क्षेत्रीय
12-Feb-2026


सिंगरौली (मध्यप्रदेश) (ई एम एस )सिंगरौली जिले के चितरंगी थाना क्षेत्र से सामने आया एक गंभीर प्रकरण अब प्रशासनिक और कानूनी हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। एक महिला ने आरोप लगाया है कि उसे सामाजिक रीति-रिवाज से विवाह का विश्वास दिलाकर वर्षों तक साथ रखा गया, दो बच्चियों का जन्म हुआ, लेकिन बाद में न्यायालय में संबंध से इनकार करते हुए एकतरफा विवाह विच्छेद का आदेश प्राप्त कर लिया गया। महिला का कहना है कि वर्ष 2019 में न्यायालय में प्रस्तुत शपथ पत्र में यह उल्लेख किया गया कि पिछले दो वर्षों से कोई शारीरिक संबंध नहीं हैं, जबकि वर्ष 2020 और 2021 में जन्मी बच्चियाँ उसी संबंध का परिणाम हैं। पीड़िता ने इसे छलपूर्वक संबंध बनाकर शारीरिक शोषण बताया है। *संबंध, संतान और फिर अस्वीकार* पीड़िता जय कुमारी मौर्य के अनुसार— 20 अक्टूबर 2020 को पहली पुत्री तथा 03 सितंबर 2021 को दूसरी पुत्री का जन्म सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र चितरंगी में हुआ। आरोप है कि बच्चियों के जन्म के बाद आरोपी ने पत्नी के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उधर न्यायालय में वर्ष 2019 में दायर तलाक वाद में वर्ष 2017 के बाद किसी प्रकार के वैवाहिक संबंध न होने का उल्लेख किया गया था। 08 अगस्त 2025 को एकतरफा विवाह विच्छेद की डिक्री पारित हुई। कानूनी जानकारों का मत है कि यदि शपथ पत्र में दिए गए तथ्यों और बाद की परिस्थितियों में विरोधाभास है, तो यह न्यायालय के समक्ष तथ्य छिपाने का विषय हो सकता है, जिसकी जांच आवश्यक है। रिपोर्ट न लिखे जाने का आरोप पीड़िता का आरोप है कि जब उसने चितरंगी थाने में शिकायत दर्ज करानी चाही तो उसकी प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यदि विवाह का झूठा आश्वासन देकर संबंध स्थापित किए गए हों तो प्रकरण भारतीय न्याय संहिता की धारा 376 सहित अन्य धाराओं में परीक्षण योग्य हो सकता है। हालांकि अंतिम निर्णय जांच के उपरांत ही होगा। महिला ने दोनों बच्चियों के पितृत्व की पुष्टि के लिए डीएनए परीक्षण कराने की मांग भी की है। उच्च स्तर पर जांच के निर्देश स्थानीय स्तर पर सुनवाई न होने का आरोप लगाते हुए पीड़िता रीवा संभाग के पुलिस उपमहानिरीक्षक से मिली। निर्देश के पश्चात पुलिस अधीक्षक सिंगरौली ने मामले को गंभीर मानते हुए चितरंगी अनुविभागीय पुलिस अधिकारी को विस्तृत जांच के आदेश दिए हैं। सूत्रों के अनुसार जांच प्रतिवेदन के आधार पर आगे की वैधानिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। उठते प्रश्न क्या थानों में शिकायत दर्ज कराना अब भी नागरिक का अधिकार है? क्या न्यायालय में प्रस्तुत तथ्यों की सत्यता की जांच आवश्यक नहीं? क्या पीड़ित महिला को हर बार उच्च अधिकारियों की चौखट पर जाना पड़ेगा? अब समूचे प्रकरण पर सबकी निगाहें अनुविभागीय स्तर की जांच और पुलिस अधीक्षक की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि कानून की धार प्रभावी होती है या फिर व्यवस्था पर उठ रहे सवाल और गहरे होंगे। रिपोर्ट : आर. एन. पाण्डेय