(होली पर विशेष ) चारों तरफ होली के रंग-गुलाल उड़ रहे हैं। हवा में मस्ती छाई है। यहां न किसी का भेष अलग है, न किसी का रंग और न ही किसी की कोई जाति रह गई है ।जब एक बड़ी भीड़ को एक जैसा और एक ही रंग में रंगे देखते हैं तो उसके साथ ही हो लेना चाहिए। ये साथ हो लेना ही होली है।संत कबीर इस होली को बड़े ही अलग रंग और अलग ढंग में समझते-समझाते रहे हैं। होली की इस मस्ती और मल्हारी में कबीर की एक बात ध्यान आ जाती है । कबीर कहते हैं... गगन मण्डल अरुझाई, नित फाग मची है। ज्ञान गुलाल अबीर अर्घजा, सखियां लै लै धाई। उमंगि उमंगि रंग डारी, पिया पर फगुआ देहु भलाई।। गगन मण्डल बिच होरी मची है, कोई गुरु गम तैं लखि पाई। शब्द डोर जहँ अगर धरतु है, शोभा बरनि न जाई।। फगुआ नाम दियो मोहिं सतगुरु, तन की तपन बुझाई। कहै कबीर मगन भई बिरहिनी, आवागवन नसाई।। इन लाइनों में होली का असली रंग छिपा है..जहाँ अबीर -गुलाल -फाग की मस्ती का संदेश साफ़ दिख रहा है ,यहाँ बड़ा सवाल यह है कि आज हम कैसी होली खेल रहे हैं।क्या ..हम अपनी असली होली से दूर होते जा रहे है।भारत की सांस्कृतिक परंपरा में होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और मानवीय संबंधों का जीवंत उत्सव है। यह वह अवसर है जब रंगों के बहाने मन के भीतर जमी धूल को झाड़ने, रिश्तों में आई दरारों को भरने और जीवन में नई ऊर्जा भरने का अवसर मिलता है। होली हमें याद दिलाती है कि जीवन की असली खूबसूरती बाहरी रंगों में नहीं, बल्कि भीतर की भावनाओं में छिपी होती है।आज का समय तेज़ रफ्तार, प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का है। परिवार साथ रहते हुए भी दूर होते जा रहे हैं। संवाद की जगह औपचारिक संदेशों ने ले ली है और संवेदनाओं की जगह तर्क ने। छोटी-छोटी बातों पर मनमुटाव, अहंकार और गलतफहमियाँ रिश्तों के बीच दीवार खड़ी कर देती हैं। ऐसे में होली एक अवसर बनकर आती है-इन दीवारों को गिराने और अपनत्व के पुल बनाने का। रंगों के त्योहार के रूप में जाना जाने वाला यह जीवंत त्योहार, लोगों को एक-दूसरे पर खुशी से रंगीन गुलाल पाउडर और पानी फेंकने के साथ गले मिलने का है। हमारा देश कृषि प्रधान है। इसलिए सभी बड़े पर्व उसी के अनुरूप आते हैं। दीपावली और होली के त्योहार ऋतुओं की संधि बेला में पड़ते हैं। जब किसानों के घरों में नई फसल कटकर आना शुरू होती है, तो उन घरों में आने वाली संपन्नता की उम्मीद से ही उल्लास का माहौल बन जाता है। ऋतु बदलने के कारण खान-पान में भी बदलाव होता है। नई फसल में आए उत्पादों को हम इन पर्वों पर पूजते हैं। जलती होलिका में गेहूं की बालें डालने और गन्ने को चढ़ाने का यही मंतव्य है। अब सर्दी जा रही है, गर्मी की आहटें सुनाई देने लगी हैं, ऐसे में समय के द्वार पर आ खड़ा हुआ है रंग पर्व होली। लोग जमकर रंग लगाएंगे, गुलाल उड़ाएंगे, खुशियां मनाएंगे। होली भारत में किसी एक जाति, धर्म या क्षेत्र विशेष का पर्व नहीं है, इसकी पहचान देश की संस्कृति के रूप में होती है। वसंत ऋतु जनजीवन में नई चेतना का संचार कर रही होती है, फागुन की सुरमई हवाएं वातावरण को मस्त बनाती हैं, तभी होली के रंग लोकजीवन में घुल जाते हैं। यही नहीं पूरी दुनिया में होली की ही तरह अलग-अलग समय में त्योहार मनाये जाते हैं जिनका असल मकसद तनावों से दुर कुछ पल मौज-मस्ती के बिताना और अपने परिवेश के गैरजरूरी सामान से मुक्ति पाना होता है। विडंबना है कि अब होली का स्वरूप भयावह हो गया है। वास्तव में होली का अर्थ है-होली, यानि जो बीत गई सो बीत गई, अब आगे की सुध है। गिले-शिकवे मिटाओ, गलतियों को माफ करो और एक दूसरे का रंगों में सराबोर कर दो रंग प्रेम के, अपनत्व के, प्रकृति के। इस पर्व की खासियत यह है कि लोग दुश्मनी, बैर भाव भूलकर एक हो जाते हैं इसीलिए यह सौहार्द्र का पर्व भी है। इसलिए हमें होली खेलते हुए भी यह ध्यान रखना है कि किसी को ऐसे रंग न लगाएं कि उसे नुकसान हो और आपसी सौहार्द्र प्रभावित हो। होली के नाम पर दोस्तों और निकटजनों के साथ कुछ भी ऐसा न करें जिससे उनका दिल दुखे। आप खुद भी व्यसनों से दूर रहकर खुशी से रंग खेल सकते हैं। इस अवसर पर बनने वाले व्यंजनों का आनंद ले सकते हैं और आत्मीयता भरे व्यवहार से दूसरों यानी परायों को भी अपना बना सकते हैं। हरिवंशराय बच्चन ने अपनी एक कविता में क्या खूब कहा है-होली है आज अपरिचित से परिचय कर लो, होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो, भूल शूल से भरे वर्ष के बैर विरोधों को, होली है तो आज शत्रु को बांहों में भर लो। ------------------------------- क्या सिखाती है होली हमें ? अंततः, होली हमें यह सिखाती है कि जीवन का असली रंग प्रेम और अपनत्व है। बाहरी रंग कुछ समय बाद फीके पड़ जाते हैं, लेकिन दिलों में भरे स्नेह के रंग स्थायी होते हैं। यदि हम इस त्योहार की भावना को अपने दैनिक जीवन में उतार लें, तो हर दिन एक उत्सव बन सकता है। आइए, इस होली पर हम यह संकल्प लें कि मनमुटाव को पीछे छोड़ेंगे, संवाद को मजबूत बनाएँगे और रिश्तों को प्राथमिकता देंगे। क्योंकि जब दिल जुड़ते हैं, तभी समाज सशक्त होता है और जीवन सचमुच रंगों से भर उठता है। होली केवल रंगों का नहीं, बल्कि भावनाओं का पर्व है-और यही इसे सबसे खास बनाता है। ( युवा अध्यक्ष एवं मीडिया प्रभारी, सर्व ब्राह्मण महासंघ) ईएमएस / 02 मार्च 26