(14 मार्च नदियों के लिए अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई दिवस) नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि उन महान सभ्यताओं की धड़कन हैं जो हज़ारों सालों से इनके किनारों पर पनपी और फली-फूलीं। लेकिन आज 14 मार्च को जब पूरी दुनिया नदियों के लिए अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई दिवस मना रही है, तो सबसे बड़ा और चुभता हुआ सवाल यह है कि क्या हमने अपनी इन जीवनरेखाओं को सिर्फ़ एक गंदा नाला बनकर रहने के लिए छोड़ दिया है? भारत जैसे देश में, जहाँ नदियों को माँ और देवी का दर्जा देकर उनकी आरती उतारी जाती है, वहाँ की जलधाराओं में घुलता ज़हर हमारी गहरी होती दोहरी मानसिकता का प्रतीक बन चुका है। हम सुबह श्रद्धा के साथ घाटों पर दीप दान करते हैं और शाम होते-होते उसी पवित्र जल में फैक्ट्रियों का ज़हरीला रसायन, प्लास्टिक और शहर का सारा सीवेज बहा देते हैं। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि जो नदियाँ सदियों से हमें जीवन और शुद्धता देती आ रही हैं, आज वे खुद इंसानी लालच के बीच अपने अस्तित्व के लिए तड़प रहीं हैं। हैरानी की बात यह है कि हम मंगल ग्रह पर पानी ढूंढ रहे हैं, लेकिन अपनी धरती पर बहते अमृत को गटर बना रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि हर साल हज़ारों करोड़ रुपये सफाई के नाम पर बहाए जाते हैं, लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात ही रहते हैं। जब तक जन-जन में नदी के प्रति संवेदना नहीं जगेगी, तब तक हर सरकारी योजना केवल फाइलों का पेट भरेगी, नदियों का नहीं। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की लगभग 70 प्रतिशत नदियाँ प्रदूषित हो चुकी हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने देश में 350 से अधिक ऐसे नदी क्षेत्रों की पहचान की है जो अब डेड ज़ोन में बदल चुके हैं, जहाँ ऑक्सीजन का स्तर शून्य है और जलीय जीवन समाप्त हो चुका है। यमुना जैसी पौराणिक नदी दिल्ली के पास पहुँचते ही इसी मौत के जाल में फँस जाती है। इतना ही नहीं, गंगा जैसी जीवनदायिनी नदी के किनारे बसे सैकड़ों शहरों का औद्योगिक कचरा आज भी बिना शोधन के सीधे जलधारा में मिल रहा है, जो जल प्रदूषण के साथ-साथ गंभीर बीमारियों का कारण बन रहा है। पिछले कुछ दशकों में हमने अपनी सैकड़ों छोटी नदियों और सहायक धाराओं को पूरी तरह खो दिया है। जो नदियाँ बारहमासी हुआ करती थीं, वे अब केवल मानसून के कुछ दिनों में ही जीवित नजर आती हैं। उत्तर प्रदेश की हिंडन, मध्य प्रदेश की खान नदी या दक्षिण भारत की कई छोटी धाराएं आज सीवेज ढोने वाले नालों में तब्दील हो चुकी हैं। विकास की अंधी और अनियंत्रित दौड़ में हमने नदियों के प्राकृतिक स्वरूप के साथ जो खिलवाड़ किया है, उसका खामियाजा अब जलवायु परिवर्तन, भीषण बाढ़ और पाताल की ओर गिरते भू-जल स्तर के रूप में हमारे सामने खड़ा है। नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों पर बढ़ते अतिक्रमण और कंक्रीट के जंगलों ने उनके पुनर्भरण की क्षमता को ही नष्ट कर दिया है। बाँधों के अनियंत्रित जाल ने नदियों की अविरलता छीन ली है, तो बढ़ते औद्योगिक प्रदूषण ने उनकी निर्मलता को खत्म कर दिया है। अक्सर हम यह मान लेते हैं कि पर्यावरण संरक्षण केवल वैज्ञानिकों या सरकारों का काम है, लेकिन सच यह है कि नदियों की बर्बादी में हमारी खामोश सहमति भी शामिल है। अवैध रेत उत्खनन ने नदियों के सीने को छलनी कर दिया है। विश्व स्तर पर आज नदियों के अधिकारों की वकालत की जा रही है। कई प्रगतिशील देशों ने तो अपनी नदियों को जीवित इकाई का कानूनी दर्जा भी दिया है। भारत में भी इस दिशा में कड़े कानूनी प्रावधानों के साथ-साथ एक व्यापक जन-आंदोलन की तत्काल ज़रूरत है। हमें अपनी दैनिक जीवनशैली में बदलाव लाना होगा जैसे केमिकल युक्त साबुनों और प्लास्टिक के बढ़ते मोह को त्यागना होगा। नदियों के किनारे वृक्षारोपण और मिट्टी के कटाव को रोकने के प्रयास केवल कागजों पर नहीं, बल्कि धरातल पर दिखने चाहिए। 14 मार्च का यह अंतर्राष्ट्रीय दिन हमें एक कड़वी चेतावनी दे रहा है। वैज्ञानिक अनुमानों के अनुसार, यदि नदियों के दोहन की यही रफ्तार रही, तो साल 2030 तक देश की 40 प्रतिशत आबादी के पास पीने के पानी की भारी कमी होगी। नदियाँ हमारी विरासत हैं, बोझ नहीं। नदियाँ प्रकृति का वह उपहार हैं जिसे दोबारा बनाया नहीं जा सकता, सिर्फ़ सहेजा जा सकता है। सभ्यताएं नदियों के किनारे जनमती ज़रूर हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि नदियों के सूखने या उनके मरने के साथ ही महान सभ्यताओं का अंत भी निश्चित है। आज का दिन संकल्प का दिन है यानी नदी को बचाने का संकल्प और खुद को बचाने का संकल्प। (लेखक पत्रकार हैं) ईएमएस / 13 मार्च 26