राष्ट्रीय
12-Feb-2026
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-मु्स्लिम महिला ने संयुक्त हिंदू परिवार कानून का हवाला देकर संपत्ति में हिस्सेदारी मांगी थी अहमदाबाद,(ईएमएस)। मुस्लिम परिवार में संपत्ति विवाद और संयुक्त हिंदू परिवार कानून को लेकर गुजरात हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया। एक मु्स्लिम महिला ने संयुक्त हिंदू परिवार कानून का हवाला देकर अपने पिता की संपत्ति में हिस्सेदारी के लिए निचली कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। निचली कोर्ट ने महिला के पक्ष में फैसला सुनाया था फिर मामला हाईकोर्ट पहुंचा और उसने इस पूरे मामले में एक विस्तृत फैसला दिया। गुजरात हाईकोर्ट ने दाखिल याचिका में मुस्लिम महिला ने 1983 में हुए एक फैमिली अरेंजमेंट को चुनौती देते हुए अपने दिवंगत पिता की अचल संपत्तियों में हिस्सा मांगा था। हाईकोर्ट ने साफ किया कि हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत ‘संयुक्त परिवार’ की अवधारणा मुस्लिम कानून के लिए पूरी तरह अलग है। मुस्लिम कानून में उत्तराधिकार व्यक्तिगत होता है। जस्टिस जे सी दोशी की 50 पेज के जजमेंट में कहा गया कि मुस्लिम कानून में हिंदू कानून की तरह कोई परिकल्पना नहीं है कि परिवार के सदस्यों द्वारा अर्जित संपत्ति संयुक्त परिवार के लाभ के लिए होती है। इसलिए, कुछ सदस्यों द्वारा अर्जित संपत्ति को सभी के लिए संयुक्त नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने फैसला दिया कि मुस्लिम परिवार में संपत्ति पर उत्तराधिकार केवल मृत्यु के बाद लागू होता है। यह मामला दिवंगत वली मोहम्मद कडूजी और उनकी पत्नी आयशा के वंशजों से जुड़ा है। कडूजी की बेटी ने ट्रायल कोर्ट में ‘एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ एस्टेट’ की मांग की थी यानी पिता की संपत्ति में कानूनी हिस्से की मांग। 25 अप्रैल 1983 के फैमिली अरेंजमेंट के मुताबिक दोनों बेटियों को पिता की संपत्ति के बदले 30,000 रुपए दिए गए थे। एक बहन ने पहले ही अपना अधिकार छोड़ दिया था। महिला ने दावा किया कि उनके भाइयों ने संपत्तियों में हिस्सा देने का झूठा आश्वासन दिया था। महिला का आरोप था कि संपत्तियां पैतृक हैं और टेनेंसी एक्ट से बचने के लिए पिता ने भाइयों के नाम से जमीनें खरीदी थीं। ट्रायल कोर्ट ने 2024 में महिला के पक्ष में अंतरिम राहत दी थी, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे ‘गंभीर त्रुटि’ और ‘पर्वर्सिटी’ करार दिया। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने यह ध्यान नहीं दिया कि पक्षकार मुस्लिम हैं और मुस्लिक कानून लागू होता है, जहां ‘जॉइंट फैमिली प्रॉपर्टी’ या ‘एंसेस्ट्रल प्रॉपर्टी’ की अवधारणा बिल्कुल नहीं है। कोर्ट ने बताया कि हिंदू कानून में जन्म से ही साझेदारी का अधिकार होता है, लेकिन मुस्लिम कानून में ऐसा नहीं है। यहां ‘नेमो एस्ट हेरिस विवेंटिस’ का सिद्धांत लागू होता है, यानी जीवित व्यक्ति का कोई वारिस नहीं होता। संपत्ति केवल मृत्यु के बाद वितरित होती है और कोई भी जीवित सदस्य पैतृक संपत्ति का दावा नहीं कर सकता। सिराज/ईएमएस 12फरवरी26