वाराणसी (ईएमएस)। महाशिवरात्रि के दिन वाराणसी के शिवालयों में चारों तरफ हर हर महादेव का नारा गूँज रहा था। काशी विश्वनाथ धाम में अर्ध रात्रि से ही श्रद्धालुओं की लम्बी कतारें लगी रही। हर श्रद्धालू एक दूसरे की शहूलियत का भी ध्यान रख रहा था, इसलिए कानून व्यवस्था की कोई समस्या उत्पन्न नहीं हुई। काशी के चारों प्रवेश द्वारों पर चार अति प्राचीन शिव मंदिर हैं। गाज़ीपुर से वाराणसी आने वाले हाईवे पर मार्कण्डेय महादेव, जौनपुर से वाराणसी आते समय त्रिलोचन महादेव, मिर्जापुर से वाराणसी प्रवेश करने पर शुल्टेंकेश्वर महादेव एवं वाराणसी के पश्चिम में शहर से बाहर करदमेश्वर महादेव मंदिर स्थित है। करदमेश्वर मंदिर का निर्माण 11-12 वीं शताब्दी के आसपास बताया जाता है। इसका शिल्प दक्षिण भारत की नागर शिल्प है। पुरे मंदिर की दीवारों पर नक्कासी है। ऐसा माना जाता है कि मुग़ल शासक शहर के बाहर होने के कारण इनको नष्ट नहीं कर पाये और शहर के अन्दर काशी विश्वनाथ मंदिर को कई बार तोड़ा और एक बार माता अहिल्या बाई होल्कर ने काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। करदमेश्वर महादेव मंदिर के विषय में किंवदन्ति है कि करदम ऋषि यहां तपस्या किये और उन्हीं के नाम पर सैकड़ो वर्ष पुराना मंदिर विराजमान है। मंदिर से सटे एक तालाब है, जो कभी नहीं सूखता। ऐसी मान्यता है कि इसका जलश्रोत गंगा नदी से जुड़ा है। महाशिवरात्रि के अवसर पर इस मंदिर में दर्शन पूजन करने वालों की दो बड़ी लाइने सुबह 4 बजे से ही देखने को मिली।मंदिर के आसपास फूल माला, शिव को चढ़ावा चढ़ाने के लिए धतूरा, बेलपत्र, बेर, धतुरे का फूल, मदार की माला एवं अन्य पूजा सामग्री की सैकड़ो दुकाने सजी थी। डॉ नरसिंह राम/ईएमएस/15/02/2026