लेख
11-Mar-2026
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बर्फ तले दबे हुए स्वर भी एक दिन सूरज की तरह उगते हैं, मौन की ठंडी नदियों में भी कभी न कभी सपनों के दीप जगमगाते हैं। जब संबंधों की ऊष्मा से मन का जमे अंधकार धीरे-धीरे पिघलता है, तब न्याय की पहली किरण हर धड़कन में साहस की अग्नि जगा देती है। टूटे पंखों के बावजूद भी उड़ने का संकल्प मरना नहीं चाहिए, रात चाहे कितनी ही घनी और लंबी क्यों न हो क्षितिज पर उगती भोर का विश्वास बना रहना चाहिए। बिखरी पंखुड़ियाँ भी अपनी भीनी खुशबू से जीवन का संदेश देती हैं, और जब रंग-बिरंगी तितलियाँ उड़ती हैं तो थके हुए मन के आकाश में सुकून के रंग भर देती हैं। यह दुनिया कुदरत की मुस्कानों से पहले ही भरी हुई है, बस ज़रूरत है उसे पहचानने वाली एक उम्मीद भरी संवेदनशील नज़र की। (सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, संगरिया, हनुमानगढ़, राजस्थान।) ईएमएस / 11 मार्च 26