नई दिल्ली (ईएमएस)। तेलंगाना की कृष्णा नदी के बीच एक ऐसा स्थल मौजूद है जिसे ‘भारत का अटलांटिस’ कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। हैदराबाद से लगभग 160 किलोमीटर दूर स्थित नागार्जुनकोंडा इतिहास, रोमांच और अध्यात्म का जीवंत संगम है, जहां की यात्रा मानो तीसरी शताब्दी के भारत में प्रवेश करने जैसा अनुभव कराती है। नागार्जुन सागर बांध की भव्यता देखने आने वाले अधिकांश पर्यटक उसके सुनहरे विस्तार में खो जाते हैं, लेकिन बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ हैं कि शांत जलाशय के अथाह जल के नीचे कभी एक विशाल और समृद्ध सभ्यता सांस लेती थी। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, तीसरी और चौथी शताब्दी ईस्वी में यह क्षेत्र ‘विजयपुरी’ नाम से जाना जाता था और यह इक्ष्वाकु वंश की गौरवशाली राजधानी थी। विजयपुरी केवल प्रशासनिक केंद्र नहीं था बल्कि बौद्ध धर्म, दर्शन और शिक्षा का एक वैश्विक केंद्र भी था। यहां के विशाल स्तूप, मठ और उन्नत शिक्षण संस्थानों की ख्याति इतनी दूर तक फैली थी कि श्रीलंका, चीन और एशिया के अन्य देशों से विद्वान यहां ज्ञानार्जन के लिए आते थे। महान बौद्ध दार्शनिक आचार्य नागार्जुन ने लंबे समय तक यहीं निवास किया और उनके कारण इस स्थान का नाम कालांतर में नागार्जुनकोंडा पड़ गया। सुव्यवस्थित नगर योजना, उत्कृष्ट जल-प्रबंधन और एम्फीथिएटर जैसी उन्नत संरचनाएं उस दौर के उल्लेखनीय शिल्प कौशल का उदाहरण थीं। प्रगति की राह में यह गौरवशाली विरासत 1960 के दशक में तब चुनौती के रूप में सामने आई जब नागार्जुन सागर बांध जिसे आधुनिक भारत के ‘मंदिरों’ में गिना जाता है का निर्माण आरंभ हुआ। बांध बनने पर यह पूरी ऐतिहासिक घाटी जलमग्न होना तय था। इस विनाश से बचाने के लिए पुरातत्वविदों ने विशाल स्तर पर खुदाई अभियान चलाया, जिसमें नक्काशीदार चूना पत्थर के पैनल, प्राचीन शिलालेख, मूर्तियां और उन्नत जल निकासी प्रणाली के अवशेष मिले। जलस्तर बढ़ने से पूर्व इन सभी पुरावशेषों को सुरक्षित निकालकर पास की एक ऊंची पहाड़ी पर स्थानांतरित किया गया। यह भारत का पहला और अब तक का सबसे बड़ा पुरातात्विक बचाव अभियान था, जिसने एक संपूर्ण सभ्यता को हमेशा के लिए डूबने से बचा लिया। आज वही पहाड़ी एक द्वीप संग्रहालय के रूप में जलाशय के मध्य खड़ी है, जहां पहुंचने का एकमात्र मार्ग 45 मिनट की नौका यात्रा है। समुद्र-सा शांत जल पार करते हुए यह एहसास गहरा होता जाता है कि ठीक नीचे सदियों पुरानी सभ्यता आज भी मौन पड़ी है। इस संग्रहालय में बुद्ध के जीवन को दर्शाते पैनल, इक्ष्वाकु काल के सिक्के, ब्राह्मी शिलालेख और प्राचीन मूर्तिकला उस युग की सांस्कृतिक भव्यता की कहानी सुनाते हैं। सुदामा/ईएमएस 11 मार्च 2026