लेख
19-Feb-2026
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किसी भी राज्य की आर्थिक सेहत को समझने के लिए उसके कर्ज और सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के अनुपात को एक अहम पैमाना माना जाता है। मध्यप्रदेश भी पिछले दो दशकों में कर्ज के उतार-चढ़ाव से गुजरता रहा है। आज जब राज्य का कुल कर्ज लगभग पाँच लाख करोड़ रुपये से अधिक के स्तर पर पहुँच चुका है, तब यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या यह कर्ज विकास का साधन है या वित्तीय दबाव का संकेत। साल 2003-04 के आसपास मध्यप्रदेश की स्थिति अपेक्षाकृत कठिन मानी जाती थी। उस समय राज्य का ऋण-जीडीपी अनुपात लगभग 36 प्रतिशत के आसपास था। सीमित राजस्व, अधिक ब्याज भुगतान और आर्थिक वृद्धि की धीमी गति के कारण राज्य की वित्तीय स्थिति पर दबाव था। शुरुआती दशक में राज्य को वित्तीय अनुशासन लागू करने और राजकोषीय सुधारों की जरूरत महसूस हुई। इसके बाद राजकोषीय उत्तरदायित्व कानून (FRBM) और बेहतर वित्तीय प्रबंधन के मधमोहन सरकार के प्रयासों ने धीरे-धीरे असर दिखाया। 2005 से 2020 के बीच का समय मध्यप्रदेश के लिए अपेक्षाकृत संतुलन का दौर कहा जा सकता है। इस अवधि में राज्य की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी और जीएसडीपी का आकार बड़ा हुआ। परिणामस्वरूप ऋण-जीडीपी अनुपात कमलनाथ सरकार म़े घटकर 2020 लगभग 25 प्रतिशत के आसपास आ गया, जो वित्तीय दृष्टि से अपेक्षाकृत सुरक्षित स्तर माना जाता है। यह गिरावट इस बात का संकेत थी कि आर्थिक वृद्धि की गति कर्ज की वृद्धि से अधिक रही। उस समय राज्य की वित्तीय स्थिति को सुधार की दिशा में माना गया। हालांकि कोविड-19 महामारी के बाद आर्थिक परिदृश्य बदल गया। स्वास्थ्य खर्च, सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ, बुनियादी ढाँचे पर निवेश और बिजली क्षेत्र से जुड़ी देनदारियों ने राज्य के कुल कर्ज को तेजी से बढ़ाया। हालिया अनुमानों के अनुसार मध्यप्रदेश का कुल कर्ज करीब 5.3 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच चुका है और ऋण-जीडीपी अनुपात लगभग 30-31 प्रतिशत के आसपास माना जा रहा है। यह स्तर 2004 के मुकाबले कम जरूर है, लेकिन 2020 की तुलना में अधिक है। यानी राज्य फिर से मध्यम स्तर के कर्ज दबाव की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। कर्ज को हमेशा नकारात्मक नजरिए से देखना सही नहीं होता। यदि उधार लेकर सड़कों, सिंचाई, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में निवेश किया जाए तो यह भविष्य की आर्थिक वृद्धि का आधार बन सकता है। मध्यप्रदेश में पिछले वर्षों में इंफ्रास्ट्रक्चर और सामाजिक योजनाओं पर खर्च बढ़ा है, जिससे विकास की संभावनाएँ मजबूत होती हैं। लेकिन दूसरी ओर, बढ़ता कर्ज ब्याज भुगतान का बोझ भी बढ़ाता है। बजट का एक बड़ा हिस्सा यदि सिर्फ पुराने कर्ज की अदायगी में चला जाए तो नए विकास कार्यों के लिए संसाधन सीमित हो जाते हैं। तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो मध्यप्रदेश की स्थिति कुछ अत्यधिक कर्जग्रस्त राज्यों से बेहतर है, फिर भी महाराष्ट्र या कर्नाटक जैसे अपेक्षाकृत कम कर्ज वाले राज्यों की तुलना में मध्यप्रदेश की स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण कही जा सकती है। इसका अर्थ यह है कि राज्य को संतुलित वित्तीय रणनीति अपनाने की जरूरत है, ताकि विकास भी जारी रहे और कर्ज का बोझ अनियंत्रित न हो। भविष्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि राज्य अपने राजस्व स्रोतों को मजबूत करे। औद्योगिक निवेश बढ़ाना, कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देना और सेवा क्षेत्र का विस्तार करना ऐसे कदम हैं, जिनसे जीएसडीपी तेजी से बढ़ सकती है। यदि अर्थव्यवस्था का आकार तेज गति से बढ़ता है तो कर्ज-जीडीपी अनुपात स्वतः नियंत्रित रह सकता है। साथ ही, अनुत्पादक खर्चों पर नियंत्रण और दीर्घकालीन वित्तीय योजना भी आवश्यक है।जिसकी उपेक्षा की कीमत आम नागरिक को चुकानी है। अंततः कहा जा सकता है कि मध्यप्रदेश का कर्ज पूरी तरह संकट का संकेत नहीं है, लेकिन यह एक ऐसा “मर्ज” जरूर है जिसे संतुलित नीति और मजबूत आर्थिक वृद्धि से ही नियंत्रित किया जा सकता है। हालांकि 7 फीसदी के अनुमानित ग्रोथ माडल के सामने लगभग 10 प्रतिशत ब्याज भुगतान की चुनौतियां हैं फिर भी पिछले बीस वर्षों का अनुभव बताता है कि सही वित्तीय प्रबंधन से कर्ज के बोझ को कम किया जा सकता है। अब जरूरत है कि राज्य विकास और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन बनाते हुए नारों से आगे बढ़े, ताकि आने वाले वर्षों में कर्ज विकास की ताकत बने, बोझ नहीं। (लेखक स्वतंत्र विश्लेषक हैं) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 19 फरवरी /2026