अंतर्राष्ट्रीय
12-Mar-2026


तेलअवीव (ईएमएस)। करीब एक दशक की रिसर्च और अरबों डॉलर के निवेश के बाद तैयार किए गए इजरायल के लेजर एयर डिफेंस सिस्टम ‘आयरन बीम’ से बड़ी उम्मीदें थीं। ‘आयरन बीम’ को हाल ही में इजरायली सेना में तैनात किया गया था, लेकिन युद्ध के मैदान से आ रही रिपोर्टों के अनुसार यह प्रणाली ड्रोन हमलों को रोकने में उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर रही है। इजरायल ने दिसंबर में इस लेजर आधारित रक्षा प्रणाली को ऑपरेशनल घोषित किया और ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच लेबनान सीमा पर तैनात किया। इसका उद्देश्य उत्तर से आने वाले ड्रोन और मानव रहित विमानों (यूएवी) को रोकना था, जिन्हें अक्सर हिज्बुल्लाह की ओर से दागा जाता है। हालांकि कई मामलों में इन ड्रोन को पारंपरिक हथियारों, हेलीकॉप्टरों और असॉल्ट राइफलों की मदद से गिराना पड़ा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिस्टम अभी शुरुआती चरण में है और इसकी क्षमताएं सीमित हैं। इजरायली सेना (आईडीएफ) ने इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया देने से इंकार किया है, जिससे इसके प्रदर्शन को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। दरअसल, 2024 में एक ऑपरेशन के दौरान इस तकनीक ने परीक्षण में अच्छा प्रदर्शन किया था और 2025 में इसका ट्रायल चरण भी पूरा हो गया था। इसके बाद औपचारिक रूप से सेना में शामिल किया। बावजूद इसके, वास्तविक युद्ध परिस्थितियों में इसके सामने कई तकनीकी चुनौतियां सामने आई हैं। यह सिस्टम 100 किलोवाट की लेजर बीम पर आधारित है, जो लक्ष्य पर कुछ सेकंड तक अत्यधिक ऊर्जा केंद्रित करके गर्म करती है। इससे ड्रोन का इंजन या इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम फेल हो सकता है। हालांकि यह तकनीक छोटे और कमजोर ड्रोन के खिलाफ प्रभावी मानी जा रही है, लेकिन तेज गति वाली मिसाइलों या बड़े रॉकेट्स के खिलाफ इसकी क्षमता सीमित है। इजरायल की योजना थी कि डोम मिसाइल डिफेंस सिस्टम के साथ आयरन बीम को एकीकृत किया जाए, ताकि कम ऊंचाई वाले खतरों को सस्ते और तेज तरीके से निष्क्रिय किया जा सके। इसके लिए इजरायल के रक्षा मंत्रालय, राफेल एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम्स और एल्बिट सिस्टम्स के बीच करीब 2 अरब इजरायली शेकेल की डील भी हुई थी। लेकिन फिलहाल यह योजना पूरी तरह सफल नहीं हुई है। रक्षा विशेषज्ञ रान कोचाव, जो पहले इजरायल की एयर और मिसाइल डिफेंस फोर्सेज के कमांडर रह चुके हैं, का कहना है कि लेजर सिस्टम मौसम की परिस्थितियों के प्रति बेहद संवेदनशील होता है। कोहरा, धूल भरी आंधी और बादल इसकी प्रभावशीलता को काफी कम कर देते हैं। इसके अलावा लक्ष्य को गिराने के लिए ड्रोन का बहुत सटीक दूरी और कोण में होना जरूरी होता है, जो वास्तविक युद्ध में हमेशा संभव नहीं होता। आशीष दुबे /12 मार्च 2026