लेख
14-Mar-2026
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अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध अब केवल दो देशों का सैन्य टकराव नहीं रह गया है बल्कि यह धीरे धीरे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला संकट बनता जा रहा है। पश्चिम एशिया में चल रहा यह संघर्ष वैश्विक ऊर्जा बाजार व्यापारिक गतिविधियों और वित्तीय बाजारों पर गहरा असर डाल रहा है। युद्ध के दसवें दिन ही दुनिया ने इसका आर्थिक प्रभाव साफ तौर पर महसूस करना शुरू कर दिया है। कच्चे तेल की कीमतों में अचानक आई तेज वृद्धि और शेयर बाजारों में आई गिरावट ने यह संकेत दे दिया है कि यदि यह संघर्ष लंबा चला तो इसका असर केवल युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि हर देश की अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों के जीवन पर पड़ेगा। तेल की कीमतों में तेजी इस संकट का सबसे बड़ा संकेत बनकर सामने आई है। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर लगभग 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं जो जुलाई 2022 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। कुछ ही दिनों में तेल की कीमतों में लगभग 26 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। तेल की कीमतों में इतनी तेज वृद्धि का सीधा कारण पश्चिम एशिया में पैदा हुई अनिश्चितता और आपूर्ति बाधित होने की आशंका है। खाड़ी क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक और निर्यातक क्षेत्रों में से एक है इसलिए वहां होने वाला कोई भी सैन्य संघर्ष वैश्विक ऊर्जा बाजार को तुरंत प्रभावित करता है। निवेशकों और व्यापारियों को डर है कि यदि युद्ध और फैलता है तो तेल की आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है जिससे कीमतों में और तेजी आ सकती है। तेल की कीमतों में इस उछाल का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। भारत दुनिया के उन प्रमुख देशों में शामिल है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करते हैं। इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में हर बढ़ोतरी सीधे देश की आर्थिक व्यवस्था को प्रभावित करती है। इसी आशंका के कारण भारतीय शेयर बाजार में भी भारी गिरावट देखने को मिली। दो दिन के अवकाश के बाद जब बाजार खुला तो निवेशकों में डर और अनिश्चितता का माहौल था। परिणामस्वरूप बाजार खुलते ही भारी बिकवाली शुरू हो गई और सेंसेक्स लगभग 1800 अंक नीचे खुला। थोड़ी ही देर में गिरावट बढ़कर 2492 अंकों तक पहुंच गई जिसने निवेशकों को और चिंतित कर दिया। दिन के अंत में बाजार में थोड़ी स्थिरता जरूर दिखाई दी लेकिन नुकसान काफी बड़ा रहा। सेंसेक्स अंततः 1352.74 अंकों की गिरावट के साथ 77566.16 पर बंद हुआ जबकि निफ्टी भी 422 अंकों से अधिक गिरकर 24028 के आसपास बंद हुआ। लगातार गिरावट के कारण दोनों प्रमुख सूचकांक लगभग ग्यारह महीनों के निचले स्तर पर पहुंच गए हैं। बाजार में आई इस गिरावट का सबसे अधिक असर उन क्षेत्रों पर पड़ा जो सीधे तेल और परिवहन लागत से जुड़े हैं। तेल कंपनियां ऑटोमोबाइल उद्योग धातु उद्योग एविएशन और लॉजिस्टिक कंपनियों के शेयरों में सबसे ज्यादा गिरावट देखी गई। बाजार में इस गिरावट से निवेशकों की लगभग आठ लाख करोड़ रुपये की पूंजी कम हो गई जो इस संकट की गंभीरता को दर्शाती है। सरकार का कहना है कि फिलहाल महंगाई पर इसका बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है क्योंकि देश में मुद्रास्फीति अपेक्षाकृत नियंत्रित स्तर पर है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के अनुसार युद्ध शुरू होने से पहले भारतीय तेल बास्केट की कीमतें गिरावट की ओर थीं और दो मार्च तक यह लगभग 69 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से बढ़कर 80 डॉलर के आसपास पहुंची थीं। उनका कहना है कि सरकार स्थिति पर लगातार नजर रख रही है और यदि जरूरत पड़ी तो आवश्यक कदम उठाए जाएंगे ताकि आम लोगों पर इसका असर कम से कम पड़े। हालांकि आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतों में यह तेजी लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका असर परिवहन लागत उत्पादन खर्च और अंततः उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर जरूर पड़ेगा। इसका मतलब यह है कि महंगाई बढ़ने का खतरा पूरी तरह टला नहीं है। ऊर्जा बाजार के अलावा इस युद्ध ने वैश्विक व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला को भी गंभीर रूप से प्रभावित किया है। समुद्री मार्गों में बढ़ते जोखिम के कारण कई जहाजों को अपने रास्ते बदलने पड़ रहे हैं और कुछ जहाजों को यात्रा बीच में ही रोकनी पड़ रही है। इसके कारण दुनिया भर के कई कंटेनर बंदरगाहों और समुद्री मार्गों में फंस गए हैं। भारत का लगभग 12000 करोड़ रुपये मूल्य का निर्यात माल भी इसी संकट में फंसा हुआ है। यह स्थिति भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ी चिंता का कारण बन गई है क्योंकि माल की डिलीवरी में देरी होने से व्यापारिक अनुबंध प्रभावित हो सकते हैं और कंपनियों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। लॉजिस्टिक्स कंपनियों के अनुसार युद्ध के कारण शिपिंग कंपनियों ने कई नए आकस्मिक शुल्क लागू कर दिए हैं। सामान्य परिस्थितियों में जहां एक कंटेनर की ढुलाई लागत लगभग 800 से 1500 डॉलर के बीच होती थी वहीं अब यह लागत कई गुना बढ़ गई है। कई मामलों में प्रति कंटेनर लगभग 4000 डॉलर तक अतिरिक्त शुल्क देना पड़ रहा है। इन अतिरिक्त शुल्कों में युद्ध जोखिम अधिभार आपातकालीन लागत वसूली शुल्क और पीक सीजन शुल्क जैसे कई नए चार्ज शामिल हैं। इससे निर्यातकों की लागत अचानक बढ़ गई है और उनके मुनाफे पर गंभीर असर पड़ रहा है। इस संकट का सबसे अधिक असर उन वस्तुओं पर पड़ रहा है जो जल्दी खराब हो जाती हैं। बंदरगाहों पर बड़ी मात्रा में तरल माल निकासी की प्रतीक्षा कर रहा है जबकि लगभग 939 टन जल्दी खराब होने वाला माल भी फंसा हुआ है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो इन वस्तुओं को भारी नुकसान हो सकता है। इसके अलावा समुद्र में फंसे कंटेनरों में लगभग चार लाख टन बासमती चावल भी शामिल है जो भारत के प्रमुख निर्यात उत्पादों में से एक है। बासमती चावल का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों में निर्यात किया जाता है और यदि युद्ध के कारण वहां व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं तो भारतीय किसानों और निर्यातकों दोनों को नुकसान हो सकता है। इसी तरह भारत का काबुली चना भी खाड़ी क्षेत्र के देशों में बड़ी मात्रा में निर्यात होता है। पिछले दो वर्षों में इसका निर्यात लगभग दोगुना हो गया था और इसमें ईरान अरब देशों और तुर्किए की बड़ी हिस्सेदारी रही है। लेकिन वर्तमान युद्ध के कारण इन देशों के साथ व्यापारिक गतिविधियां बाधित हो रही हैं जिससे इस निर्यात पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो भारतीय कृषि निर्यात को भी बड़ा झटका लग सकता है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेल की कीमतों में आई वृद्धि को इस संघर्ष की परिस्थितियों मंं उचित बताया है। उनका कहना है कि यदि ईरान के परमाणु कार्यक्रम से उत्पन्न खतरे को समाप्त करना है तो कुछ समय के लिए तेल की कीमतों में वृद्धि को स्वीकार करना पड़ेगा। उनका दावा है कि जब यह खतरा समाप्त हो जाएगा तब तेल की कीमतें तेजी से नीचे आ जाएंगी और बाजार फिर से स्थिर हो जाएगा। हालांकि फिलहाल वैश्विक बाजार में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है और निवेशक आने वाले दिनों को लेकर सतर्क हैं। स्पष्ट है कि युद्ध का प्रभाव केवल सीमा रेखाओं तक सीमित नहीं रहता बल्कि वह आर्थिक व्यवस्था के हर स्तर को प्रभावित करता है। तेल की कीमतों में तेजी शेयर बाजारों में गिरावट और वैश्विक व्यापार में बाधा इस बात का संकेत है कि यदि यह संघर्ष जल्द समाप्त नहीं हुआ तो दुनिया की अर्थव्यवस्था के सामने एक बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। ऐसे समय में सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे आर्थिक स्थिरता बनाए रखें और आम नागरिकों को महंगाई तथा आर्थिक अस्थिरता से बचाने के लिए प्रभावी कदम उठाएं। यदि कूटनीतिक प्रयासों के जरिए जल्द समाधान नहीं निकला तो यह युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए लंबे समय तक चिंता का कारण बना रह सकता है। (L 103 जलवन्त टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार स्तम्भकार) ईएमएस / 14 मार्च 26