दुनिया में जब भी मध्य-पूर्व में तनाव या युद्ध की स्थिति बनती है, तब सबसे पहले तेल-गैस की कीमतों पर असर पड़ता है। भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करते हैं, ऐसे समय में सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर इतने वर्षों बाद भी भारत तेल-गैस के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर क्यों नहीं बन पाया? सबसे बड़ा कारण यह है कि भारत के पास सीमित प्राकृतिक तेल-गैस भंडार हैं। देश में कुछ क्षेत्रों—जैसे समुद्री तटों और पूर्वोत्तर राज्यों—में तेल-गैस मिलती है, लेकिन यह हमारी बढ़ती जरूरतों के मुकाबले बहुत कम है। आज भी भारत अपनी लगभग 80-85 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरत विदेशों से आयात करता है। दूसरा कारण यह है कि ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है। औद्योगिक विकास, बढ़ती आबादी और वाहनों की संख्या में तेजी से वृद्धि के कारण तेल-गैस की खपत लगातार बढ़ती जा रही है। घरेलू उत्पादन इस गति से नहीं बढ़ पाया।तीसरा कारण नीतिगत और तकनीकी चुनौतियाँ भी रही हैं। कई बार तेल-गैस की खोज और उत्पादन के लिए पर्याप्त निवेश, आधुनिक तकनीक और निजी क्षेत्र की भागीदारी समय पर नहीं बढ़ पाई। इसके कारण संभावित भंडारों का पूरा उपयोग नहीं हो सका। हालांकि, हाल के वर्षों में सरकार ने आत्मनिर्भर ऊर्जा की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। सौर और पवन ऊर्जा को बढ़ावा देना, जैव-ईंधन (एथेनॉल) का उपयोग बढ़ाना, इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहन देना और नए तेल-गैस क्षेत्रों की खोज करना इसी दिशा के प्रयास हैं।स्पष्ट है कि तेल-गैस में पूर्ण आत्मनिर्भरता हासिल करना आसान नहीं है, लेकिन ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों और घरेलू उत्पादन को बढ़ाकर भारत अपनी निर्भरता जरूर कम कर सकता है। यही भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा का रास्ता भी है। ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों और घरेलू उत्पादन कैसे बढ़ाएँ देश में बार-बार उभरने वाला तेल-गैस संकट यह संकेत देता है कि केवल आयातित ऊर्जा पर निर्भर रहना लंबे समय तक सुरक्षित रणनीति नहीं हो सकती। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढऩे या भू-राजनीतिक तनाव होने पर देश की अर्थव्यवस्था तुरंत प्रभावित हो जाती है। ऐसे में ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देना और घरेलू उत्पादन को मजबूत करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है।सबसे पहले, सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों का तेजी से विस्तार करना होगा। भारत भौगोलिक रूप से सौर ऊर्जा के लिए बेहद अनुकूल देश है। अगर गांव-गांव में रूफटॉप सोलर प्लांट और बड़े सौर पार्क स्थापित किए जाएँ तो बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा स्वदेशी और स्वच्छ स्रोतों से प्राप्त किया जा सकता है। इसी तरह तटीय क्षेत्रों और खुले मैदानों में पवन ऊर्जा की अपार संभावनाएँ हैं।दूसरा महत्वपूर्ण कदम घरेलू तेल और गैस उत्पादन को बढ़ाने का है। इसके लिए नई खोज, आधुनिक तकनीक और निजी निवेश को प्रोत्साहित करना होगा। समुद्री क्षेत्रों और कठिन भौगोलिक इलाकों में ऊर्जा संसाधनों की खोज के लिए सरकार को स्पष्ट नीतियाँ और आसान नियम बनाने होंगे, ताकि घरेलू उत्पादन में तेजी आ सके।इसके साथ-साथ जैव ईंधन, ग्रीन हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक वाहनों को भी ऊर्जा नीति का अहम हिस्सा बनाना होगा। एथेनॉल मिश्रण, बायोगैस प्लांट और कृषि अपशिष्ट से ऊर्जा उत्पादन जैसे प्रयास न केवल ऊर्जा संकट को कम करेंगे बल्कि किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायक हो सकते हैं।अंतत: ऊर्जा आत्मनिर्भरता केवल सरकारी नीतियों से ही नहीं, बल्कि जनभागीदारी से भी संभव है। ऊर्जा की बचत, सौर ऊर्जा अपनाने और स्वच्छ तकनीक के उपयोग में आम नागरिक की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि सरकार, उद्योग और समाज मिलकर प्रयास करें तो भारत न केवल ऊर्जा संकट से उबर सकता है, बल्कि आने वाले वर्षों में ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूत कदम भी बढ़ा सकता है। घरेलू उत्पादन कैसे बढ़ाएँ वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, तेल-गैस संकट और आपूर्ति शृंखला में बार-बार आने वाली बाधाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी देश की आर्थिक मजबूती का आधार उसका मजबूत घरेलू उत्पादन होता है। यदि भारत को दीर्घकालीन आर्थिक स्थिरता और आत्मनिर्भरता हासिल करनी है, तो घरेलू उत्पादन बढ़ाने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। सबसे पहले लघु, कुटीर और मध्यम उद्योगों को मजबूत करना आवश्यक है। यही क्षेत्र सबसे अधिक रोजगार पैदा करता है और स्थानीय स्तर पर उत्पादन बढ़ाता है। सरकार को इन उद्योगों को सस्ती पूंजी, तकनीकी सहायता और आसान नियम उपलब्ध कराने चाहिए।दूसरा महत्वपूर्ण कदम कृषि और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देना है। यदि कृषि उत्पादों का प्रसंस्करण देश में ही बड़े पैमाने पर होगा, तो किसानों की आय भी बढ़ेगी और आयात पर निर्भरता भी कम होगी।तीसरा, तकनीक और नवाचार को उत्पादन से जोडऩा जरूरी है। आधुनिक मशीनों, डिजिटल तकनीक और अनुसंधान के माध्यम से उत्पादन की गुणवत्ता और मात्रा दोनों बढ़ाई जा सकती हैं।इसके अलावा सरकार को स्थानीय उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए। च्च्लोकल फॉर वोकलज्ज् जैसी पहल तभी सफल होगी जब उपभोक्ता भी स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता दें।घरेलू उत्पादन बढ़ाना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि उद्योग, किसान और उपभोक्ता—सभी की साझा भागीदारी से ही यह संभव है। यदि सही नीतियों और जनसहयोग के साथ प्रयास किए जाएँ, तो भारत न केवल अपनी जरूरतें पूरी कर सकेगा बल्कि वैश्विक बाजार में भी मजबूत स्थान बना पाएगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार है, समाचार पत्र व पत्रिकाओं में समसमायिक विषयों पर चिंतक, राजनीतिक विचारक है।) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 15 मार्च /2026