लेख
02-Mar-2026
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होली के लिए कहा जाता है कि जब मौसम में बासंती ब्यार बहने लगे और लोगो में मस्ती का भाव कुलमुलाने लगे और प्रकृति अपना आवरण बदलने लगे तो समझो फाल्गुन आ गया यानि होली ने आपके द्वार पर दस्तक दे दी है। होली एक ऐसा पर्व है जो स्वयं ही लोगो के दिलो में उमंगता लाकर उन्हे अपने रगं में रगंने लगती है। प्रकृति का यही उल्लास लोगो के मन में एक नई उमंग,एक नई खुशी,एक नई स्फूर्ति को जन्म देकर उनके मन को आल्हादित करता है। प्रकृति की इस अनूठी छटा व मादकता के उत्सव को होलिकोत्सव के रूप में मनाए जाने की परम्परा सदियों से चली आ रही है। जिस पर हम सब रंगो से सराबोर हो जाते है। होली के इस पर्व को यौवनोत्सव,मदनोत्सव,बसंतोत्सव,दोलयात्रा व शिमागा के रूप में मनाये जाने की परम्परा है। फाल्गुन मास के अन्तिम दिन मनाए जाने वाले रंगो के इस पर्व होलिकोत्सव को लेकर यूं तो विभिन्न कथाए प्रचलित है।लेकिन इस पर्व की वास्तविक शुरूआत प्रकृति परिवर्तन से ही होती है। प्रकृति अपना आवरण बदलती है। पेड पोधे अपने पुराने पत्तो को त्यागकर ,पेड का तना अपने बक्कल को छोडकर नये पत्तो व नये स्वरूप में परिवर्तित होते है। इसी प्रकार मनुष्य के शरीर की खाल तक धीरे धीरे बदल जाती है। पांच तत्वों से बना हमारा शरीर भी चूंकि प्रकृति का अंग है इसकारण वह भी मन और शरीर दोनो तरह से अपने आपमें परिवर्तन का अनुभव करता है। यही अनुभव हम होली के रूप में तहसूस करते है। होली अर्थात पवित्रता का पर्व होली शब्द को यदि अंग्रेजी भाषा रूप में देखे तो इसका अर्थ पवित्र है। यानि होली को पवित्रता का त्यौहार भी माना जाता है। जिसमें सब आपसी ईष्या व द्वेष मिटाकर पवित्र मन से नई फसल आने की खुशी होली रूप में मनाते है। यदि यह पर्व पवित्र है,तो फिर इस पवित्र और पावन पर्व पर हुडदंग कैसा ?यह पर्व प्रकृति केे नवपरिवर्तन से जुडा है। प्रकृति जब अपना आवरण बदलने लगती है मौसम में बासंती ब्यार बहने लगती और लोगो में प्यार और मोहब्बत का भाव जगाने लगती है तो समझो फाल्गुन का मौसम आ गया और होली अर्थात पवित्रता के रंग में रंगने का अवसर भी आ गया। होली लोगो के दिलो पर दस्तक देकर उन्हे अपने रगं में रगंने लगती है। प्रकृति का यही उल्लास लोगो के मन में एक नई उमंग,एक नई खुशी,एक नई स्फूर्ति को जन्म देकर उनके मन को आल्हादित करती है। प्रकृति की इस अनूठी छटा व मादकता के उत्सव को होलिकोत्सव के रूप में मनाए जाने की परम्परा सदियों से चली आ रही है। होली की मशहूर कथाएं धार्मिक पुस्तको व शास्त्रों में होली को लेकर विभिन्न दन्त कथायें प्रचलित है। इन कथाओं के अनुसार नारद पुराण में यह पर्व हिरण्यकश्यप की बहन होलिका के अन्त व भक्त प्रहलाद की ईश्वर के प्रति आस्था के प्रति विजय का प्रतीक है। प्रचलित कथा के अनुसार हिरण्य कश्यपको जब उनके पुत्र प्रहलाद ने भगवान मानने से इंकार कर दिया तो अहंकारी शासक हिरण्य कश्यप ने अपने पुत्र प्रहलाद की हत्या के लिए उसे आग में न जलने का वरदान प्राप्त होलिका की गोद में जलती चिता में बैठा दिया किन्तु होलिका का आग में न जलने का वरदान काम नही आया और वह आग में जलकर भस्म हो गई। जबकि प्रहलाद सकुशल बच गया। तभी से होलिकोत्सव पर होली दहन की परम्परा की शुरूआत हुई। होली के पर्व को मुगल शासक भी शान से मनाया करते थे। मुगल बादशाह अकबर अपनी महारानी जोधाबाई के साथ जमकर होली खेलते थे। बादशाह जहांगीर ने भी पत्नी नूरजहां के साथ रंगो की होली खेली। इसी तरह बादशाह औरंगजेब ,उनके पुत्र शाह आलम और पोत्र जहांदर शाह ने भी होली का त्योहार रंगो के साथ मस्ती के आलम में मनाया जिसका उल्लेख इतिहास में पढने को मिलता है। जिससे स्पष्ट है कि हिन्दू ही नही मुस्लमान भी होली का पर्व मनाते रहे है। पिरान कलियर के वार्षिक उर्स में विदेशों से आने वाले जायरीन हर साल फूलो की होली खेलते है, जिसमें हिन्दू और मुस्लमान दोनो शामिल होते है। राजस्थान के सांभर की होली राजस्थान में सांभर की होली का अपना महत्व है। सांभर की होलीमनाने के लिए आदिवासी समाज की लडकियां वस्त्रो की जगह अपने शरीर को टेसू की फूल मालाओं से ढककर अपने प्रेमियों के साथ नदी किनारे जाकर सर्प नृत्य करती है। इस सर्प नृत्य के बाद इन लडकियो की शादी उनके प्रेमियों के साथ कर दी जाती है। राजस्थान में ही हाडोती की कोडामार होली जिसमें देवर भाभी व जीजा शाली एक दुसरे को कोडे मार कर होली के रगं में रंग जाते है। इसी राजस्थान में होली पर अकबर बीरबल की शोभा यात्रा निकालकर होली का रगं व गुलाल खेला जाता है। राजस्थान के बाडमेंर में तो होली की मस्ती के लिए जीवित व्यक्तियों की शवयात्रा बैण्डबाजे के साथ निकालने की परम्परा है। वही राजस्थान के जालोर क्षेत्र में होली पर लूर नृत्य किया जाता है तो झालावाड क्षेत्र में गधे पर बैठकर होली की मस्ती में झूमने की परम्परा है। बीहड क्षेत्र में तो पुरूष धाधरा चोली पहन कर ढोल नंगाडे बजाते हुए होली का नृत्य करते है तथा होली का गायन करते है। मथुरा की लठठमार होली बीकानेर की डोलचीमार होली की कहानी भी गजब है। लठठमार होली मथुरा के बरसाने में खेली जाती है। जिसमें महिलाए पुरूषो पर लठठ से प्रहार करती है और पुरूष ढाल का उपयोग कर अपना बचाव करते है।इस लठठमार होली को देखने के लिए देश विदेश से बडी सख्ंया में श्रद्धालु मथुरा आते है। भले ही इस होली को लठठमार होली के रूप में मनाया जाता हो परन्तु किसी के भी मन में होली खेलते समय कोई बैर भाव नही होता सभी प्यार और माहब्बत को नया जन्म देने के लिए यह होली खेलते है। पंजाब के होला मोहल्ला की शान ही निराली है। होला मोहल्ला की तैयारी काफी पहले से शुरू हो जाती है। जिसमें शामिल होने के लिए लोग दूर दूर से पंजाब पहुंचते है और होला मोहल्ला की मस्ती में खोये रहते है। होला मोहल्ला रूप में होली का पर्व मनाने का मकसद भी नई फसल की खुशी मनाना ही है। इसी तरह ,कांगडा की भक्ति रस में डूबी होली की अपनी ही शान है। यानि चहुं और मस्ती के इस पर्व को नई फसल आने की खुशी के रूप में ही जगह जगह मनाया जाता है। विकारमुक्ति का पर्व है होली कुछ लोगो ने होली की मस्ती के नाम पर इस पवित्र व पावन पर्व को अपवित्र भी कर दिया है। होली पर खुशी कायम करने के लिए आपसी प्रेम,मोहब्बत,भाईचारे की नई शुरूआत के लिए रूठो को मनाने के लिए और विकारों को छोडकर अच्छे गुण धारण करने के संकल्प लेने के बजाए कुछ लोग होली पर शराब पीने,जुआ खेलने,दुसरों पर कीचड डालने को ही होली समझ बैठते है जबकि यह पर्व इन दुगुर्णो को त्यागने का सबसे अच्छा अवसर है। नई फसल ,नई प्रकृति आवरण और शरीर में नया खून बनने और त्वचा आवरण बदलने का स्वागत हमे प्राकृतिक रंगो ,फूलो और मिठास से करना चाहिए। होली जलाने का तात्पर्य भी यही है कि हम अपने विकारो को होलिका में जलाकर पवित्र और पावन बनने का संकल्प ले तभी होली पर्व को सार्थक किया जा सकता है और तभी होली का भरपूर आनन्द भी ले सकते है। (लेखक आध्यात्मिक चिंतक व वरिष्ठ साहित्यकार है) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 2 मार्च /2026