,बल्कि वास्तविकता होगा - एक ऐसा भारत, जहाँ श्रम ज्ञान में बदलेगा, ज्ञान नवाचार बनेगा और नवाचार राष्ट्र की शक्ति बनेगा -श्री विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय, विकसित भारत की मानव पूंजी गाथा कौशल चेतना का महापुंज साबित होगा। विनोद कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तम्भकार