राष्ट्रीय
03-Mar-2026
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नई दिल्ली,(ईएमएस)। आज के दौर में नशा सिर्फ शराब, सिगरेट या ड्रग्स तक सीमित नहीं रहा। डिजिटल दुनिया, जंक फूड और मुनाफे के लिए डिजाइन किए गए प्रोडक्ट्स ने हमारे दिमाग की खुशी-संवेदना (लिम्बिक सिस्टम) को सीधे निशाना बना लिया है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार औसतन एक व्यक्ति हर दिन 2 घंटे 23 मिनट सोशल मीडिया, शॉपिंग और ट्रेंडिंग वीडियो में बिता देता है। सोशल मीडिया ‘लाइक’, ‘फॉलोअर्स’ और लगातार तुलना करने के दबाव से मानसिक तनाव बढ़ाता है। जंक फूड, चीनी और फास्ट फूड हमारे शरीर में डोपामाइन का स्तर बढ़ाकर खुशी का अहसास कराते हैं, जिससे आदतें बनती हैं। क्या है लिम्बिक कैपिटलिजम मस्तिष्क का लिम्बिक सिस्टम भावनाओं और खुशी के लिए जिम्मेदार है। कई कंपनियां इसे प्रोफ़िट के लिए सीधे निशाना बनाती हैं। इससे केवल व्यक्तिगत हानि नहीं होती, बल्कि समाज और संसाधनों पर भी असर पड़ता है। किसे मानते हैं नशा अब नशे में डिजिटल लत, ओपिओइड, जुआ, ज्यादा खाना और हाई-कैलोरी फूड शामिल हैं। दिमाग का फ्रंटल कॉर्टेक्स, जो निर्णय और कंट्रोल के लिए जिम्मेदार है, प्रभावित होता है। मोटापे की समस्या पैदा की जाती है और फिर वजन घटाने की दवाओं और सर्जरी से मुनाफा कमाया जाता है। फूड इंडस्ट्री ने प्रोसेस्ड और हाई-कैलोरी फूड से ऐसी आदतें मजबूर कर दी हैं। बचपन में आदतें और इंडस्ट्री की रणनीति ज्यादातर आदतें बचपन में बनती हैं। कंपनियां छोटे बच्चों को टारगेट करती हैं, क्योंकि लंबे समय तक नियमित उपयोग से अधिक मुनाफा मिलता है (पैरेटो सिद्धांत)। ऐतिहासिक रूप से समाज ने तंबाकू जैसी आदतों के खिलाफ आंदोलन किया है। डिजिटल लत का समाधान कठिन है, क्योंकि तकनीक हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है। चीन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश टीनेजर्स की सोशल मीडिया आदतें नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं। संक्षेप में, हमारी आधुनिक जीवनशैली में डिजिटल और खाद्य उद्योग ने नशे की परिभाषा बदल दी है। बचपन में शुरू होने वाली आदतें, लिम्बिक सिस्टम पर आधारित उत्पाद और मुनाफाखोरी से चलने वाले मॉडल हमें लगातार एक चक्र में उलझा रहे हैं। हिदायत/ईएमएस 03 मार्च 2026