नई दिल्ली (ईएमएस)। फेफड़ों के कैंसर से बचाव के लिए किसी भी असामान्य खांसी, सांस में बदलाव या आवाज बैठने जैसे लक्षणों को नजरअंदाज न करें। रोग की शुरुआती पहचान से न केवल इलाज आसान होता है बल्कि जीवन बचाने की संभावना भी कई गुना बढ़ जाती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, फेफड़ों में असामान्य कोशिकाओं का तेजी से पनपना फेफड़ों के कैंसर का मुख्य कारण होता है। मेडिकल की भाषा में इसे मेटास्टेसिस कहा जाता है, जहां कैंसर धीरे-धीरे बढ़कर फेफड़ों की क्षमता को कम कर देता है और आगे चलकर लंग फेलियर का खतरा पैदा कर सकता है। विशेषज्ञों की मानें तो इस बीमारी की समय पर पहचान और उचित उपचार न होने पर यह जानलेवा साबित हो सकती है। फेफड़ों के कैंसर के शुरुआती लक्षण अक्सर सामान्य सर्दी-जुकाम जैसे लगते हैं, लेकिन इनके पैटर्न में स्पष्ट अंतर होता है। सबसे पहले लगातार रहने वाली खांसी दिखाई देती है, जो दो से तीन हफ्तों तक खत्म नहीं होती। खांसते समय खून आना भी कैंसर का गंभीर संकेत हो सकता है। गहरी सांस लेने, हंसने या खांसने पर सीने में तेज दर्द महसूस होना भी इस बीमारी की शुरुआती चेतावनी है। जैसे-जैसे कैंसर बढ़ता है, सांस लेने में कठिनाई और सांस फूलना आम समस्या बन जाती है। कुछ मरीजों में आवाज बैठने लगती है और बोलते समय सीटी जैसी आवाज भी सुनाई दे सकती है, जबकि गले में कोई संक्रमण नहीं होता। यह आवाज में बदलाव फेफड़ों के आसपास के तंत्रिका तंत्र पर कैंसर के दबाव का परिणाम होता है। इसके अलावा, बिना वजह वजन कम होना, हर समय थकान महसूस होना, और बार-बार संक्रमण होना भी फेफड़ों के कैंसर के संकेत हो सकते हैं। यह रोग निमोनिया और ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियों की संभावना भी बढ़ा देता है। फेफड़ों के कैंसर का असर सिर्फ फेफड़ों तक सीमित नहीं रहता। बढ़ते चरण में यह छाती के बीच के हिस्से, कॉलरबोन के आसपास की ग्रंथियों, लिम्फ नॉड्स और अन्य अंगों तक फैल सकता है। एडवांस स्टेज में पसलियों, रीढ़ की हड्डी, कूल्हों, मस्तिष्क, लिवर, किडनी के ऊपर स्थित एड्रिनल ग्रंथियों और दूसरे फेफड़े तक भी फैलाव की संभावना रहती है। विशेषज्ञ कहते हैं कि फेफड़ों के कैंसर से बचाव के लिए धूम्रपान से दूरी, प्रदूषण से बचाव और नियमित स्वास्थ्य जांच बेहद जरूरी हैं। सुदामा/ईएमएस 03 मार्च 2026