वैश्विक व्यापार की राजनीति अक्सर केवल आर्थिक हितों तक सीमित नहीं रहती बल्कि इसके पीछे भू-राजनीतिक रणनीतियां और शक्ति संतुलन की जटिल चालें भी छिपी होती हैं। हाल ही में अमेरिका द्वारा भारत और चीन सहित 16 प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों के खिलाफ तथाकथित अनुचित व्यापार व्यवहार की जांच शुरू करना इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उनके प्रशासन द्वारा अपनाई जा रही यह नीति केवल व्यापारिक नियमों का मामला नहीं है बल्कि वैश्विक आर्थिक प्रतिस्पर्धा में बढ़ते देशों को नियंत्रित करने का प्रयास भी मानी जा रही है। पिछले महीने अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रम्प द्वारा लगाए गए टैरिफ को अवैध घोषित कर दिया था। यह फैसला प्रशासन की व्यापारिक रणनीति के लिए बड़ा झटका माना गया। इसके बाद ट्रम्प प्रशासन ने नया कानूनी रास्ता खोजते हुए ट्रेड एक्ट 1974 के सेक्शन 301 के तहत जांच की प्रक्रिया शुरू की। इस प्रावधान के तहत अमेरिका को यह अधिकार मिलता है कि यदि किसी देश पर अनुचित व्यापार व्यवहार का आरोप साबित होता है तो वह उस देश के खिलाफ एकतरफा टैरिफ या अन्य व्यापारिक प्रतिबंध लगा सकता है। अमेरिका का आरोप है कि कुछ देश अपनी घरेलू जरूरत से अधिक उत्पादन करते हैं और उस अतिरिक्त माल को सस्ते दामों पर वैश्विक बाजार में बेचते हैं। इसे डंपिंग कहा जाता है। साथ ही अमेरिका यह भी दावा करता है कि कई देश सरकारी सब्सिडी देकर अपने उत्पादों को कृत्रिम रूप से सस्ता बनाते हैं ताकि वे अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा में आगे रह सकें। अमेरिका का यह भी कहना है कि कुछ देश अपनी मुद्रा को कमजोर बनाए रखते हैं जिससे उनके निर्यात को बढ़ावा मिलता है और अमेरिकी कंपनियों को नुकसान होता है। हालांकि इस पूरे मामले को केवल आर्थिक तर्कों के आधार पर समझना पर्याप्त नहीं है। वैश्विक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम उस समय उठाया गया है जब भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाएं तेजी से वैश्विक व्यापार और उत्पादन के केंद्र बन रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने विनिर्माण क्षेत्र में बड़ी प्रगति की है और कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां चीन के विकल्प के रूप में भारत की ओर रुख कर रही हैं। ऐसे समय में अमेरिका द्वारा इस प्रकार की जांच शुरू करना कई विशेषज्ञों को रणनीतिक दबाव की नीति जैसा प्रतीत होता है। ट्रम्प प्रशासन की यह नीति दरअसल अमेरिका फर्स्ट के उस सिद्धांत से जुड़ी है जिसे ट्रम्प ने अपने राजनीतिक अभियान का आधार बनाया था। उनका मानना रहा है कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था ने अमेरिकी उद्योगों और कामगारों को नुकसान पहुंचाया है। इसी सोच के तहत उन्होंने पहले भी कई देशों पर टैरिफ लगाए थे और व्यापारिक समझौतों को दोबारा बातचीत के लिए मजबूर किया था। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह नीति वैश्विक व्यापार के लिए अस्थिरता पैदा करती है। यदि अमेरिका अपने प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के खिलाफ लगातार टैरिफ का इस्तेमाल करता है तो इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं प्रभावित होंगी और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में तनाव बढ़ेगा। इसका असर केवल संबंधित देशों पर ही नहीं बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। भारत के संदर्भ में यह मामला और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि भारत आने वाले वर्षों में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। भारत सरकार ने वर्ष 2029 तक देश को वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित करने की महत्वाकांक्षी योजना बनाई है। ऐसे समय में यदि बड़े बाजार भारत के निर्यात पर टैरिफ लगाने लगते हैं तो इससे भारतीय उद्योगों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। हालांकि यह भी सच है कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में व्यापारिक कूटनीति को मजबूत किया है। भारत अब केवल एक उपभोक्ता बाजार नहीं बल्कि एक बड़ा उत्पादन केंद्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। मेक इन इंडिया और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं जैसी नीतियों ने वैश्विक कंपनियों को भारत में निवेश करने के लिए आकर्षित किया है। इसके अलावा भारत ने कई देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते भी किए हैं जिससे उसके निर्यात के नए रास्ते खुल रहे हैं। अमेरिका द्वारा शुरू की गई इस जांच में भारत के अलावा चीन यूरोपीय संघ जापान दक्षिण कोरिया मैक्सिको वियतनाम ताइवान थाईलैंड मलेशिया कंबोडिया सिंगापुर इंडोनेशिया बांग्लादेश स्विट्जरलैंड और नॉर्वे जैसे देश भी शामिल हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह कदम केवल किसी एक देश के खिलाफ नहीं बल्कि व्यापक वैश्विक व्यापार रणनीति का हिस्सा है। आने वाले समय में इस जांच की प्रक्रिया के तहत विभिन्न देश और कंपनियां अपनी दलीलें प्रस्तुत करेंगे। मार्च से इस प्रक्रिया की शुरुआत होगी और मई में सुनवाई के बाद अमेरिका कोई फैसला ले सकता है। यदि अमेरिका को अपने आरोपों के समर्थन में पर्याप्त आधार मिल जाता है तो वह इन देशों पर नए टैरिफ लागू कर सकता है। फिर भी कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह पूरी प्रक्रिया वास्तव में दबाव की रणनीति हो सकती है जिसका उद्देश्य व्यापारिक वार्ता में बेहतर शर्तें हासिल करना है। अमेरिका अक्सर इस तरह की जांच और टैरिफ की धमकी का उपयोग अपने व्यापारिक साझेदारों को बातचीत की मेज पर लाने के लिए करता रहा है। भारत के लिए इस स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि वह अपने व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए मजबूत कूटनीतिक और आर्थिक रणनीति अपनाए। भारत को अपने निर्यात बाजारों का विविधीकरण करना होगा और घरेलू उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को और मजबूत बनाना होगा। साथ ही वैश्विक व्यापार नियमों के तहत अपने अधिकारों की रक्षा करना भी जरूरी होगा। अंततः यह स्पष्ट है कि वैश्विक व्यापार का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। बड़े देश अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए नए नए औजारों का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के सामने चुनौती यह है कि वे इन दबावों के बीच भी अपनी विकास यात्रा को जारी रखें और वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी मजबूत जगह बनाएं। ( L 103 जलवंत टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार स्तम्भकार) ईएमएस / 15 मार्च 26