नई दिल्ली (ईएमएस)। इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स टीनेज लड़कियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं। सोशल मीडिया अब किशोरियों के आत्मसम्मान, मानसिक स्थिरता और सामाजिक सुरक्षा पर नकारात्मक असर डाल रहे हैं। कई बार जिन्हें हम मजाक या सामान्य टिप्पणी समझकर अनदेखा कर देते हैं, वही बातें एक नाजुक उम्र से गुजर रही लड़की के मन पर गहरा घाव छोड़ जाती हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि सोशल मीडिया मात्र 10 मिनट के इस्तेमाल में ही टीनेज लड़कियों के भीतर अपने शरीर और चेहरे को लेकर नफरत की भावना पैदा कर सकता है। लगातार स्क्रॉलिंग के दौरान वे खुद की तुलना इंटरनेट पर मौजूद परफेक्ट और फिल्टर वाली तस्वीरों से करती हैं, जिससे उनमें हीनभावना और बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर विकसित होने लगता है। कई लड़कियों ने स्वीकार किया है कि सोशल मीडिया उन्हें इंसान की बजाय एक वस्तु की तरह प्रस्तुत करता है, जहां उनकी सूरत, कपड़े और शरीर को रेटिंग और टिप्पणी का आधार बनाया जाता है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा, उत्पीड़न और दुष्कर्म जैसी घटनाओं पर भी मजाक और भद्दी टिप्पणियां की जा रही हैं, जिन्हें हजारों लाइक्स मिलते हैं। यह प्रवृत्ति समाज की सोच में गिरावट और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फैलती जहरीली मानसिकता की ओर इशारा करती है। मनोवैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि सोशल मीडिया एल्गोरिदम किशोर लड़कों को ऐसा कंटेंट दिखाते हैं जो नकली मर्दानगी और महिला विरोधी विचारों को बढ़ावा देता है। दूसरी ओर, लड़कियों में चिंता, अवसाद और आत्महत्या की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है, जिससे यह समस्या और गंभीर हो गई है। एक रिपोर्ट के अनुसार, करीब 38 प्रतिशत महिलाएं ऑनलाइन हिंसा का सामना कर चुकी हैं। यही वजह है कि ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है, ताकि उन्हें इस मानसिक ज़हर से बचाया जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल प्रतिबंध समाधान नहीं है। जरूरत है घरों और स्कूलों में बच्चों, खासकर लड़कों को डिजिटल एथिक्स और ऑनलाइन सम्मान की शिक्षा देने की। सुदामा/ईएमएस 11 मार्च 2026