- गौ रक्षा आंदोलन को भूली भाजपा - शंकराचार्य ने 60 साल बाद किया खुली जंग का ऐलान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने 11 जुलाई से लखनऊ में गौ रक्षा कानून बनाने के लिए आंदोलन शुरू करने का शंखनाद किया है। वह लखनऊ की ओर लगातार बढ़ रहे हैं। उनके साथ साधु-संत और उनके समर्थक भी बड़ी संख्या में साथ चल रहे है। जिसके कारण उत्तर प्रदेश और देश की राजनीति में एक नया टकराव देखने को मिल रहा है। शंकराचार्य जिस आक्रामक तेवर के साथ लखनऊ पहुंच रहे हैं। उसको लेकर गौ रक्षा से जुड़ी 60 साल पुरानी यादें ताजा हो गई हैं। 60 साल पुराना आंदोलन, गोलीबारी लाठी चार्ज दिल्ली में गौ रक्षा को लेकर 7 नवंबर 1966 को संसद भवन के सामने बाद उग्र आंदोलन हुआ था। इस आंदोलन का नेतृत्व उस समय की जनसंघ जो वर्तमान में भाजपा के रूप में जानी जाती है। आचार्य कृपलानी के नेतृत्व में सैकड़ो साधु संत और राजनीतिक नेता इस आंदोलन में शामिल हुए थे। आंदोलनकारियों की मांग थी, गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए। यह मांग संविधान लागू होने के बाद 1960 से आंदोलन के रूप में शुरू हो गई थी। जगह-जगह पर गौ रक्षा समितियां बनाई गई थी। यह आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर फैलाया गया था। गोलीबारी लाठी चार्ज आंसू गैस 7 नवंबर 1966 को प्रधानमंत्री की कुर्सी में इंदिरा गांधी विराजमान थी। उस समय देश सबसे संकट के दौर से गुजर रहा था। देश में अकाल था। लोगों को खाने के लिये अनाज नहीं मिल पा रहा था। भारत 1962 का चीन से युद्ध लड़ा, 1965 में पाकिस्तान ने भारत के ऊपर हमला किया था। उस समय देश विषम परिस्थितियों से गुजर रहा था। उस समय जनसंघ और साधु संतों ने संपूर्ण भारत में गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग करते हुए यह आंदोलन किया था। संविधान में गौ संरक्षण को स्थान दिया गया था। जनसंघ, आर्य समाज, हिंदू संगठनों और साधु-सन्यासी पूरे भारत में गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग कर उग्र आंदोलन कर रहे थे। गोलीबारी से कई लोगों की मौत संसद भवन के सामने प्रदर्शनकारियों ने उग्र प्रदर्शन शुरू कर दिया। पुलिस को कानून व्यवस्था की स्थिति और आंदोलन को नियंत्रण में करने के लिए लाठी चार्ज और आंसू गैस का उपयोग करना पड़ा। इसके बाद भी जब आंदोलन शांत नहीं हुआ, तो दिल्ली पुलिस को गोलीबारी का सहारा लेना पड़ा। इसमें सैकड़ो लोग घायल हुए और कई लोगों की मौत हुई। प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद देश में एक बड़ा राजनीतिक और धार्मिक विवाद शुरू हो गया। तत्कालीन सरकार को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा था। राजनीतिक प्रभाव जनसंघ और भाजपा के हर चुनाव घोषणा पत्र में गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाने की मांग शामिल होती थी। हर चुनाव में यह चुनावी मुद्दा बनता था। कई राज्यों में गौ हत्या को लेकर अपने-अपने राज्यों में अलग-अलग कानून भी बनाए हैं। इसके बाद भी गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध का कानून आज तक अस्तित्व में नहीं आया है। केंद्र, उ.प्र सहित कई राज्यों में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकारें कई वर्षों से हैं। पिछले 12 वर्षों से केंद्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार है। उत्तर प्रदेश में भी भाजपा की 2017 से पूर्ण बहुमत की सरकार है। इसके बाद भी गो हत्या पर प्रतिबंध लगाने की अपनी ही पुरानी मांग को भाजपा पूरी नहीं कर रही है। बनारस में कारीडोर बनाने के लिये सैकड़ों मंदिरों को तोड़ा गया। हाल ही में मर्णिका घाट के मंदिर में तोड़-फोड़ हुई है। हाल ही में प्रयागराज में उत्तर प्रदेश सरकार ने अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया। उन्हें मौनी अमावस्या का स्नान नहीं करने दिया। भारत में पहली बार किसी शंकराचार्य का इस तरह से अपमान हुआ है। जिसके कारण यह मामला तूल पकड़ गया है। अविमुक्तेश्वरानंद और गौ रक्षा? शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज, गौ रक्षा को लेकर हमेशा धर्म प्रभावना और आंदोलन का नेतृत्व करते रहे हैं। अविमुक्तेश्वरानंद पिछले कई दशकों से गौ रक्षा आंदोलन से जुड़े हैं। शंकराचार्य बनने के बाद उन्होंने इस आंदोलन को और तीव्र किया है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एवं शंकराचार्य के बीच में दूरियां बढ़ती गईं। जो अब यह आंदोलन धर्म युद्ध के रूप में सामने देखने को मिल रही है। राम मंदिर और अविमुक्तेश्वरानंद? अयोध्या में राम मंदिर का आधे अधूरे निर्माण में, मंदिर की प्राणप्रतिष्ठा का विरोध शंकराचार्य ने किया था। कोई भी शंकराचार्य राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम में शामिल नहीं हुआ। शंकराचार्य का कहना था, जब तक मंदिर के शिखर का काम पूरा ना हो, शिखर पर धर्म ध्वजा ना हो। तब तक प्राण प्रतिष्ठा नहीं हो सकती है। इसको लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े हुए साधु-संतों में शंकराचार्य को निशाने पर लिया। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को कांग्रेस पोषित बताया गया हैं। राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के तुरंत बाद संसद के चुनाव थे। राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का विरोध, गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध और गौ रक्षा मांग के कारण शंकराचार्य भाजपा के निशाने पर आ गए है। आर-पार की लड़ाई राम मंदिर आंदोलन जब शुरू हुआ था, उसके बाद से ही विश्व हिंदू परिषद और भाजपा ने साधु संतों को राम मंदिर आंदोलन में लाने के प्रयास शुरू किए थे। केंद्र एवं राज्यों में भाजपा की सत्ता आने के बाद भारत के साधु संत दो हिस्सों में बंट गए हैं।सरकार समर्थित साधु संतों को सरकार का प्रश्रय मिल रहा है। उनकी कीर्ति सरकारी संरक्षण के कारण दिन-दूनी और रात चौगुनी गति से बढ़ रही है। विश्व हिंदू परिषद की सहायता से महामंडलेश्वर मंडलेश्वर और शंकराचार्य के रूप में बहुत सारी नियुक्तियां की गई हैं। अखाडों को सत्ता की सहायता से पोषित करते हुए उनका राजनीतिक लाभ चुनाव में उठाने का आरोप विपक्षी लगाते है साधु-संत के वेश में बड़े पैमाने पर अपराधिक प्रवत्ति के लोग बड़ी संख्या में देखने को मिल रहे है। इसको लेकर भारत के साधु संत दो भागों में बंट गए हैं। केंद्र एवं राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं। सरकार को लगता है, वह साधु संतों को अपने तरीके से नियंत्रित करेंगे। जिस तरह की सनातनी व्यवस्था है। उसमें शंकराचार्य सर्वोच्च संस्था हैं।धर्म की स्थापना, प्रभावना, सनातन और गौ रक्षा भावात्मक एवं धार्मिक रूप से हिंदू समाज की परंपराओं से जुड़ा है। यह विवाद ऐसे समय पर सामने आया है। जब केंद्र एवं राज्य सरकारों के सामने राजनीतिक चुनौतियां पहले की तुलना में कई गुना ज्यादा हैं। ऐसी स्थिति में लखनऊ में गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग को लेकर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा जो शंखनाद किया जा रहा है। उससे भारत के हिंदूओं और सनातनी समाज को एकजुट करके रख पाना बहुत मुश्किल होगा। इस विवाद के बाद देश की राजनीतिक स्थिति में बड़ी तेजी के साथ बदलाव देखने को मिल सकता है। इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। ईएमएस / 09 मार्च 26