- चर्चा: असल उपद्रवियों तक पहुंचे बिना स्थायी शांति संभव नहीं जबलपुर, (ईएमएस)। सिहोरा हिंसा की उस रात को बीते अब कई दिन हो चुके हैं। बाजार फिर से खुल गए हैं, सड़कों पर चहल-पहल लौट आई है और प्रशासन दावा कर रहा है कि हालात पूरी तरह सामान्य हैं। लेकिन सिहोरा की गलियों में एक खामोश बहस अब भी चल रही है आखिर उस रात क्या हुआ था, किसने किया और जवाबदेही किसकी तय होगी? घटना के बाद पुलिस की सक्रियता और लगातार गश्त ने तत्काल स्थिति पर नियंत्रण तो पा लिया, लेकिन इसके साथ ही कई सवाल भी पीछे छोड़ दिए। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन लोगों ने पत्थरबाजी की शुरुआत की, वे अब कहां हैं? जिन चेहरों ने पत्थरबाजी की आड़ में सिहोरा की गलियों में आतंक मचाया वे कैसे भीड़ में गुम हो गए? क्या वे पहचान से बाहर हैं या जांच की दिशा अभी अधूरी है? पुलिस कार्रवाई पर उठते प्रश्न घटना के बाद बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां की गईं। पुलिस का कहना है कि कार्रवाई दोनों पक्षों की शिकायतों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर की जा रही है। फिर भी, कुछ स्थानीय लोगों का आरोप है कि जल्दबाजी में की गई कार्रवाई में संतुलन की कमी रही। आरोप है की मस्जिद में जो नमाजी फंसे थे उपद्रव के दौरान बाहर नहीं आ पाए उन्हें पुलिस के थोक में मस्जिद से ही उठा लिया, जिसमे बुजर्गों से लेकर बोर्ड परीक्षाओं वाले बच्चे तक थे. वहीं जो मस्जिद लड़के मस्जिद के बाहर पथराव शुरु करने का हिस्सा थे, वो भाग निकले. वहीं जिन लोगों पथराव की आड़ में सिहोरा में आतंक मचाया, वो लापता हैं. पुलिस ने दूसरे पक्ष से भी अधूरी शिकायतें के आधार पर कार्यवाही कर दी. डिजिटल मीडिया की भूमिका पर बहस स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच इस बात को लेकर भी चर्चा है कि प्रिन्ट और इलैक्ट्रिनिक मीडिया की भूमिका संतुलित थी. लेकिन डिजिटल मीडिया घटना को संतुलित दृष्टि से दिखाने के बजाय इसे नकारात्मक माहौल बनाने के अवसर की तरह इस्तेमाल किया गया। इससे सामाजिक ताने-बाने पर असर पड़ा और अफवाहों को भी हवा मिली। क्या उनकी जवाबदेही तय होगी. जवाबदेही तय करना क्यों जरूरी? सवाल यह भी है कि सिहोरा की घटना की प्रशासनिक और सामाजिक जवाबदेही किस पर तय होगी? क्या यह केवल दो समुदायों के बीच टकराव था, या इसके पीछे संगठित उकसावे और असामाजिक तत्वों की भूमिका भी थी? यदि पत्थरबाजी की आड़ में कुछ लोगों ने सुनियोजित तरीके से आतंक का माहौल बनाया, तो उनकी पहचान और गिरफ्तारी अनिवार्य है। अन्यथा हर घटना के बाद निर्दोषों की गिरफ्तारी और असली दोषियों का बच निकलना एक खतरनाक परंपरा बन सकती है। स्थाई चौकी और सीसीटीवी कैमरे की मांग.. क्षेत्रीय जन सिहोरा के आजाद चौक मे स्थाई पुलिस चौक और पुलिस कंट्रोल रूम से मानीटर होने वाले सीसीटीवी कैमरे की मांग कर रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए केवल पुलिस बल की तैनाती पर्याप्त नहीं है। सामुदायिक संवाद, धार्मिक आयोजनों के समय स्पष्ट प्रोटोकॉल, सोशल मीडिया मॉनिटरिंग और अफवाह नियंत्रण की ठोस व्यवस्था जरूरी है। यदि इन सवालों पर गंभीर मंथन नहीं हुआ तो सिहोरा भले ही आज शांत दिखे, लेकिन भीतर की चिंगारियां कभी भी भड़क सकती हैं। शांति की राह संवाद से………… आज हालात सामान्य हैं, लेकिन यह सामान्यता तभी स्थायी होगी जब घटना की निष्पक्ष जांच, जवाबदेही तय करने की पारदर्शी प्रक्रिया और भविष्य के लिए ठोस निवारक कदम उठाए जाएंगे। सिहोरा की पहचान हमेशा आपसी सद्भाव और मेलजोल की रही है। ऐसे में यह जरूरी है कि राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक नेतृत्व आगे आकर साझा मंच पर संवाद स्थापित करे। सुनील साहू / शहबाज / 23 फरवरी 2026