-444 दिन तक 52 अमेरिकी रहे बंधक नई दिल्ली,(ईएमएस)। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान और अमेरिका के रिश्तों में आई कड़वाहट ने 4 नवंबर 1979 को एक ऐतिहासिक मोड़ लिया। तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास पर कट्टरपंथी छात्रों के एक समूह ने कब्जा कर लिया और 52 अमेरिकी नागरिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा। यह घटना इतिहास में ‘ईरान बंधक संकट’ के नाम से दर्ज है। क्रांति के बाद निर्वासन से लौटे अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी ने ईरान में इस्लामिक गणराज्य की स्थापना की। उसी वर्ष अक्टूबर में अपदस्थ शाह मोहम्मद रजा पहलवी को कैंसर के इलाज के लिए अमेरिका में प्रवेश की अनुमति दी गई। इस फैसले ने ईरान में अमेरिका-विरोधी भावनाओं को भड़का दिया। 4 नवंबर 1979 को खुद को इमाम की राह के छात्र बताने वाले प्रदर्शनकारियों ने अमेरिकी दूतावास तेहरान पर धावा बोल दिया। शुरुआत में 66 लोगों को बंधक बनाया गया, जिनमें से 13 को कुछ समय बाद रिहा कर दिया गया। अंततः 52 अमेरिकी नागरिक 444 दिनों तक कैद में रहे। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने बंधकों की रिहाई को सर्वोच्च प्राथमिकता बनाया। कूटनीतिक दबाव और आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद समाधान नहीं निकला। अप्रैल 1980 में ‘ऑपरेशन ईगल क्लॉ’ नामक सैन्य अभियान चलाया गया, जो हेलीकॉप्टर दुर्घटना के कारण विफल रहा और आठ अमेरिकी सैनिक मारे गए। बंधकों को 20 जनवरी 1981 को रिहा किया गया, उसी दिन जब रॉनल्ड रीगन ने अमेरिकी राष्ट्रपति पद की शपथ ली। इस प्रतीकात्मक समय ने दोनों देशों के बीच अविश्वास को और गहरा कर दिया। ईरान ने बाद में दूतावास परिसर को ‘जासूसों का अड्डा’ बताते हुए उसे सांस्कृतिक केंद्र और संग्रहालय में बदल दिया। वहीं अमेरिका के लिए यह घटना वैश्विक अपमान और विदेश नीति की बड़ी चुनौती के रूप में देखी गई। विशेषज्ञों का मानना है कि 1979-81 का बंधक संकट ही वह बिंदु था, जहां से अमेरिका-ईरान संबंधों में स्थायी शत्रुता की शुरुआत हुई। आज भी दोनों देशों के बीच तनाव के संदर्भ में इस घटना को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के रूप में याद किया जाता है। हिदायत/ईएमएस 02 मार्च 2026