लेख
26-Feb-2026
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मनुष्य की पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा उसे क्रमशः देखकर, सुनकर, सूँघकर, स्वाद लेकर तथा स्पर्श करके सांसारिक वस्तुओं के बारे में तरह-तरह का ज्ञान प्रदान करती हैं। ऐसे ज्ञान को प्रत्यक्ष ज्ञान कहा जाता है। ज्ञान के साधन-रूप में इन्द्रियानुभव या प्रत्यक्ष सर्वप्रथम हमारे ध्यान में आता है चूँकि इसी. के द्वारा आमतौर पर हमें सांसारिक वस्तुओं से संबंधित प्रतिज्ञप्तियों की सत्यता का ज्ञान. होता है। ज्ञान के स्रोत: ज्ञान प्राप्त करने के मुख्य स्रोत बोध , चेतना , तर्क और स्मृति हैं । ज्ञान के प्रकार: इंद्रिय ज्ञान: जो इंद्रियों से प्राप्त होता है। तार्किक या बौद्धिक ज्ञान: जो बुद्धि से प्राप्त होता है। अनुभवजन्य ज्ञान: जो अनुभव से आता है। प्रक्रियात्मक और घोषणात्मक ज्ञान: कैसे करें (skills) और क्या है (facts) की समझ। असीम क्षमता: ज्ञान की कोई सीमा नहीं है। जैसे-जैसे हम नई चीजें सीखते हैं, वैसे-वैसे हमारा ज्ञान का दायरा बढ़ता जाता है। योगवासिष्ठ के अनुसार ज्ञान की 7 भूमियाँ हैं: शुभेच्छा, विचारणा, तनुमानसी, सत्यापत्ति, असंसक्ति, पदार्थभावनी और तुरीया, जो ज्ञान की गहराई को दर्शाती हैं। मस्तिष्क की क्षमता: मानव स्मृति, विशेषकर दीर्घकालिक स्मृति, वस्तुतः असीमित जानकारी और समय तक चलने वाली यादों को संग्रहित कर सकती है । ज्ञान मानव विकास का एक ऐसा साधन है जिसकी कोई अंतिम सीमा नहीं है, और यह व्यक्ति की सीखने की इच्छा और क्षमता पर निर्भर करता है, ज्ञान के प्रमुख स्रोत निम्न हैं : इंद्रिय अनुभव : हमारी पांचों इंद्रियां (आंख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) ज्ञान का प्राथमिक स्रोत हैं, जिसके माध्यम से हम बाहरी दुनिया को अनुभव करते हैं। तर्क : बुद्धि और तार्किक विश्लेषण व आगमनात्मक/निगमनात्मक के माध्यम से प्राप्त ज्ञान है । अनुभववाद : इंद्रियों द्वारा प्राप्त अनुभव ही ज्ञान का आधार है। तर्कवाद : तर्क और बुद्धि पर आधारित ज्ञान होता है । प्राधिकरण/विशेषज्ञ : विशेषज्ञों, किताबों, शिक्षकों और विश्वसनीय स्रोतों से प्राप्त ज्ञान है । स्मृति : अतीत के अनुभवों और सीख को याद रखना। अंतर्ज्ञान: सीधे और तुरंत समझ में आने वाला ज्ञान है । आत्मनिरीक्षण : अपने ही विचारों और भावनाओं को समझना है । शारीरिक कसरत योग नहीं है, व्यायाम है। चित्त की वृत्तियों का निरोध कर, ईश्वर से एकाकारिता ही योग का अन्तिम लक्ष्य है। *सभी प्रकार की शारीरिक और मानसिक व्याधियों से मुक्त हो कर आंतरिक शांति और चिरस्थायी आनंद से भरपूर, जीवन जीने की कला है यह योग। जीवन के दुखों, पीड़ाओं और दु:खों का अंत करना। मनुष्य के संपूर्ण रूप से सर्वांगीण विकास कर, मानव शरीर को दिव्य रूप में रूपांतरित करके, उसे सुपरमैन बनाना। यह एक कल्पना की तरह लगता है, लेकिन यह कल्पना बिल्कुल नहीं, कल्पना तो शेखचिल्लिओं का काम था। दुनिया भर से लाखों अभ्यासी हैं, जो इसे व्यावहारिक रूप से प्रयोग कर रहे हैं। यह ध्यान/भक्ति/योग/आत्मजागृति/आत्म अध्ययन की विद्या हैं, जो हमारे संतों/ऋषियों ने गृहस्थियों के लिए भी सर्व सुलभ करा दी है। यह एक सहज, सरल, सभी प्रकार के कर्मकांडो से मुक्त ध्यान की विधि है, इसमें मात्र एक-एक घंटा सुबह-शाम ही खर्च होते हैं, बाकी समय हम अपनें समाज/संसार में व्यतीत करते हैं। इसके लिए अपने कर्म-कर्तव्य छोड़ने की भी आवश्यकता नहीं है। धीरे धीरे यही अभ्यास हमें गहरे ध्यान की अवस्था में ले जाता है। इसके अभ्यास का अर्थ है, धैर्य, सम्भाव, कृतज्ञता और आनंद के राज्य में स्थित हो जाना है।अतः ज्ञान के स्रोत के रूप में अनुभव, तर्क और प्रेरणा तीनों ही अपनी-अपनी महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाते हैं। ये तीनों कारक एक-दूसरे के पूरक हैं और किसी भी व्यक्ति के ज्ञान को गहराई और परिपक्वता प्रदान करते हैं। ईएमएस / 26 फरवरी 26