वॉशिंगटन (ईएमएस)। करीब 72 से 63 करोड़ साल पहले हमारी धरती एक भयंकर ठंड की स्थिति से गुजरी थी, जिसे भूवैज्ञानिक ‘स्नोबॉल अर्थ’ कहते हैं। इस दौरान बर्फ ने दोनों ध्रुवों से लेकर भूमध्य रेखा तक पूरे ग्रह को ढक लिया था। नई स्टडी से यह संकेत मिला है कि इस भीषण ठंड को और भी गहरा करने में समुद्र की नमक की भूमिका महत्वपूर्ण रही। ताजा रिसर्च के अनुसार, जब समुद्र का पानी जमता था, तो उसमें से नमक बाहर निकलता और बर्फ की सतह पर क्रिस्टल बनाकर जम जाता। बर्फ के वाष्पीकरण के बाद पीछे बची नमक की परत सूरज की रोशनी को अत्यधिक परावर्तित करती थी। इसे वैज्ञानिकों ने ‘सॉल्ट-अल्बेडो’ नाम दिया। यह पारंपरिक बर्फ से भी अधिक चमकदार होती थी और सूरज की ऊर्जा को वापस अंतरिक्ष में भेजकर ग्रह को तेजी से ठंडा कर देती थी। ‘आइस-अल्बेडो फीडबैक’ पहले से ज्ञात था कि बर्फ की सतह सूर्य की रोशनी को परावर्तित कर धरती को ठंडा करती है, लेकिन अब नमक की भूमिका को भी समझा गया। क्लाइमेट मॉडलिंग में यह दिखा कि नमक की परत ने पृथ्वी को अपेक्षा से कहीं ज्यादा तेजी से और गहराई से जमाया और उसके पिघलने की प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न की। एक तरह से नमक ने धरती को ‘फ्रीजर’ में लॉक कर दिया था। स्नोबॉल अर्थ के दौरान जीवन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। सूक्ष्मजीव और शैवाल कुछ विशेष स्थानों पर जीवित रहे। समुद्र की गहराई में मौजूद गर्म झरने और बर्फ की दरारें जीवन के लिए शरणस्थल बनीं। इस समय के बाद जैसे ही बर्फ पिघली, हजारों साल से जमा फास्फोरस और अन्य खनिज समुद्र में मिल गए, जिससे साइनोबैक्टीरिया और शैवाल की आबादी में विस्फोट हुआ और वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ी। इस चरम ठंड ने ‘प्राकृतिक चयन’ को तेज किया और जीवों को जीवित रहने के लिए सहयोग करना पड़ा। इसी प्रक्रिया ने बहुकोशिकीय जीवन के विकास को बढ़ावा दिया। स्नोबॉल अर्थ के तुरंत बाद एडियाकरन काल आया, जिसमें पहली बार नरम शरीर वाले जटिल जीव दिखाई दिए। इसके बाद कैम्ब्रियन विस्फोट के दौरान रीढ़धारी और अन्य आधुनिक प्रजातियों का उदय हुआ। वैज्ञानिक मानते हैं कि यदि धरती स्नोबॉल अर्थ की स्थिति से नहीं गुजरी होती, तो जीवन संभवतः केवल सरल जीवों तक ही सीमित रहता। यह चरम ठंड और उसके बाद हुई परिस्थितियाँ ही जटिल जीवन और विविध प्रजातियों के विकास के लिए महत्वपूर्ण ‘स्पार्क’ साबित हुई। सुदामा/ईएमएस 16 मार्च 2026