लेख
13-Feb-2026
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आत्मा तीन नश्वर शरीरों में समाहित है, पहला शरीर मांस है, जिसे स्पर्श कर अनुभव कर सकते हैं। दूसरा शरीर तंत्रिका ऊर्जा है जो मांस को चैतन्‍य करती है और तीसरा आत्मा का शरीर है जो अदृश्‍य है। आत्मा का शरीर कर्मों के ऋणों से बंधा है। जब तक यह शरीर पिछले जन्मों के संचित ऋणों से मुक्त नहीं हो जाता, आत्मा को मत्‍यु लोक में भटकना पड़ता है। यम देवता मृत्यु और पुनर्जन्म से संबंधित हैं। उनका पाश हमारी आत्मा का बंधन है। जबकि कामदेव पुष्‍पशरों से निरंतर वासनाओं को उद्वेलित करते रहते हैं। आख्‍यानों में प्रेम और ऋण का परस्‍पर अंतर्संबंध हैं। जिसे श्रीराम के वंशज मंधाता (जिनके माता-पिता एक हैं) द्वारा प्रस्‍तुत तर्कों से समझा जा सकता है। इसमें उनके पिता वल्‍लभी के सम्राट युवनाश्‍च द्वारा पूछे गये प्रश्‍न की विवेचना है । दो घनिष्‍ठ मित्रों में से यदि एक शापवश कन्‍या बन जाता है। ऐसे में वे पति पत्नी की तरह जीवन बिताना चाहते हैं। लेकिन कन्‍या बने युवक के आत्‍मज पूछते हैं कि उनका श्राद्ध कौन करेगा। ऐसे में युवक बने कन्‍या को कैसे व्यवहार करना चाहिए—अपने पूर्वजों की संतुष्टि के लिए एक पुरुष की तरह या अपने मित्र की संतुष्टि के लिए एक महिला की तरह? मंधाता ने कहा - एक पुरुष की तरह। क्‍योंकि एक महिला की तरह व्यवहार करना कामना के आगे समर्पण करना है। कामना धर्म के लिए बाधक है, जो समय के साथ परिवर्तित होती रहती है जिस पर विश्‍वास नहीं किया जा सकता। वहीं जो समय के साथ नहीं बदलता वह है कर्तव्य, जिस पर भरोसा किया जा सकता है।यह जन्म के समय तय होता है। क्योंकि जन्म हमारे जैविक और वंशानुगत गुण को प्रकट करते है, इसी प्रकार के दर्शन से प्रेरित होकर जरतकारु और अगस्त्य का विवाह हुआ के जिनके संतान में पुत्र को पुत्र और पुत्री कहा गया, क्योंकि उनके जन्म से ही उनके माता-पिता को पुत नामक नरक से मुक्ति मिली । कला में पितरों को आमतौर पर पुरुष रूप में दर्शाया जाता है, क्योंकि प्रतीकों की भाषा में पुरुष रूप आत्मा का और स्त्री रूप शरीर का प्रतीक है। प्रेम भावनाओं की चंचलता है, जो कभी-कभी विरोधाभासी भी हो सकता है, जबकि ऋण जीवन और आकांक्षाओं से जुड़ा है। जब तक भूख या सांसारिक सुख जैसे उपभोग या महत्वाकांक्षा को तुष्‍ट करते रहेंगे ,तब तक हम समाज और प्रकृति के ऋणी होते रहते हैं,जिन्‍हें यज्ञ (परोपकार) के माध्यम से संतुलित किया जाता है। ग्रीस में प्रेम के देवता को इरोस नामक एक चंचल बच्चे के रूप में देखा जाता था। एक कुशल धनुर्धर की तरह वह दो प्रकार के तीर रखता था - एक सोने की नोक वाला और दूसरा सीसे की नोक वाला। सोने की नोक वाले तीर लोगों को अनुराग के लिए प्रेरित करते थे। जबकि सीसे की नोक वाला तीर घृणा उत्पन्न करता थे। सौंदर्य और उर्वरता की देवी वीनस के इस पुत्र को सामाजिक नियमों की परवाह नहीं थी, जिससे संगठन और व्यवस्था के देवता अपोलो चिन्तित थे जबकि रचनात्मक अराजकता के देवता डायोनिसस को इस अनैतिकता से प्रसन्नता होती थी। वेलेंटाइन डे की उत्पत्ति से जुड़ी एक प्रचलित मान्यता क्लॉडियस द क्रूर से संबंधित है। इसके अनुसार, तीसरी शताब्दी के दौरान रोम में वेलेंटाइन सेवा करने वाले एक पुजारी थे। जब सम्राट क्लॉडियस द्वितीय ने यह निर्णय लिया कि अविवाहित पुरुष विवाहित पुरुषों की तुलना में बेहतर सैनिक होते हैं, तो उन्होंने अपने भावी सैनिकों के लिए विवाह प्रतिबंधित कर दिया। वेलेंटाइन ने क्लॉडियस की अवज्ञा की और गुप्त रूप से युवा प्रेमियों के विवाह संपन्न कराते रहे। इस अपराध के लिए क्लॉडियस ने लगभग 270 ईस्वी में 14 फरवरी को वेलेंटाइन को मृत्युदंड का आदेश दिया। आज अन्‍य पर्वों की तरह वैलेंटाइन डे कारपोरेट जगत से संचालित हैं। दुनिया भर में उपहार निर्माताओं ने इससे मिलने वाले व्यावसायिक अवसर का लाभ उठाने के लिए इसे लोकप्रिय बनाया। अन्‍यथा प्रेम संबंधों में तो हर दिन एक उत्सव है। मानवीय भावनाओं का स्‍नेह, अनुराग पूर्व नियोजित कोई विशेष दिन नहीं होता। लेकिन आज माता, पिता, मित्र, शिक्षक बहन,पत्‍नी, प्रेमिका इत्‍यादि के दिवस के नाम पर बाजार चांदी काट रहा है। भारत में, प्रेम के देवता को गन्‍ने और पुष्‍पों के धनुर्धर के रूप में जाना जाता है। मन को मथन वाले देवता के कारण उन्‍हें मनमथ भी कहा जाता हैं, जो तोते पर सवार मछली ध्वज लहराते हुए गन्ने के धनुष पर मधुमक्खियों की प्रत्‍यंचा पर पुष्‍पशर का संधान कर जीवन में प्रवेश करते हैं। भर्तृहरि रचित श्रृंगार शतकं में उनकी स्‍तुति है कि शम्भुस्वयम्भुहरयो हरिणेक्षणानां येनाक्रियन्त सततं गृहकर्मदासाः वाचामगोचरचरित्रविचित्रिताय तस्मै नमो भगवते कुसुमायुधाय अर्थात : जिन्‍होंने ब्रम्‍हा,, विष्णु और महेश को मृगनयिनी कामिनियों के घर का चूल्‍हा-चौका करने के लिए दास बना रखा है, जिनके विचित्र चरित्रों का वर्णन वाणी से नहीं किया जा सकता, ऐसे पुष्पायुध, भगवान् कामदेव को नमन । कामदेव का कोई आकार नहीं होने के कारण वे अनंग कहलाते है इसलिए उनके प्रतीक के रूप में, सूर्य और चंद्रमा की पूजा की जाती है। जिनकी किरणें शरीर में कामुकता की भावना जगाती हैं। भक्ति काल में कामदेव को विष्णु और लक्ष्मी के पुत्र के रूप में देखा जाता था। कामदेव की तरह, विष्णु भी तोतों, मधुमक्खियों, मकर राशि, तितलियों, फूलों, गन्ने, सुगंध, सुंदरता और मोहक शरारती मुस्कान से जुड़े हैं। विष्णु के रूपों में से एक मोहिनी है। कृष्ण के रूप में, विष्णु मदन-मोहन बन जाते हैं, जो कामदेव को भी मोहित कर लेते हैं। यह आकर्षक प्रेमी बांसुरी बजाते हुए राधा को यमुना नदी के किनारे वृंदावन नामक कुटिया में नृत्य करने के लिए आमंत्रित करते हैं। वहाँ प्रेम का पुन: अनुभव होता है। भारत में जब शरद ऋतु वसंत में प्रवेश कर रही होती है, तब प्रेम और उर्वरता का उत्‍सव मनाया जाता है। वैलेंटाइन डे भी मदन उत्सव जैसे प्रेम उत्सवों की तरह मनाया जाता है। यह कोई संयोग नहीं है कि लोहड़ी, मकर संक्रांति, शिवरात्रि और होली जैसे त्योहार भी इसी समय मनाए जाते हैं। लोहड़ी और होली दोनों ही अलाव जलाने से आबद्ध हैं, जो हमें कामदेव के ज्वलंत रूप का स्‍मरण कराते हैं। लोहड़ी फसल और उर्वरता का प्रतीक है जो दक्षिण भारत का पोंगल है। यह मकर राशि में प्रवेश करने वाले सूर्य की पूजा का समय भी है। पश्चिमी परंपरा में मकर राशि को मछली और बकरी का मिश्रण माना जाता है, जबकि भारतीय परंपरा में इसे मछली और हाथी का मिश्रण माना जाता है जो कामदेव का प्रतीक है। होली एक ऐसा त्योहार है जो कामुकता से भरपूर होता है। होली से दो सप्ताह पहले शिवरात्रि मनाई जाती है, जो शिव की रात है। जिसमें एक तपस्वी परोपकार के लिए पार्वती से विवाह कर जीवन की सार्थकता का प्रतिमान गढ़ता है। ईएमएस / 13 फरवरी 26