लेख
14-Mar-2026
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यूं तो देश की अदालतें हर साल तकरीबन सौ से अधिक मुलजिमों को फांसी की सजा सुनाती हैं तब न्याय की कुर्सी पर बैठे किसी जज को कोई ग्लानि या अफसोस नहीं होता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक ऐसा फैसला दिया जिसे लिखते हुए उनकी आंखें सजल हो गईं क्यों कि यह फैसला एक जीवन से जंग लड़ रहे इंसान को कष्ट मुक्ति के लिए मौत की ओर सहयोग करने का है। आपको बता दें कि शीर्ष अदालत ने एक अभूतपूर्व फैसले में इच्छामृत्यु को मंजूरी दी है। अदालत ने 32 साल के हरीश राणा के लिए इच्छामृत्यु की इजाजत दी। सुप्रीम कोर्ट में जब जस्टिस जे. बी. पारदीवाला यह फैसला सुना रहे थे तो इस दौरान वे बेहद भावुक हो गए और उनकी आंखें नम हो गई थी। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने हरीश राणा के माता-पिता को उनकी जीवनरक्षक चिकित्सा हटाने की इजाजत दे दी है। हरीश राणा पिछले 13 साल से लगातार वेजिटेटिव स्टेट यानी कोमा में हैं। अपना फैसला पढ़ते समय जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि हरीश राणा कभी एक होनहार छात्र थे और अपनी पढ़ाई कर रहे थे, लेकिन एक दुर्घटना ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। पीठ ने अपने फैसले में कहा कि ऐसे मामलों में मुख्य सवाल यह नहीं होता कि मरीज के लिए मौत बेहतर है या नहीं, बल्कि यह देखा जाना चाहिए कि जीवन को बनाए रखने वाला इलाज मरीज के हित में है या नहीं। अदालत ने कहा कि हरीश राणा में सिर्फ सोने जागने के चक्र में फंसे हुए हैं, लेकिन वह किसी भी तरह की अर्थपूर्ण प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहे हैं। वह अपने दैनिक कामों के लिए पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हैं। अदालत ने यह भी बताया कि हरीश को पीईजी ट्यूब के जरिए क्लिनिकली एडमिनिस्टरड न्यूट्रिशन दिया जा रहा है और इतने सालों में उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है। जब एक इंसान का जीवन इतना कष्ट मय और लाइलाज हो जाए कि मौजूदा तमाम मेडिकल उपचार अनुपयोगी हो जाए और क्षण क्षण तड़प रही जिंदगी को कष्ट से बचाने का कोई उपाय न रहे तब जीवन से मुक्ति के लिए मौत ही एक मात्र विकल्प रह जाता है मौजूदा घटनाक्रम के अनुसार 20 अगस्त 2013 को हरीश राणा अपने छात्रावास की चौथी मंजिल से गिर गए थे। उनके सिर में गहरी चोट लगी और लंबे इलाज के बावजूद वे कोमा से निकल नहीं पाए हैं। उनकी स्थिति को देखते हुए उनके अभिभावकों ने ही इच्छामृत्यु की प्रार्थना की थी। जिस पर दिसंबर 2025 की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा की निष्क्रिय इच्छामृत्यु की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया था। तब भी अदालत ने कहा था कि हरीश पिछले 13 वर्षों से गंभीर स्थिति में हैं, और उन्हें इस हालत में जीने नहीं दिया जा सकता। हरीश राणा को ट्यूब के जरिए पोषण पहुंचाकर जिंदा तो रखा गया, लेकिन वे किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहे थे और लगातार बिस्तर पर होने के कारण उनकी शारीरिक अवस्था भी सही नहीं थी। उनकी चिकित्सा रिपोर्टर्स में इन सारी तकलीफों का विस्तार से वर्णन किया गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने नई दिल्ली में एम्स के चिकित्सकों के द्वितीय चिकित्सा बोर्ड द्वारा दाखिल की गई राणा की चिकित्सा संबंधी रिपोर्ट का अवलोकन किया था और कहा था कि यह रिपोर्ट दुखद है। प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड ने मरीज की स्थिति की जांच करने के बाद कहा था कि उसके ठीक होने की संभावना नगण्य है। उच्चतम न्यायालय ने पिछले साल 11 दिसंबर को मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार यह व्यक्ति बेहद दयनीय स्थिति में है। पीठ ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) को राणा को उपशामक देखभाल इकाई में भर्ती करने का निर्देश दिया है ताकि चिकित्सकीय उपचार बंद किया जा सके। पीठ ने यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि उपचार को एक सुनियोजित तरीके से बंद किया जाए ताकि गरिमा बनी रहे। आमतौर पर यही कहा जाता है कि जब आप किसी व्यक्ति को जीवन दे नहीं सकते, तो जीवन लेने का हक भी आपको नहीं है। कई देशों में इसी आधार पर मृत्युदंड पर भी बहस छिड़ी रहती है, क्योंकि एक बार सांसों की डोर टूट गई, तो फिर उसे जोड़ने का कोई उपाय नहीं है। लेकिन अगर व्यक्ति जिंदा होकर भी किसी मृतप्राय व्यक्ति की तरह हो जाए, जिसके लिए कोई इलाज कारगर न साबित हो, जो असहनीय तकलीफों से गुजरे तो क्या उसे इच्छामृत्यु की इजाजत दी जा सकती है। तब क्या इसे हत्या या आत्महत्या या मृत्युदंड से अलग न्यायोचित ठहराया जा सकता है। ऐसे कई सवाल इच्छामृत्यु के फैसले पर उठते रहे हैं। बुधवार को आए इस फैसले के बाद सम्मानजनक मृत्यु के अधिकार यानी राइट टू डाई विद डिग्निटी जैसे अहम सवाल पर नयी चर्चा शुरु हो सकती है। दरअसल भारत में ऐसा ही एक मामला 1973 में आया था, जब मुंबई के केईएम अस्पताल के वार्डबॉय सोहनलाल वाल्मीकि ने नर्स अरुणा शानबाग के साथ बेरहमी से यौन उत्पीड़न किया और गला दबाया था, जिससे वे स्थायी रूप से कोमा में चली गई थी। उनके माता-पिता नहीं थे और इस घटना के बाद परिजनों ने भी उनका त्याग कर दिया था। मगर अस्पताल की साथी नर्सों ने उन्हें कोमा में होने के बावजूद जीवित रखने की पूरी कोशिश की। 2009 में पत्रकार पिंकी विरानी ने उनकी दर्दनाक हालत को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय में इच्छा मृत्यु की याचिका दायर की थी, अदालत ने 7 मार्च 2011 को याचिका खारिज कर दी थी, क्योंकि उनका इलाज करने वाली नसें और डॉक्टर उन्हें जीवित रखने के लिए प्रतिबद्ध थे। हालांकि, कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया लाइफ सपोर्ट हटाना को अनुमति दी, जिसमें कहा गया कि जब तक मरीज की हालत सुधरने की उम्मीद न हो, तब तक यह लिया जा सकता है। इसके बाद 18 मई 2015 को निमोनिया के कारण अरुणा शानबाग का निधन हो गया। हालांकि 42 वर्ष तक कोमा में रहने का कष्ट उन्होंने सहा है। इस मामले ने भारत में गरिमापूर्ण मृत्यु से संबद्ध कानून की एक नई पहल हुई है अरुणा शानबाग मामले के बाद इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून की जरूरत महसूस की जाने लगी। इसी मुद्दे को लेकर कॉमन कॉज़ नाम के एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 9 मार्च 2018 को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018) सुप्रीम कोर्ट का एक ऐतिहासिक फैसला था, जिसने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी। इसके अलावा अदालत ने लिविंग विल का अधिकार दिया। इसका मतलब है कि कोई व्यक्ति पहले से लिखकर यह तय कर सकता है कि अगर वह भविष्य में ऐसी स्थिति में पहुंच जाए जहां वह खुद निर्णय लेने की स्थिति में न हो, तो उसे कृत्रिम लाइफ सपोर्ट पर न रखा जाए। हालांकि, कॉमन कॉज़ मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु कब लागू की जा सकती है, इस पर दिशा-निर्देशों को पूरी तरह से निर्धारित और स्पष्ट नहीं किया जा सका। मगर अब हरीश राणा के मामले में इस फैसले को आधार माना गया है।उस परिवार और माता-पिता की पीड़ा को समझना कितना दुखद है जो एक दुखद अनहोनी के बाद अपनी ही युवा संतान के लिए मौत की भीख मांगने के लिए मजबूर हुए हैं ईश्वर ऐसी वारदातों की पुनरावृत्ति न हो। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) ईएमएस / 14 मार्च 26