आधुनिक युग में दवाएं मानव जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी हैं। आपातकालीन स्थितियों और गम्भीर रोगों में इनका योगदान अमूल्य है। किन्तु जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों जैसे अवसाद, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग आदि में केवल दवाओं पर निर्भरता दीर्घकाल में दुष्प्रभाव भी उत्पन्न कर सकती है। अतः इस प्रकार की स्थितियों में प्रकृति की शरण- योग, ध्यान, शुद्ध वायु, सूर्य का प्रकाश, वन-स्पर्श आदि प्रभावी विकल्प के रूप में हो सकते हैं। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (यूसीएल) और इंपीरियल कॉलेज की स्टडी में यह दावा किया गया है कि प्रकृति के करीब रहना सेहत के लिए तो अच्छा है ही, इससे भावनात्मक और व्यवहार संबंधी समस्याएं भी नहीं होती। जिन बच्चों का हरियाली से बेहतर एक्सपोजर होता है उनका बौद्धिक विकास भी अच्छी तरह होता है। ठीक इसके विपरीत शहरी क्षेत्रों में और प्रकृति से कटकर रहने वाले बच्चों को भावना और व्यवहार संबंधी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। स्टडी के प्रमुख लेखक और यूसीएल में प्रोफेसर केट जोन्स के मुताबिक नतीजों से स्पष्ट होता है कि पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों के द्वारा मिलने वाला आडियो-विजुअल एक्सपोजर मनोवैज्ञानिक तौर पर फायदा पहुंचाता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि ग्रीन स्पेस में वॉक और शारीरिक गतिविधियां करने से एंडॉर्फिन (खुशी से जुड़ा हॉर्मोन) रिलीज होता है। इससे मूड सुधरता है और 1चिन्ता व तनाव में कमी आती है। प्राकृतिक वातावरण में घूमने और समय बिताने से मानसिक सेहत पर सकारात्मक असर पड़ता है। अमेरिकन कॉलेज ऑफ स्पोर्स मेडिसिन ने गणना की है कि नियमित एक्सरसाइज कैंसर होने के जोखिम को 69 प्रतिशत तक कम कर सकती है। कैंसर रिसर्च यूके का एक्सरसाइज इज मेडिसिन इन ऑन्कोलॉजी शीर्षक का पेपर कहता है कि आप जितने एक्टिव रहे, उतना अच्छा। संक्षेप में कहे तो व्यायाम इम्यून सेल्स की एक्टिविटी बढ़ा सकता है, जिससे कैंसर की ग्रोथ रोकने में मदद मिल सकती है। स्वीडिश व अमेरिकी शोधकर्ताओं द्वारा 7,55,459 लोगों पर किया गया अध्ययन बताता है कि 20 मिनट रोज या प्रति सप्ताह 150 मिनट वॉर्किंग जैसी आधुनिक एक्सरसाइज लिवर कैंसर का जोखिम 80 प्रतिशत तक कम कर सकती है। आंकड़े बताते हैं कि इससे कोलन, ब्रेस्ट और किडनी कैंसर जैसे अन्य कैंसरों का जोखिम भी कम होता है। यूके में नियमित आवागमन करने वाले 2,50,000 लोगों के पांच वर्ष तक अध्ययन में यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लासगो के शोधकताओं ने पाया कि कुछ दूर या पूरी तरह साइकिल से काम पर जाने से कैंसर होने की आशंका 45 प्रतिशत तक कम हो सकती है। यूके के 2,80,423 प्रतिभागियों के अध्ययन में ऑस्ट्रेलिया, नार्वे और स्पेन के शोधकर्ताओं ने पाया कि अगर कोई व्यक्ति प्रतिदिन पांच मंजिल से ज्यादा सीडियां चढ़ता है तो कैंसर से मौत का जोखिम कम होता है। अगर आप डुप्लेक्स में रहते हैं तो प्रतिदिन कम से कम पांच बार सीढिया चढ़ें। साइकोलॉजिकल साइंस मैग्जीन की रिपोर्ट के अनुसार पेड़-पौधों और पहाड़ों के बीच वक्त बिताने से मस्तिष्क को रोजमर्रा के अनावश्यक एक्साइटमेंट से आराम मिलता है अगर आप काम के तनाव से ब्रेक लेकर प्रकृति के बीच जाएं तो एकाग्रता पाने में मदद मिलती है। कार्यक्षमता बढ़ती है। मिशिगन यूनिवर्सिटी के एक शोध में प्रकृति के बीच वक्त बिताने वाले छात्रों ने शहरी माहौल में पढ़ाई करने वालों की तुलना में परीक्षा में 20 प्रतिशत बेहतर अंक पाए। इससे शॉर्ट टर्म व लॉन्ग टर्म मेमोरी सुधरती है। हार्वर्ड हेल्थ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार प्रकृति के बीच रहने पर घाव जल्दी भरते हैं। जो लोग अधिक प्राकृतिक प्रकाश के सम्पर्क में आए वे रीढ़ की हड्डी की सर्जरी के बाद तेजी से ठीक हुए। दूसरों की तुलता में उन्हें दर्द का अहसास भी कम हुआ। फिनलैंड में हुए एक अध्ययन के अनुसार प्रकृति के बीच केवल 15 मिनट बिताने से मानसिक परेशान व्यक्ति को खुशी मिलती है। अगर व्यक्ति प्राकृतिक वातावरण में सैर करे तो खुशी बढ़ जाती है। प्रकृति मन पर सीधे असर करती है। एक जापानी अध्ययन से पता चला है कि जिन महिलाओं ने दो दिन की अवधि में छह घंटे जंगल में बिताए, उनमें व्हाइट ब्लड सेल्स की मात्रा बढ़ गई। व्हाइट सेल्स वायरस से लड़ने में मदद करते हैं। ऑस्ट्रेलिया में हुए एक शोध में पता चला कि आडटडोर एक्टिविटी से बच्चों में नजरें कमजोर होने का खतरा कम हो जाता है। प्रकृति आपको उम्र के साथ होने वाले शारीरिक दर्द को भी कम करती है। एक शोध में पाया गया कि 70 साल की उम्र में जिन लोगों ने रोज कुछ देर के लिए बाहर घूमने जाने के नियम का पालन किया उन्हें शरीर में दर्द की शिकायत अन्य की तुलना में कम हुई। वे 75 की उम्र के बाद भी बेहतर नींद और स्वास्थ्य का आनंद लेते रहे। प्रकृति कोई विकल्प नहीं है, बल्कि मूल आधार है। दवाएं आवश्यकता है पर जीवन का दर्शन नहीं। यदि हम प्रकृति के साथ साम्जस्य बैठाकर चलें, संतुलित आहार, नियमित योग-व्यायाम, स्वच्छ पर्यावरण, मानसिक शांति हो तो रोग दूर होने लगते हैं। प्रकृति से दूर जाना ही रोग है और प्रकृति की ओर लौटना ही स्वास्थ्य। (सलाहकार जनजातीय कार्य विभाग, भोपाल, राष्ट्रपति पुरस्कार, मुख्यमंत्री उत्कृष्टता पुरस्कार एवं अन्य पुरस्कारों से सम्मानित) ईएमएस / 26 फरवरी 26