लेख
13-Feb-2026
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उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में अपराध के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के निर्देश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दिए हैं। उसके बाद उत्तर प्रदेश में दो शब्द खूब चर्चा में रहे हैं- ‘ऑपरेशन लंगड़ा’ और ‘ऑपरेशन बुलडोजर’। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ऐसे ही शासन व्यवस्था की पहचान बन चुके हैं। राज्य सरकार का दावा है, इन अभियानों ने अपराधियों में भय पैदा किया है। उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था मजबूत हुई है। वहीं आलोचकों का कहना है, इन कार्रवाइयों ने विधि-व्यवस्था के साथ-साथ संवैधानिक सिद्धांतों पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। उत्तर प्रदेश में पुलिस राज कायम हो गया है। शासन की सरपरस्ती में उत्तर प्रदेश की पुलिस बेखौफ हो गई है। अपराध कम होने के स्थान पर बढ़ते चले जा रहे हैं। हां पुलिस को लेकर आम आदमी भयभीत है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। इसका कब कौन शिकार हो जाएगा, इसको लेकर आम नागरिक हमेशा असमंजस में रहते हैं। रही सही कसर धार्मिक ध्रुवीकरण के कारण उत्तर प्रदेश में भय एवं आतंक का वातावरण बना हुआ है। ‘ऑपरेशन लंगड़ा’ शब्द उन पुलिस मुठभेड़ों के लिए प्रचलित हुआ, जिसमें आरोपियों के पैर में गोली लगने की घटनाएं बड़े पैमाने पर सामने आईं हैं। कई मामलों में अदालतों ने पुलिस की कार्यवाही के खिलाफ टिप्पणी की है। कानून के हिसाब से पुलिस की भूमिका आरोपी को पकड़कर न्यायालय के सामने प्रस्तुत करना है, नाकि आरोपी या अपराधी को सीधे दंडित करना है। इलाहाबाद हाईकोर्ट स्पष्ट कर चुका है, न्याय करने का अधिकार अदालत के पास है, पुलिस के पास नहीं। यदि उत्तर प्रदेश की हर मुठभेड़ की कहानी एक जैसी हो, आत्मरक्षा में गोली चलाने से अपराधी की मौत या अपराधी के पैर में गोली लगना, इन दोनों को न्यायपालिका, पुलिस द्वारा कानून का उल्लंघन मानती है। जिस बड़े पैमाने पर उत्तर प्रदेश में इस तरह की घटनाएं बढ़ती चली जा रही हैं, उसके बाद न्यायपालिका की भी चिंता बढ़ती जा रही है। ‘ऑपरेशन बुलडोजर’ के तहत अवैध निर्माणों को हटाने की प्रशासनिक कार्रवाई पर न्यायपालिका द्वारा विरोध जताया गया है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देश होने के बाद भी सरकार का तर्क है, यह कार्रवाई कानून के तहत की गई है। अवैध संपत्तियों और अपराध से अर्जित परिसंपत्तियों के खिलाफ कार्यवाही है। पुलिस को यदि रक्षा के लिए हथियार दिए गए हैं तो वे देखने के लिए नहीं बल्कि चलाने के लिए हैं। प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों द्वारा कई बार बिना पर्याप्त नोटिस या बिना सुनवाई के घरों को गिरा दिया गया। जिससे ‘न्यायिक प्रक्रिया’ को लेकर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट कई निर्देश जारी कर चुकी है। सरकार द्वारा उन आदेशों और निर्देशों पर अमल नहीं हो रहा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में (समानता के अधिकार) और अनुच्छेद 21 में (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का जो संवैधानिक अधिकार) दिया गया है उसके तहत किसी भी नागरिक के साथ विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना कार्रवाई नहीं की जा सकती। यदि इस तरीके की कार्यवाही की जाती है, तो वह पूरी तरीके से गैर कानूनी और अवैधानिक है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रशासनिक और पुलिस द्वारा चलाए जा रहे, इस तरह के अभियानों का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया है। मुख्यमंत्री का कहना है, अपराध के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति जरूरी है। सरकार की सरपरस्ती में उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी बेखौफ होकर आम नागरिकों को दंडित करने लगे हैं, जिसके कारण उत्तर प्रदेश में न्यायपालिका एक तरह से अलग-थलग पड़ चुकी है। सरकार का यह तर्क अपनी जगह महत्वपूर्ण है, आम नागरिक सुरक्षा और शांति चाहता है। परंतु लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून के पालन में सख्ती और संवैधानिक मर्यादा में नियम और कानून का पालन हो यह सुनिश्चित कार्यपालिका के लिए अनिवार्य है। कानून की नजर में कोई भी व्यक्ति तब तक अपराधी नहीं माना जाता, जब तक अदालत उसे दोषी न ठहरा दे। यदि राज्य की शक्ति को दंडात्मक रूप में राज्य के अधिकारी उपयोग करने लगेंगे तो ऐसे में नागरिकों के अधिकार और न्यायिक प्रक्रिया पीछे छूट जाएगी। लोकतंत्र के मूल ढांचे के अनुसार इस तरह की कार्यवाही को कहीं से भी सही नहीं ठहराया जा सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि अपराध के खिलाफ कठोरता के साथ-साथ पारदर्शिता और नियम के अनुसार प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी जांच करने के बाद अपने अधिकारों का प्रयोग करें। सक्षम न्यायिक निगरानी और मानवाधिकारों की रक्षा सरकार द्वारा सुनिश्चित की जाए। तभी संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार कानून का राज मजबूत होगा। उत्तर प्रदेश में जिस तरह का पुलिस राज्य कायम हो रहा है, उसको लेकर बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट जाता चुके हैं। इसके बाद भी उत्तर प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यप्रणाली में कोई अंतर देखने को नहीं मिल रहा है, जो चिंता का विषय है। यदि ऐसा ही चलता रहा तो लोगों को कानून पर विश्वास नहीं रह जाएगा और नागरिक स्वयं विद्रोह करने के लिए विवश हो जाएंगे। अब लोगों को पुराने राजतंत्र तथा अंग्रेजों के शासन व्यवस्था की याद आने लगी है। उत्तर प्रदेश में कानून का राज ना होकर एक तरह से योगीराज स्थापित हो गया है। कार्यपालिका के अधिकारी अब कानून का नहीं सरकार के मौखिक निर्देशों का पालन करते हैं, जिसके कारण उत्तर प्रदेश की लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था लगभग खत्म होती जा रही है। न्यायपालिका का खौफ अब कार्यपालिका को नहीं रहा। उत्तर प्रदेश की वर्तमान राज व्यवस्था को देखते हुए यही कहा जा सकता है। अब तो लोग यह कहने लगे हैं, न्याय पालिका पर भी सरकार का खौफ दिख रहा है। अन्यथा हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट अपने आदेशों के जरिए उत्तर प्रदेश सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करते। न्याय पालिका के कठोर और स्पष्ट निर्णय नहीं होने के कारण, सरकार की मनमानियों पर नियंत्रण नहीं लग पा रहा है, जिसका खामियाजा आम आदमी भोग रहे हैं। ईएमएस / 13 फरवरी 26