लेख
जीवन की कलाइयों पर तितली-सी कोमल स्त्री, रंगों से भरती रहती घर-आँगन की हर सुबह। पर युद्ध की एक आहट सारे रंग उड़ा ले जाती है, सपनों के आँगन सूने होते, हँसी अचानक थम जाती है। विधवा की निस्तब्ध आँखें, विस्थापन की लंबी राह- डर और असुरक्षा की छाया में कितनी जिंदगियाँ हो जातीं तबाह। फिर भी वही स्त्री राख से उजाला बुनती है, टूटे समय की कलाइयों पर आशा की तितली चुनती है। क्योंकि वह जानती है- युद्ध केवल घर नहीं उजाड़ता, उसकी लपटों में राष्ट्र और समाज भी लंबे समय तक उबर नहीं पाते। (फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार) .../ 8 मार्च /2026