लेख
19-Feb-2026
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वैसे तो 20 फरवरी को कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण दिवस( अरुणाचल प्रदेश स्थापना दिवस तथा मिज़ोरम स्थापना दिवस) मनाए जाते हैं, लेकिन इसी दिन विश्व सामाजिक न्याय दिवस(वर्ल्ड डे आफ सोशल जस्टिस) भी मनाया जाता है। दरअसल,यह दिवस सामाजिक समानता, मानवाधिकार, रोजगार के अवसर और न्यायपूर्ण समाज को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मनाया जाता है,जिसे संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित किया गया था।इस दिवस की शुरुआत वर्ष 2007 में की गई थी। यहां पाठकों को बताता चलूं कि सामाजिक न्याय (सोशल जस्टिस) से तात्पर्य (संयुक्त राष्ट्र के अनुसार) एक ऐसी स्थिति से है,जिसमें समाज के सभी लोगों को समान अधिकार, अवसर और संसाधनों तक न्यायपूर्ण पहुँच प्राप्त हो, तथा किसी भी व्यक्ति के साथ जाति, लिंग, धर्म, भाषा, वर्ग या अन्य किसी आधार पर भेदभाव न किया जाए। वास्तव में, संयुक्त राष्ट्र यह मानता है कि सामाजिक न्याय का अर्थ केवल कानूनी समानता नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, गरिमापूर्ण जीवन, मानवाधिकारों की रक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं तक समान अवसर सुनिश्चित करना भी है। इसका उद्देश्य असमानताओं को कम करना और एक समावेशी तथा न्यायपूर्ण समाज का निर्माण करना है। बहरहाल,यहां यह गौरतलब है कि भले ही यूएन जनरल असेंबली ने 2007 में इसे घोषित किया, लेकिन इसकी असली नींव 1995 के कोपेनहेगन (डेनमार्क) सम्मेलन में पड़ी थी। वहाँ दुनिया के नेताओं ने पहली बार माना था कि गरीबी मिटाना सिर्फ दान का काम नहीं, बल्कि मानवाधिकारों की रक्षा का काम है। किसी समाज में कानून का पालन होगा तथा वहां विभिन्न संसाधनों जैसे कि पैसा, स्वास्थ्य, शिक्षा का समान वितरण होगा,तभी उस समाज में सामाजिक न्याय की अवधारणा संभव हो सकती है। आज दुनिया के 60% से ज्यादा मजदूर बिना किसी कॉन्ट्रैक्ट या सामाजिक सुरक्षा के काम करते हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि उनके लिए हक मांगना(सामाजिक न्याय)ही इस दिन का असली उद्देश्य बन गया है। आज दुनिया भर में गरीबी, बेरोज़गारी, लैंगिक असमानता, मानवाधिकार हनन और सामाजिक भेदभाव जैसे मुद्दे मौजूद हैं और इस दिवस को मनाने के पीछे मुख्य कारण इन सब के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। उल्लेखनीय है कि इस दिन को बढ़ावा देने में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आइएलओ) की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जो सभी के लिए सम्मानजनक काम और सामाजिक सुरक्षा की अवधारणा को मजबूत करता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज पूरी दुनिया में आर्थिक असमानता बढ़ती चली जा रही है और सामाजिक विभाजन देखने को मिल रहा है, ऐसे में यह दिवस आर्थिक समानता के साथ ही साथ सामाजिक विभाजन को कम करने पर जोर देता है। दूसरे शब्दों में कहें तो आज अमीर और गरीब के बीच की खाई खतरनाक स्तर तक बढ़ रही है, ऐसे में विश्व में शांति स्थापित करना एक टेढ़ी खीर नज़र आता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि अगर किसी समाज में बेरोजगारी, गरीबी और भेदभाव है, तो वहाँ गृहयुद्ध या अपराध की संभावना सबसे ज्यादा होती है।अब डिजिटल डिवाइड पर नया फोकस हो रहा है और ​पिछले कुछ सालों से, यह दिन सिर्फ रोटी-कपड़ा-मकान तक सीमित नहीं रहा है। अब इस दिवस का एक बड़ा हिस्सा डिजिटल सोशल जस्टिस है। दरअसल,यह एक कटु सत्य होने के साथ ही साथ एक तथ्य है कि आज भी, संचार क्रांति, एआइ के इस दौर में दुनिया की एक तिहाई आबादी के पास इंटरनेट सुविधाएं उपलब्ध नहीं है। तकनीक के इस दौर में इंटरनेट तक पहुंच न होना भी अब एक बड़ा सामाजिक अन्याय माना जाता है, क्योंकि इसके बिना शिक्षा और रोजगार के अवसर छिन जाते हैं।वास्तव में सामाजिक न्याय तभी संभव हो सकता है जब समाज में शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा की नींव मजबूत हो। किसी भी समाज में समावेशी विकास शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य तथा सामाजिक सुरक्षा की नींव मजबूत करके ही संभव हो सकता है। लैंगिक समानता, सामाजिक समावेशन,गरीबी और बेरोज़गारी को समाप्त करना,मानवाधिकार और समान अवसर को बढ़ावा देना, आज पूरे विश्व समाज की अहम् आवश्यकता है। बहरहाल, यदि हम यहां पर सरल शब्दों में कहें तो इस दिवस का मूल संदेश है-ऐसा समाज बनाना जहां हर व्यक्ति को बराबरी, सम्मान और अवसर मिले। बहरहाल, पाठकों को बताता चलूं कि पिछले साल यानी कि वर्ष 2025 में इस दिवस की थीम सामाजिक न्याय के लिए बाधाओं को दूर करना और अवसरों को उजागर करना रखी गई थी तथा इस वर्ष यानी कि वर्ष 2026 में यह-साझा भविष्य के लिए असमानताओं को पाटना रखी गई है। कहना ग़लत नहीं होगा कि यह थीम यह स्पष्ट करती है कि आधुनिक दौर में केवल पुराने मुद्दों को सुलझाना काफी नहीं है, बल्कि डिजिटल और तकनीकी युग में पैदा हो रही नई असमानताओं को भी खत्म करना जरूरी है। निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि विश्व सामाजिक न्याय दिवस केवल एक वार्षिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक संकल्प है।यह दिवस हमें यह याद दिलाता है कि शांति और सुरक्षा तभी संभव है जब हर व्यक्ति को उसकी जाति, लिंग, धर्म या आर्थिक स्थिति के भेदभाव के बिना न्याय मिले। मतलब यह है कि समानता का अधिकार आज की आवश्यकता है।सामाजिक न्याय केवल सरकारों का काम नहीं है, बल्कि यह समाजों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और हम नागरिकों की भी सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम एक समावेशी दुनिया बनाने में अपना योगदान दें। अंत में यदि हम सरल शब्दों में कहें तो जब तक समाज के सबसे कमजोर वर्ग को मुख्यधारा में शामिल नहीं किया जाता, तब तक वैश्विक विकास अधूरा है। (सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।) ईएमएस / 19 फरवरी 25