लेख
19-Feb-2026
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भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को लेकर बड़े-बड़े दावे सरकार द्वारा किए जा रहे हैं। सरकार ने पिछले वर्ष एआई विकास के लिए 2000 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया था, खबरों के अनुसार उसमें से लगभग 800 करोड़ रुपये ही खर्च हो सके। यह अंतर केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि नीति और क्रियान्वयन के बीच की दूरी को दर्शाता है। जब देश में एआई समिट का आयोजन किया जा रहा है। मंचों से डिजिटल क्रांति की बात हो रही है। तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है, सरकार की इस मामले में वास्तविक सोच क्या है? सरकार ने एआई में शोध के लिए किस तरह की नीतियां बनाई हैं। विश्वविद्यालयों और कॉलेज में शोध के लिए क्या प्रबंध किए गए हैं। इस दौड़ में कैसे भारत आगे रहेगा। इसकी कोई वास्तविक सोच दिख नहीं रही है। एआई को लेकर भारत सरकार भी सपने देख रही है और वही सपना लोगों को दिखा रही है। विश्वविद्यालयों और आईटी सेक्टर को अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। शोध के लिए पिछले कई वर्षों में केंद्र सरकार को बजट में जो धन उपलब्ध कराना था, उसे बढ़ाने के स्थान पर और कम किया है। शोध संस्थानों में बुनियादी ढांचा, उच्च स्तरीय कंप्यूटिंग संसाधन और दीर्घकालिक अनुदान की कमी होने के कारण शोध लगभग लगभग बंद हो गए हैं। विश्वविद्यालयों में अनुसंधान को पर्याप्त प्रोत्साहन नही मिलेगा, तो स्वदेशी एआई तकनीक के साथ कदमताल कर पाना संभव नहीं होगा। भारत एक बाजार बनेगा। जहां पर विदेश से आयातित उत्पाद बिक्री के लिए उपलब्ध होंगे और हम बहुत बड़ी विदेशी मुद्रा और रोजगार के अवसर विदेशों को देने का काम करेंगे। एआई समिट में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भागीदारी स्वागत योग्य है। भारत सरकार यदि भारत को एक उपभोक्ता बाजार बनाना चाहती है तो यह भारत सरकार की सोच है। भारत सरकार विदेशी कंपनियों के लिए पलक पावड़े बिछाती है। भारतीय कंपनियों और भारतीय शोधकर्ताओं के ऊपर सरकार को विश्वास ही नहीं है। सरकार जो नीतियां बनाती है उनके क्रियान्वयन में इतना बड़ा भ्रष्टाचार होता है, कि भारतीय शोधकर्ता और भारतीय कंपनियां विदेशी कंपनियों के मुकाबले में पिछड जाती हैं। यह स्थिति दीर्घकालिक दृष्टि से बहुत चिंताजनक है। दुनिया की अग्रणी कंपनियां जैसे ओपन एआई, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी-बड़ी कंपनियों को भारतीय राजनेता और भारतीय नौकरशाह दामाद की तरह स्वागत करते हैं। भारत सरकार का हर काम इन्हीं कंपनियों को सौंपा जाता है। इनसे अच्छे उत्पादन यदि भारतीय कंपनियों और सॉफ्टवेयर इंजीनियर तैयार करते हैं। उन्हें सरकार कोई तवज्जो नहीं देती है, जिसके कारण वह विदेशो में जाकर अपना करियर बनाने के लिए विवश होते हैं। माइक्रोसॉफ्ट, टेस्ला एवं अन्य बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने उत्पादों के साथ सरकारी संरक्षण को लेकर भारतीय एवं वैश्विक बाजार में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं। भारत में एआई तकनीकी का विस्तार स्वाभाविक है रूप से समय की मांग है। भारत सरकार को विदेशी कंपनियों के साथ-साथ समानांतर अवसर उपलब्ध कराकर स्वदेशी नवाचार को बढ़ावा देना चाहिए। अन्यथा भारत का आयात बढ़ेगा, विदेशी मुद्रा आयात में खर्च होगी। व्यापार में आयात और निर्यात के अंतर का घाटा बढ़ता जाएगा। जो भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत घातक होगा। रक्षा क्षेत्र और औद्योगिक उत्पादन में भारत का एआई में सीमित उपयोग चिंता का विषय है। विकसित एवं विकासशील राष्ट्र एआई को रणनीतिक संपत्ति के रूप में देख रहे हैं, एआई में शोध के कई छोटे-छोटे देश भारत सरकार से ज्यादा शोध के लिए आर्थिक सहायता दे रहे हैं। भारत का सबसे कम बजट शोध के लिए है। भारत सरकार को इस क्षेत्र में दीर्घकालिक निवेश और स्पष्ट नीति बनाने की आवश्यकता है। केवल घोषणाओं से तकनीकी के साथ विकास और आत्मनिर्भर होना संभव नहीं है। महंगाई, बेरोजगारी, रुपये की गिरती कीमत के आर्थिक संकेतक यह बता रहे हैं कि हर क्षेत्र में हम कितने दबाव में हैं। वर्तमान स्थिति में भी यदि तकनीकी क्षेत्र में आत्मनिर्भरता नहीं बढ़ती है, तो भारत में महंगाई, बेरोजगारी एवं सामाजिक आर्थिक संतुलन और भी कमजोर होगा। भारत में लाखों की संख्या में स्नातक और परास्नातक बेरोजगार होकर सड़कों पर घूम रहे हैं। वह सरकारी चपरासी की नौकरी भी करने के लिए तैयार हो जाते हैं। इतनी बड़ी युवा आबादी होने के बाद भी हम उन्हें तकनीकी ज्ञान और रोजगार के अवसर से नहीं जोड़ पा रहे हैं। विश्वविद्यालयों को विचारधारा के प्रचार-प्रसार का केंद्र बनाने की स्थान पर विश्वविद्यालयों को नवाचार और अनुसंधान केंद्र के रूप में सशक्त करना समय की सबसे बड़ी चुनौती है। एआई केवल बाजार नहीं, भविष्य के सामाजिक विकास रक्षा क्षेत्र एवं औद्योगिक क्रांति के लिए एक शक्ति है। भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ना है, तो उसे केवल उपभोक्ता और बाजार उपलब्ध नहीं कराना है। बल्कि भारत को हर क्षेत्र में निर्माता बनाने की दिशा में ठोस और पारदर्शी कदम उठाने होंगे। केंद्र सरकार को उच्च शिक्षा के क्षेत्र में विश्वविद्यालय और शैक्षिक संस्थानों को खुली छूट देनी होगी। शोध के लिए पर्याप्त राशि उपलब्ध करानी होगी। भारत के अंदर ही उन्हें प्रोत्साहित करने की जरूरत है। सरकार जो नीतियां बना रही हैं उसका वास्तविक लाभ भारतीयों को मिल रहा है या नहीं यह देखने का काम भी सरकार का है। भारत सरकार को नवाचार की दिशा में ध्यान देने की जरूरत है। चीन, जापान जैसे देशों ने इंटरनेट के समानांतर इंटरा-नेट पर भी बहुत बड़ा काम कर रखा है। उन्होंने अपनी भाषा में डिजिटल हार्डवेयर सॉफ्टवेयर और एआई युक्त संचार माध्यमों का विकास करके तकनीकी का उपयोग सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए किया जा रहा है। भारत के सरकारी कामकाज में इस तरह की कोई संस्कृति नहीं है। हम विदेशियों के पीछे आंख बंद करके भाग रहे हैं। हमें स्वदेशियों के लिए भी आंखों को खोलना पड़ेगा। तभी हम वैश्विक स्तर पर अन्य देशों का मुकाबला कर पाएंगे। ईएमएस / 19 फरवरी 26